शनिवार, 30 नवंबर 2024

हाँ, याद रखना-लिखूंगा

“...हाँ, कुछ समय निकालूँगा,

और लिखूंगा मासूम झूठ,
सहमे हुए सच,
एकाध बेमानी बातें,
मासूम सवालों से उपजी परेशानी।

मुश्किलें, बढ़ती चिंताएँ,
बिचलित हुआ मन,
घबराए हुए तनाव,
कानों में डाले गए दबाव।

टूटे परिवारों का दर्द,
अनजाने रिश्तों की परिभाषा,
सुख-दुःख का अन्यायी रूप,
समय से पहले बिखरा धैर्य,
सुकून और मुस्कराहट,
वजह-बेवजह से विचलित मन।

और लिखूंगा:
खूबसूरत जिंदगियों के बीच
किये गए समझौते,
परहेज की हुई चाहतें,
घंटों का मौन, तुम्हारी नजरअंदाजियाँ,
फैली हुई गलतफहमियाँ।

लिखूंगा अनकही बातें,
सख्त उम्मीदें भी,
जो बेताब हैं मुंह खोलने को,
जज्बातों का सैलाब जो रह गया है अधूरा।

डरा-सहमा और बिखरा हुआ आस-पास,
मंडराता हुआ आफ़त का साया,
हवाओं में उड़ते अरमान,
यह सब लिखूंगा,
एक दिन, समय निकालकर,
याद रखना."

-
इन्द्रमणि साहू

30.11.2024