मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
रविवार, 18 नवंबर 2012
आज कल के रिश्ते की नयी परिभाषा
मुझे याद है अपने गाँव मे जब किसी के घर पे कोई पारंपरिक आयोजन होता था तब वहा खाने की भी व्यवस्था होती थी जिसे वहा की भाषा मे भोज और आज कल जिसे हम पार्टी कहते है। गाँव मे सब को एक साथ पंक्तिबद्ध बैठा कर पत्तल मे भोजन और कुलहड़ मे पानी दिया जाता। सब बड़े ही प्रेम से भोजन करते । भोजनोपरांत एक जगह सारे पत्तल फेंक देते। जहा पर वह सारे पत्तल पड़े होते वही पर गाँव भर के कुत्ते एकत्र होते। हम सब जानते है...
ं कि, कुत्तो को झूठन खाने की आदत होती है, इंसान जो कुछ अपनी पत्तल मे खाने के बाद छोड़ देता है उसे वह कुत्ते खा के अपना पेट भरते है।
आज देखता हु कि उन कुत्तो की जगह इन्सानो ने ले ली है आखिर किस तरह की व्यवस्था मे जी रहे है हम, सड़क छाप तो कुत्ते होते थे ये इंसान कब से होने लगे। एक गरीब 32 रुपये मे पूरा दिन चलाये और एक 32000 करोड़ रुपये आराम से डकार जाये। अब तो कार्ड बताता है हम अमीर हैं की गरीब । अब वो गाँव वाला प्रेम दिखता ही नही अब तो गांवो मे भी कुत्तो की जगह इंसानों ने और इन्सानो की जगह शैतानो ने ले ली है। सड़क का वह कुत्ता पूछता है कि मेरे मालिक हम कहा जाए तब इंसान उस पर चिल्लाते हुए कहता है की कुत्ते हो वही रहो, वह कुत्ता इंसान को देखता है और मुस्कराने लगता है।
आज कल के रिश्ते की नयी परिभाषा लगता है की कुछ इस तरह हो गयी है-
दोस्त - जो हमे बताता कि विश्वास घात कैसे किया जाता है।
भाई - हमे यह सिखाता है कि ज़िम्मेदारी रिश्ते से तय होती है बड़े छोटे होने से नहीं।
पिता - चरित्र, नैतिकता, मानवता नहीं नौकरी पैसा और डिग्री ही सब कुछ है ।
प्रेमिका - पैसा, जलवा और उस पे कितना खर्च कर सकते हो नहीं तो तुम्हारा ही दोस्त कब से उसे हिंट दे रहा है कि अब तुम कंगले हो चुके हो।
शिक्षक - बेटा जितना चाहे पढ़ लो, जब तक कोचिंग नहीं पढ़ोगे तब तक पास तो तुम्हारे पिताजी भी नहीं करा पाएंगे और उसके बाद भी किस जाति या धर्म के हो , इसके अलावा छात्रों को राजनीति भी तो सिखानी है इसके लिए बाकायदा विभागीय प्रेक्टिकल कर के भी दिखाते हैं।
https://www.facebook.com/pages/Social-issues-and-socal-workers/303930613046493
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)