और खो देने का डर...
बस यही है,
मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
"आगे बढ़ने के लिए
बल लगाने की
जरुरत नहीं
होती है
बस
सच्चाई अपना लीजिये
कहीं न कहीं
जगह मिल ही
जाता है....”
-इन्द्रमणि साहू
"श्रद्धा भी है
और भय भी
नियम-धर्म के अनुयायी भी हैं
और कृष्ण के भक्त भी
निंबू-मिर्ची से जुड़े विश्वास
के सख्त खिलाफ हॅू
परंतु प्यार, विश्वास
इंतजार, त्याग, बलिदान.....
को लेकर अंधभक्ति का शिकार हॅू..."
-इन्द्रमणि साहू
"इंसान हॅू
इंसान ही रहने दो
मत बांधो मुझे धर्मा, संस्कारों की बेड़ियों में
परंपरा, संस्कृति, सिद्धांत, रीति-नीति
की वजह से ही
आज तक
यहीं अटका पड़ा हॅॅू
परंतु, अब नहीं,
मुझे अब किसी ओर से
मुहब्बत करनी पड़ेगी.
"सपने देखना और
दिखाना
अच्छी बात है
परंतु,
इसे हकीकत में बदलना
दूसरी और कीमती बात है..."
या प्यार आने पर
मुझसे
काब्य ग्रन्थ की रचना हो जाती है
और तुमसे \\
-इन्द्रमणि साहू
"मन में
यह बात
कभी आया था
कि
संभाल नहीं पायेंगे
और
आज हुआ भी यही...”
-इन्द्रमणि साहू
धुकधुकी सी
क्यों है छाती के अन्दर
क्यों लगता है
कि
छीन जा रहा है
कोई कीमती चीज मुझसे...
फिंजा ख़राब और
माहौल भी डर का है
मालूम है विकल्प नहीं है
पर संभावनाओं की भी कमी नहीं है...
मालूम है
कैद हो जायेगा
एक न एक दिन बंद पिंजरें में
तब अरमानों के परिंदों के शोर के साथजीने की
कोशिशें नाकाम हो जायेंगे...
और एक बार फिर लम्बी ख़ामोशी
जीवन का हिस्सा होगा...
समझाते बहुत हैं
खुद को
कि अधूरा कभी पूरा नहीं होता ...
फिर अन्दर से आवाज आती है
अच्छा है एक बार फिर
बेच लेना
एक एक शब्द सरे आम
बिलख-बिलखकर
हकर-हकर कर रोकर
कविताओं के रूप में ....
इन्द्रमणि साहू
22.04.2021