मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
शनिवार, 7 सितंबर 2013
आजकल की लड़कियां
आजकल कुछ लोग
मोटे हो रहे हैं
धन से, बल से,
जन से, लूट से, ज्ञान से.......
पतला होने का भी
अभियान चल रहा है
कई लोग
अपना वजन
कम करने के लिए
मोटे हो रहे हैं
धन से, बल से,
जन से, लूट से, ज्ञान से.......
पतला होने का भी
अभियान चल रहा है
कई लोग
अपना वजन
कम करने के लिए
पतला होने का
भूत सवार हो गया है
भूत सवार हो गया है
कोई बीमारी हो...
और तो और
आजकल की लड़कियां
चाहती ही है कि
वे तार सी पतली हो
और
हैंगरों पर
टंगी दिखाई दे
कपड़ों की तरह
मगर सच यह है कि
मांसलता और लावण्यता का भी
अपना आकर्षण है
भारतीय सौंदर्यशास़्त्र में
मोटापा कोई बीमारी नहीं
समृद्धि का प्रतीक रहा है.
पर इसे समझने में
फिलहाल
देर लगेगा.
-इन्द्रमणि
और तो और
आजकल की लड़कियां
चाहती ही है कि
वे तार सी पतली हो
और
हैंगरों पर
टंगी दिखाई दे
कपड़ों की तरह
मगर सच यह है कि
मांसलता और लावण्यता का भी
अपना आकर्षण है
भारतीय सौंदर्यशास़्त्र में
मोटापा कोई बीमारी नहीं
समृद्धि का प्रतीक रहा है.
पर इसे समझने में
फिलहाल
देर लगेगा.
-इन्द्रमणि
कोडरमा के माडल विधालयों में से एक है रा0 मध्य विधालय इंदरवा (देहाती)
1994 में जिला बनने के बाद भी कोडरमा में अपेक्षाकृत परिवर्तन या बदलाव संभव नहीं हो पाया। बच्चों व महिलाओं की स्थिति जस की तस बरकरार रही। बल्कि पहले के अपेक्षा समस्याएं और ब-सजय़ीं। यहां के लगभग सभी गांवों, चैक-चैराहों में 0-18 आयु वर्ग के बच्चों व नैनिहालों के लिए बने केद्रीय कानूनों, अंतराष्ट्रीय कानूनों, घोषणा पत्रों तथा मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा था (है)। यहां ज्यादातर गरीब, भूमिहीन, खेतीहर मजदूर, निर्माण मजदूर, क्रषर-माईका मजदूर और किसान समुदाय के लोग हैं। इनके बच्चों के बेहतर भविष्य एवं बच्चों को अधिकारों से लैस करने के उद्देष्य से क्रेज एवं समर्पण ने पांच साल पूर्व कोडरमा के लोकाई एवं इंदरवा पंचायत के दस गांवों को चिन्हित कर जागरूकता संबंधी कार्य करना प्रारंभ किया। इसके तहत संस्था द्वारा बाल रैली, गांव एवं स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम, विभिन्न अवसरों व उत्सवों के अवसर पर सांस्कृतिक व नुक्कड़ नाटक कार्यक्रम, बाल सभा का आयोजन, बाल समागम, बाल महोत्सव, पर्चा-पोस्टर का वितरण, दिवाल लेखन, मां-बेटी सम्मेलन, किषोरी सम्मेलन, किषोरी प्रषिक्षण, बाल पत्रकार निर्माण कार्यषाला का आयोजन आदि कार्यक्रम संपादित किये जाते रहे। जिसका परिणाम अब कुछ-कुछ दिखाई देने लगा है। गांवों में आज शैक्षणिक माहौल है। गांव के सभी बच्चे आज स्कूल में हैं और उनका षिक्षा और विधालय के प्रति आकर्षण बना हुआ है। बच्चे मुखर होकर अपने हक अधिकार हासिल कर रहे हैं।
कोडरमा जिला मुख्यालय से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित है राजकीयकृत मध्य विधालय इंदरवा (देहाती)। कहने को तो यह स्कूल सरकारी है पर प-सजय़ाई व अनुषासन के मामले में यह किसी प्राईवेट विधालय से कम नहीं है। 1952 में निर्मित रा0 मध्य विधालय इंदरवा (देहाती) इन दिनों कोडरमा जिला के माॅडल विधालयों में से एक है। यहां कुल 10 षिक्षक हैं। सभी कर्तव्यनिष्ठ और बाल अधिकारप्रेमी हैं। पारा षिक्षकों के हड़ताल पर चले जाने के समय भी यहां प-सजय़ाई एक दिन भी बाधित नहीं हुआ। क्योंकि, ग्राम षिक्षा समिति, स्कूल प्रबंधन समिति एवं विधालय के प्रधानाध्यापक के संयुक्त प्रयास से वैकल्पिक षिक्षकों की बहाली शीघ्र कर लिया गया। वह भी निःषुल्क। यह काम गांवों में बैठक कर कुछ प-सजय़े-ंउचयलिखे युवा-युवतियों को षिक्षादान के तहत किया गया।
