कोडरमा
जिला में सबसे ज्यादा राजस्व चुकाने वाले एवं फसल उत्पादन करने वाले क्षेत्र
डोमचांच इन दिनों प्रदूषण, गंदगी, बीमारी और
भूमि का बंजरीकरण के दौर से गुजर रहा है। इस समस्या की विकरालता का अंदाजा इसी से
लगाया ला जा सकता है कि लगभग 200 वर्ग किमी0 क्षेत्र में लगभग 900 क्रेशर, कोडरमा
सदर में 400 एवं मरकच्चों प्रखंड में लगभग 500 और लगभग 200 की संख्या में छोटे-बड़े खदान हैं।
चंदवारा प्रखंड में भी लगभग 100 क्रेशर हैं। खदान और
क्रेशरों की वजह से तेजी से जंगल उजड़ रहा है और वहीं दूसरी ओर प्रदूषण, गंदगी और बीमारी इन दिनों डोमचांच एवं डोमचांच के आस-पास के इलाके की
निशानी बन गई है। पेड़ के पत्ते हरा होता है पर इस इलाके के पेड़ों की पत्तियां सफेद
हैं। पत्थरों के टूटने एवं उनसे उड़ने वाले डस्ट से सभी पेड़ों की पत्तियां सफेद-सफेद
सी हो गई है। बरियारडीह से कोडरमा तक बगैर हेलमेट पहने मोटरसाइकिल से गुजर पाना
दुभर है।
शाम के वक्त तो
पास से पांच से 10 फीट की दूरी भी दिखना मुश्किल होता है। कहा जाता है
कि शाम को वायुमंडल ठंडा होता है, इस कारण धूलकण ऊपर उठने की बजाय नीचे ही मंडराता
रहता है। इस क्षेत्र में बढता हुआ धूलकण, गैस, बढता सौर, दिन-प्रतिदिन प्रदूषित
होता जल और नष्ट होते पेड़-पौधे, प्रदूषण के खतरे की ओर बढते जा रहे हैं।
फुलवरिया, धरगांव,
इंदरवा, नवलशाही, पहाड़पुर, नवादा, नेरुपहाड़ी, कटरियाटांड, गेंदवाडीह, सलैयडीह, पंचगांवां
मोड़, पुरनाडीह, महेशपुर, डुमरगढहा, मरकच्चो, बरियारडीह, काराखूट, बहादुरपुर, नावाडीह
आदि दर्जनों गांव के आम नागरिकों का जीवन इन क्रशरों की वजह से दमघोटू बन गया है।
न सिर्फ क्रेशरो में कार्यरत मजदूर इसके शिकार हो रहे हैं बल्कि आसपास के लोग और
आने-जानेवालों पर भी इसका बेहद बुरा असर पड़ रहा है।
उक्त इलाकों के
लगभग 10000 हेक्टेयर क्षेत्र मरुभूमि बन चुका है। क्रेशरों
एवं खदान की गंदगी से ऐसा हुआ है। सड़क के दोनों किनारे की जमीन देखने से इसका सहज
अंदाजा लग जाता है। लोग अपनी बेकारी और बेरोजगारी दूर करने के लिए जंगल व वृक्षों
की कटाई करते हैं। लोग साइकिल पर इसे लादकर डोमचांच-कोडरमा बाजार में बेचकर अपना
गुजारा करते हैं। सखुआ एवं अन्य कीमती लकड़ियां का टुकड़ा-टुकड़ा कर बाजार में ले
जाकर बेचते हैं। प्रति साइकिल 100 से 150 रुपया में इसकी बिक्री होती है। न सिर्फ डोमचांच, बगड़ो, कोडरमा, नवलशाही
आदि चैक चैराहे पर स्थित होटलों में मोटा-मोटा लकड़ी जलावन के काम में लाते हैं।
संपन्न परिवारों में भी लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है। कहा जाता है कि कोयला और गैस
से अभी यहां लकड़ी सस्ता है। साइकिल पर सवार लकड़ी बेचने वाले मजदूर हर दिन हम सभी
को रास्ते में दिखाई देते हैं.
इस तरह लगतार
कटते जंगल, बढते क्रशरों की संख्या आदि से इस क्षेत्र के हजारों एकड़ भूमि बंजर
होती जा रही है।
लगतार जलस्रोत भरता जा रहा है।
कुल मिलाकर एक
भी गांव पर्यावरणीय, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण
से समृद्ध और खुशहाल नहीं है।