शनिवार, 30 नवंबर 2024

हाँ, याद रखना-लिखूंगा

“...हाँ, कुछ समय निकालूँगा,

और लिखूंगा मासूम झूठ,
सहमे हुए सच,
एकाध बेमानी बातें,
मासूम सवालों से उपजी परेशानी।

मुश्किलें, बढ़ती चिंताएँ,
बिचलित हुआ मन,
घबराए हुए तनाव,
कानों में डाले गए दबाव।

टूटे परिवारों का दर्द,
अनजाने रिश्तों की परिभाषा,
सुख-दुःख का अन्यायी रूप,
समय से पहले बिखरा धैर्य,
सुकून और मुस्कराहट,
वजह-बेवजह से विचलित मन।

और लिखूंगा:
खूबसूरत जिंदगियों के बीच
किये गए समझौते,
परहेज की हुई चाहतें,
घंटों का मौन, तुम्हारी नजरअंदाजियाँ,
फैली हुई गलतफहमियाँ।

लिखूंगा अनकही बातें,
सख्त उम्मीदें भी,
जो बेताब हैं मुंह खोलने को,
जज्बातों का सैलाब जो रह गया है अधूरा।

डरा-सहमा और बिखरा हुआ आस-पास,
मंडराता हुआ आफ़त का साया,
हवाओं में उड़ते अरमान,
यह सब लिखूंगा,
एक दिन, समय निकालकर,
याद रखना."

-
इन्द्रमणि साहू

30.11.2024

रविवार, 19 मई 2024

चंद बूंद पानी

 .....और जो, 

समझना ही 

नहीं चाहे 

उसे कितना भी 

समझा लो 

सब बेकार.....!

..........................................

समेट-समेट कर 

संभाल-संभाल कर 

जीना चाहते हैं 

आए-गए की तरह नहीं

और एक तुम हो 

कि......!

..................................

प्यासे को 

चंद बूंद पानी 

की थी जरुरत 

पर  उन्होंने तो,

उसे कुएँ में ही डुबो दिया...!

.........................................

कौंधता है 

चुभता है 

और झकझोरता भी 

खूब है 

उनकी बातें 

आज भी...."

................................

रेत को 

मुट्ठी में बंद 

किये तो हैं 

देखते हैं 

टिकता भी है 

या नहीं....!

-इन्द्रमणि साहू 

 

मगर अफ़सोस!

 सजा तो 

मुकर्रर कर दी 

मगर अफ़सोस!

कम से कम 

कोई गुनाह 

करने दिया होता....!

-इन्द्रमणि साहू 



शुक्रवार, 3 मई 2024

कभी-कभी

 "कभी-कभी 

अपनी मुर्खता पर भी 

हंसी आती है..."

................................

"याद रखना

तुम्हें भी लिखूंगा

एक-एक शब्द 

तब, जब 

पूरी तरह समझ जायेंगे..."

.....................................

"किस्मत 

बदलती है 

बैठकर मात्र 

सोचने रहने से नहीं....."

-इन्द्रमणि साहू