इस स्कूल ने स्वतंत्र भारत के बाद से लेकर आज तक एक लंबा सफर तय किया है। इस लंबे सफर में मात्र दो प्रधानाध्यापकों का नाम गर्व से लिया जा रहा है। एक वर्तमान प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का और दूसरा रामलखन प्रसाद का। उक्त दोनों प्रधानाध्यापकों ने अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा से इस विधालय को माॅडल स्वरूप देने में अपनी पूरी शक्ति -हजयोंक दी। यही वजह है कि आज जिला में जब कभी भी बाहर से कोई अधिकारी मूल्यांकन या विजिट में आते हैं तो इसी स्कूल को दिखाया जाता है।
कोडरमा जिला मुख्यालय से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित है राजकीयकृत मध्य विधालय इंदरवा (देहाती)। कहने को तो यह स्कूल सरकारी है पर प-सजय़ाई व अनुषासन के मामले में यह किसी प्राईवेट विधालय से कम नहीं है। 1952 में निर्मित रा0 मध्य विधालय इंदरवा (देहाती) इन दिनों कोडरमा जिला के माॅडल विधालयों में से एक है। यहां कुल 10 षिक्षक हैं। सभी कर्तव्यनिष्ठ और बाल अधिकारप्रेमी हैं। पारा षिक्षकों के हड़ताल पर चले जाने के समय भी यहां प-सजय़ाई एक दिन भी बाधित नहीं हुआ। क्योंकि, ग्राम षिक्षा समिति, स्कूल प्रबंधन समिति एवं विधालय के प्रधानाध्यापक के संयुक्त प्रयास से वैकल्पिक षिक्षकों की बहाली शीघ्र कर लिया गया। वह भी निःषुल्क। यह काम गांवों में बैठक कर कुछ प-सजय़े-ंउचयलिखे युवा-युवतियों को षिक्षादान के तहत किया गया।
इस स्कूल ने स्वतंत्र भारत के बाद से लेकर आज तक एक लंबा सफर तय किया है। इस लंबे सफर में मात्र दो प्रधानाध्यापकों का नाम गर्व से लिया जा रहा है। एक वर्तमान प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का और दूसरा रामलखन प्रसाद का। उक्त दोनों प्रधानाध्यापकों ने अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा से इस विधालय को माॅडल स्वरूप देने में अपनी पूरी शक्ति -हजयोंक दी। यही वजह है कि आज जिला में जब कभी भी बाहर से कोई अधिकारी मूल्यांकन या विजिट में आते हैं तो इसी स्कूल को दिखाया जाता है।
आरटीई 2009 के लगभग मानदंड़ों को पूरा करता है यह स्कूल
आज अधिकांष प्रधानाध्यापक मध्यान भोजन एवं स्कूल भवन निर्माण कार्य में कितना आमद-खर्च हो रहा है या होने वाला है के चक्कर में उल-हजये रहते हैं। वहीं इस विधालय के प्रधानाध्यापक सहित अन्य सहयोगी षिक्षक सिर्फ बच्चों को उचित षिक्षा मिले, नामांकन व ठहराव 100 प्रतिषत बरकरार रहे इसके लिए ज्यादा चितिंत रहते हैं। यह स्कूल निःषुल्क और अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के लगभग सभी मापदंडों को पूरा कर रहा है। यहां षिक्षकों की नियमित उपस्थिति, छात्र के अनुपात में षिक्षकों की उपलब्धता, समय-ंउचयसारणी के अनुसार प-सजय़ाई, योग्य एवं विषयवार षिक्षक की उपलब्धता, शैक्षणिक वार्षिक कैंलेंडर का अनुपालन, टीएलएम का उपयोग, खेल एवं मनोरंजन सामग्री की उपलब्धता एवं सभी बच्चों को समय पर पुस्तकें हासिल हैं। स्कूल व्यवस्था में किसी प्रकार की कोई कमी होती है तो बाल संसद सक्रिय हो उठते हैं। विधालय में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय है। शुद्ध पेयजल के लिए स्कूल परिसर में चापानल है। स्कूल प्रबंधन समिति की नियमित बैठक हो रही है। समिति द्वारा विधालय विकास योजना का निर्माण किया जा रहा है। यहां मिनू के अनुसार बच्चों के बीच नियमित एवं गुणवतापूर्ण मध्यान भोजन परोसा जा रहा है। वह भी साफ-सफाई एवं अनुकूल वातावरण में। विधालय प्रागंण में एक पीपल का वृक्ष है, जिसकी छांव में बैठकर बच्चे प्रतिदिन भोजन करते हैं। गरीब बच्चों को नियमित छात्रवृति का भुगतान किया जा रहा है। बच्चों का नियमित मूल्यांकन एवं अनुश्रवण होता है जिसमें पाये गये कमजोर बच्चों की प-सजय़ाई के लिए अलग से व्यवस्था है। बच्चों की सहभागिता से विधालय में अक्सर बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जैसे-सुलेख, निबंध, खेल-कूद आदि।
आज अधिकांष प्रधानाध्यापक मध्यान भोजन एवं स्कूल भवन निर्माण कार्य में कितना आमद-खर्च हो रहा है या होने वाला है के चक्कर में उल-हजये रहते हैं। वहीं इस विधालय के प्रधानाध्यापक सहित अन्य सहयोगी षिक्षक सिर्फ बच्चों को उचित षिक्षा मिले, नामांकन व ठहराव 100 प्रतिषत बरकरार रहे इसके लिए ज्यादा चितिंत रहते हैं। यह स्कूल निःषुल्क और अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के लगभग सभी मापदंडों को पूरा कर रहा है। यहां षिक्षकों की नियमित उपस्थिति, छात्र के अनुपात में षिक्षकों की उपलब्धता, समय-ंउचयसारणी के अनुसार प-सजय़ाई, योग्य एवं विषयवार षिक्षक की उपलब्धता, शैक्षणिक वार्षिक कैंलेंडर का अनुपालन, टीएलएम का उपयोग, खेल एवं मनोरंजन सामग्री की उपलब्धता एवं सभी बच्चों को समय पर पुस्तकें हासिल हैं। स्कूल व्यवस्था में किसी प्रकार की कोई कमी होती है तो बाल संसद सक्रिय हो उठते हैं। विधालय में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय है। शुद्ध पेयजल के लिए स्कूल परिसर में चापानल है। स्कूल प्रबंधन समिति की नियमित बैठक हो रही है। समिति द्वारा विधालय विकास योजना का निर्माण किया जा रहा है। यहां मिनू के अनुसार बच्चों के बीच नियमित एवं गुणवतापूर्ण मध्यान भोजन परोसा जा रहा है। वह भी साफ-सफाई एवं अनुकूल वातावरण में। विधालय प्रागंण में एक पीपल का वृक्ष है, जिसकी छांव में बैठकर बच्चे प्रतिदिन भोजन करते हैं। गरीब बच्चों को नियमित छात्रवृति का भुगतान किया जा रहा है। बच्चों का नियमित मूल्यांकन एवं अनुश्रवण होता है जिसमें पाये गये कमजोर बच्चों की प-सजय़ाई के लिए अलग से व्यवस्था है। बच्चों की सहभागिता से विधालय में अक्सर बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जैसे-सुलेख, निबंध, खेल-कूद आदि।
विधालय में अभी भी है आधारभूत संरचनाओं की कमी
हलांकि, इस स्कूल में कई आधारभूत संरचरनाओं की कमी है, जैसे रसौईघर, पुस्कालय व प्रयोगषाला। इसके अलावे पर्याप्त टेबल, कुर्सी, बंेच, दरी आदि का भी काफी कमी है। जिसकी मांग अक्सर संबंधित विभाग से की जा रही है। विधालय में अध्ययनरत कुल 460 बच्चों में मात्र 373 बच्चों को ही पोषाक मिल सका। शेष बच्चों को अभी तक पोषाक नहीं मिल पायी है। क्योंकि, जिला प्रषासन की ओर से उतनी राषि उपलब्ध ही नहीं करायी गयी जितना का लिस्ट समर्पित किया गया था। अक्षम/विकलांग बच्चों के लिए अनुकूल साधन एवं क्षेत्रीय भाषा पर आधारित पाठ्यक्रम में कमी है।
प्रधानाध्यापक की रायः
प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का कहना है कि आज शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव किये जा रहे हैं। नित्य नये कानून बन रहे हैं। षिक्षकों को नये-नये तरीकों के प्रषिक्षण दिये जा रहे हैं। लोक भागीदारी कायम करने के लिए स्कूल प्रबंधन समिति एवं पंचायत जनप्रतिनिधियों को भी प्रषिक्षण एवं अधिकारों से लैस किये जा रहे हैं। लेकिन, बदलाव कहीं नजर नहीं आ रही है। आखिर बदलाव आये भी तो कैसे? उपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट हो चुके हैं। इस क्षेत्र को भी लूट और भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है। गैर शैक्षणिक कार्याे में लगाकर हम षिक्षकों को बच्चों के अधिकारों से विमुख कर दिया है। बेचारे मास्टर क्या करे। आज हमलोग दोहरी मार के षिकार भी हैं। समुदाय-अभिभावक व षिक्षक के बीच के मधुर रिष्ते भी खत्म हो गये हैं। इसमें हम षिक्षक भी कम दोषी नहीं हैं। स्कूल की व्यवस्था को लेकर उन्होंने कहा कि हम जी-जान से लगे हुए हैं। प्रधान षिक्षक होने के साथ-साथ एक सामाजिक दायित्व के तहत भी हम चाहते हैं कि सभी बच्चों को अच्छी व गुणवतापूर्ण षिक्षा मिले। इस दिषा में हमें स्वयंसेवी संस्था समर्पण, क्रेज, स्थानीय पंचायत जनप्रतिनिधियों एवं अन्य षिक्षाप्रेमियों का भी काफी सहयोग प्राप्त है। इसलिए आज हम इस स्कूल को एक पहचान दिलाने में सफल हैं।
खींचड़ी खिलाने वाला केंद्र मात्र नहीं है सरकारी विधालय
यह सही है कि आज षिक्षा व्यवस्था परिवर्तन का औजार नहीं, बल्कि, खरीद-बिक्री की चीज हो गयी है। आज जिनके पास जितना पैसा है वे उतनी ही मंहगी षिक्षा खरीद रहे हैं। आज भी इस देष में केंद्रीय विधालय, नवोदय विधालय, अंग्रेजी-हिन्दी माध्यम के प्राईवेट विधालयों को ही रोल माॅडल माना जा रहा है। वहीं सरकारी विधालय की गिनती गरीबों के बच्चों के लिए बना विधालय या खींचड़ी खिलाने वाला केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। जबकि, सरकारी विधालयों में प-सजय़ने वालों की संख्या 80 फीसदी हैं। षिक्षक यदि चाह लें तो एक हद तक प्राईवेट विधालयों को मात दे सकता है। इसके लिए षिक्षकों को बच्चों के प्रति समर्पित होना पड़ेगा। चुंकि, प्राईवेट विधालयों से ज्यादा वेतन सरकारी विधालयों में प-सजय़ाने वाले षिक्षकों का होता है। क्वालिफिकष्ेान एवं प्रषिक्षण भी कमोवेष ज्यादा होता है। जरूरत है समर्पित भाव से बच्चों को -हजयारखंडी अवधारणा के अनुरूप यहां के मूल्यों, ऐतिहासिक धरोहरों, गोरवमयी संस्कृति एवं भाषा के स्तर पर परिपक्व बनाना। इसी को ध्यान में रखते हुए 28 नवंबर 2001 को भारतीय संसद ने षिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। बाद में, अप्रैल 2010 से निःषुल्क एवं अनिवार्य बाल षिक्षा अधिकार अधिनियम लागू कर षिक्षा के क्षेत्र में दोहरी नीति की प्रणाली को खत्म करने का प्रयास किया गया है। लेकिन, कानून या नीति बना देने मात्र से स्थितियों में बदलाव नहीं आने वाला है। बदलाव के लिए जरूरी होता है इच्छा शक्ति। इंदरवा स्कूल को आज एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
विधालय व्यवस्था सुधार में क्रेज एवं स्वयंसेवी संस्था समर्पण का अहम् योगदान
आज इस गांव में एक भी बच्चे कामकाजी नहीं हैं और न ही बाल मजदूर हैं। यदि हैं भी तो वे घर का काम-काज करते हुए प्रतिदिन स्कूल भी जा रहे हैं। हां, किषोरियों में यह संख्या आज भी कुछ है। लेकिन, हाई स्कूल के अभाव में। हाई स्कूल की प-सजय़ाई प्रांरभ होते ही यह भी समस्या समाप्त हो जायेगी। उक्त विधालय को एक पहचान दिलाने एवं हाई स्कूल की मांग को निरंतर जारी रखने में क्रेज एवं स्वयंसेवी संस्था समर्पण का काफी योगदान रहा है।
इंदरवा एक बड़ी और मिश्रित जातियों की बस्ती है। एक मुहल्ला दलितों की है। जहां न आंगनबाड़ी था और न ही वहां के बच्चे स्कूल आते थे। दलितों की स्थिति काफी दयनीय और उपेक्षित जैसा था। अब उस मुहल्ले के बच्चे स्कूल आ रहे हैं। महिला मंडल एवं समाजकर्मियों के मांग पर यहां आंगनबाड़ी भी खुला। संस्था समर्पण के मेरियन सोरेन ने बताया कि गांव में शैक्षणिक माहौल बनाने में गांव में गठित नवयुवक समिति, समाज के मानिन्द व्यक्ति व समाजसेवीगण, बाल कल्चरल टीम, षिक्षकगण, पंचायत जन प्रतिनिधिगण एवं मिडिया आदि का विषेष सहयोग प्राप्त हुआ है। संस्था के सार्थक प्रयास से आज इस गांव में कामकाजी बच्चें या बाल मजदूरों की संख्या नगण्य है। और तो और, छीजन की दर में भी काफी कमी हो गयी है। बाल विवाह की संख्या में काफी कमी आयी है। आज इस गांव से कई लड़कियां हाईस्कूल और काॅलेज की षिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। बच्चे नषापान एवं अन्य बुराईयों से मुक्त हुए हैं। वर्ष 2008 में डोर टू डोर सर्वेक्षण से प्राप्त आंकडों के अनुसार इस गांव में कुल 65 बच्चे कामकाजी एवं 17 बच्चे बाल मजदूर एवं 78 बच्चे छीजित थे। जिन्हें स्कूल से जोड़ने के लिए संस्था को काफी मसक्कत करनी पड़ी। (Indramani Sahu)

हिंसा का जबाव हिंसा नहीं हो सकता
भारत में पहली बार वायु सेना एक खतरनाक काम करने जा रही है. वह काम है-अपने ही देष में अपने ही लोगों पर गोलियों और बमों से आकाषीय हमला करना यानि, असमान से जमीन पर रह रहे नक्सलियों को चुन-चुनकर मारना. नक्सलियों को नेस्तानाबुद करने के लिए यह काम करा रही है हमारी सरकार. यदि यही काम सीमा पर युद्ध के दौरान होता तो हम गर्वान्वित भी होते, परंतु जंगलों व गांवों में रहने वाले मेहनतकष मजदूर, संस्कृति से लैस लोगों पर आकाषीय हमला करना बिल्कुल शर्मनाक है. शर्मनाक इसलिए भी कि यदि यही पैसा गरीबी और बेरोजगारी दूर करने में लगया जाता तो शायद एक बेहतर माहौल बनता और नक्सली अपने आप खत्म हो जाता. लेकिन, यहां गरीबी खत्म करने के बजाय गरीबों को ही खत्म करने की कोषिष की जा रही है. जमीन पर कौन है नक्सली, यह भला कैसे पता लगायेंगे आकाष में उड़नेवाले लोग. उन्हें कैसे पता चलेगा कि मध्यरात्रि तक गांव व जंगल में नाचते-गाते लोग सीधे-साधे आदिवासी व दलित समुदाय के लोग है न कि नक्सली. यदि यह पहल हुआ तो निष्चित रूप बाजार जा रहे -हजयुंड़ में लोग, षिकार खेलते आदिवासी या फिर नरेगा के तहत काम कर रहे लोग इसके षिकार होंगे. सरकार की यह कितनी बेवकुफीपन योजना है. जरा सोचिए नक्सली कौन है यहां? नक्सलवादी विचारधारा में शामिल क्यों हो रहे हैं लोग? जाहिर सी बात है कि ये वे लोग हैं जो हमारी व्यवस्था से निराष लोग है पर हैं वे सब अपने ही न कि देष का दुषमन. न तो वे किसी दूसरे देष के एजेंट हैं न ही बाहरी आक्रमणकारी या आतंकवादी, फिर सरकार ऐसे नृषंस कदम उठाने की योजना बनायी है तो इसका विरोध होगा ही. विरोध हो भी रहा है. होना भी चाहिए. क्योंकि, यह योजना कहीं से भी राष्ट्रहित में नहीं है. ऐसे भी यदि मामूली सी दिमाग लगाकर सोचा जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हमला माओवादियों पर नहीं, बल्कि ग्रमीण जनता पर है. फिर भी यदि यह काम सरकार करती है तो देष में आंतरिक युद्ध पैदा होगा. इसलिए सरकार को इसके लिए दूसरे कोई उपाय तलाष करनी चाहिए. सरकार को नक्सली पैदा होने के मूल कारणों तक जाना चाहिए. यहां अमीरों का दिन-प्रतिदिन और अमीर होना और गरीबों का और गरीब होते चले जाना नक्सलवाद के पनपने का प्रमुख कारण है. इसको नजरअंदाज करके हम नक्सली को खत्म नहीं कर सकते हैं.
थोड़ी देर के लिए यदि मान भी लें कि इस तरीके से जंगलों में रहने वाले नक्सली मारे जायेंगे लेकिन, शहरों, महानगरों एवं राजधानियों में जो नक्सली आ बसे हैं, उसकी समाप्ति भला कैसे होगा? नक्सली आज न सिर्फ जंगलों व गांवों में हैं बल्कि कहीं ज्यादा शहरों में रहने लगें हैं. वह भी खादी, खाकी, वर्दी और काले कोटों में, बिल्कुल साफ-सुथरे चेहरों में. ऐसे में माओवादियों पर यह आपरेषन भला किस काम का?
वैसे देखा जाय तो आज -हजयारखंड, छतीसग-सजय़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेष और मध्यप्रदेष के इलाकों में खनिज संपदाओं एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है जिस पर पूंजीपतियों, मल्टीनेषनल कंपनियों एवं मंत्रियों का कडी नजर है. ठीक इसके उलट आदिवासी-मुलवासी अपनी खनिज संपदा व प्राकृतिक धरोहरों को बचाकर रखना चाहते हैं. इसी वजह से वे नक्सली कहलाते हैं. क्योंकि वे तथाकथित विकास नीतियों का विरोध करते हैं. अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं. विस्थापित न होकर खुद की जिंदगी को बचाना चाहते हैं, लेकिन पुलिस के हत्थे च-सजय़ जाते हैं, ऐसे में मूलवासी हथियार न उ-सजय़ाये तो आखिर क्या करे? इतना ही नहीं, संसाधनों के मामले में भले ही वे धनी हों पर हकीकत में वे सभी बदहाली, मुफलिसी और भुखमरी की जिंदगी जीते हैं. फिर वे अपने देष के तथाकथित अभिजात्य और पुंजीपतियों, नेताओं, जनप्रतिनीधियों एवं पुलिस बलों को अपना दुष्मन सम-हजयने लगते है. विकास के नाम पर आज तक सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को अपनी कीमत चुकानी पड़ी है. विस्थापन के खिलाफ जब कभी भी आवाज इन लोगों ने उठाया है उलटे इन्हें नक्सली या विकासविरोधी कहकर पुलिसिया जुल्म, खौफनाक दमन और शोषण के षिकार होना पड़ा है. इस परिस्थिति में वे हिंसक और नक्सली बनने को बाध्य हो जाते हैं. इसलिए बेहतर है माओवादी बनने के कारणों को
-इन्द्रमणि
वैसे देखा जाय तो आज -हजयारखंड, छतीसग-सजय़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेष और मध्यप्रदेष के इलाकों में खनिज संपदाओं एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है जिस पर पूंजीपतियों, मल्टीनेषनल कंपनियों एवं मंत्रियों का कडी नजर है. ठीक इसके उलट आदिवासी-मुलवासी अपनी खनिज संपदा व प्राकृतिक धरोहरों को बचाकर रखना चाहते हैं. इसी वजह से वे नक्सली कहलाते हैं. क्योंकि वे तथाकथित विकास नीतियों का विरोध करते हैं. अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं. विस्थापित न होकर खुद की जिंदगी को बचाना चाहते हैं, लेकिन पुलिस के हत्थे च-सजय़ जाते हैं, ऐसे में मूलवासी हथियार न उ-सजय़ाये तो आखिर क्या करे? इतना ही नहीं, संसाधनों के मामले में भले ही वे धनी हों पर हकीकत में वे सभी बदहाली, मुफलिसी और भुखमरी की जिंदगी जीते हैं. फिर वे अपने देष के तथाकथित अभिजात्य और पुंजीपतियों, नेताओं, जनप्रतिनीधियों एवं पुलिस बलों को अपना दुष्मन सम-हजयने लगते है. विकास के नाम पर आज तक सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को अपनी कीमत चुकानी पड़ी है. विस्थापन के खिलाफ जब कभी भी आवाज इन लोगों ने उठाया है उलटे इन्हें नक्सली या विकासविरोधी कहकर पुलिसिया जुल्म, खौफनाक दमन और शोषण के षिकार होना पड़ा है. इस परिस्थिति में वे हिंसक और नक्सली बनने को बाध्य हो जाते हैं. इसलिए बेहतर है माओवादी बनने के कारणों को
-इन्द्रमणि
नौकरषाह अभी भी नहीं चाहते हैं कि सत्ता का विकेंद्रिकरण हो
संदर्भः झारखंड में पंचायत चुनाव
पंचायत चुनाव में निर्वाचित हुए मुखिया को 32 वर्षो के बाद एक बार फिर चेक काटने का अधिकार मिल गया परंतु लोक सत्ता का सवाल आज भी एक चुनौती बना हुआ है. नौकरषाह जनप्रतिनिधियों पर हावी है. कुछेक जनप्रतिनिधि बढ़चढ़कर लोक सत्ता को सही मायने में धरातल पर उतारने का प्रयास कर रहे हैं. परंतु, नौकरषाह नहीं चाहते हैं कि लोक सत्ता बहाल हो. शायद इसलिए आए दिन अखबारों में खबरें आने लगी हैं कि फलां मुखिया या फलां मुखिया के पति या प्रमुख ने ब्लाॅक कार्यालय में आकर सरकारी काम-काज में बाधा पहुंचाया, गाली-ग्लौज किया या फिर कर्मचारियों के साथ मार-पीट किया. यही आरोप गढ़कर मामले को थाने तक ले जाया जा रहा है. अब तक कईयों पर प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है.जनप्रतिनिधि अपना पक्ष भी रख रहे हैं परंतु उनके तमाम् सबूतों या दलीलों को दरकिनार कर दिये जा रहे हैं. इससे यही सिद्ध होता है कि नौकरषाह नहीं चाहते हैं कि सत्ता का विकेंद्रिकरण हो. इतने लंबे अंतराल तक पंचायत चुनाव का न होने का एक कारण यह भी था.
राज्यगठन के बाद -हजयारखंड में पहली बार पंचायत चुनाव हुआ है. इससे पूर्व 1978 में एकीकृत बिहार के समय पंचायत चुनाव हुआ था. तीन दषक तक पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण ग्राम सत्ता या पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी और इस बीच नौकरषाहों का जनता पर एकाधिकार सा हो गया था. वे जैसा चाहते थे जनता वैसी नाचती थी. लेकिन, अब जब जनता ने अपना जनप्रतिनिधि बहाल कर दिया है तो नौकरषाहों का अपना एकाधिकार और अधिपत्य समाप्त होता दिख रहा है. मनुष्य के अंदर यह मानवीय गुण होता है कि वे अपने नीचे अधिक से अधिक लोगों पर अधिपत्य जमाये. यह नहीं होता देख या अपना कथित अधिकार जाता देख नौकरषाह आज बौखलाये हुए हैं.
रही बात पंचायत चुनाव संपन्न होने की तो यह चुनाव भी राजनीतिक दलों के चुनाव से कम नहीं रहा. फर्क सिर्फ इतना ही रहा कि चुनाव राजनीतिक पार्टियों के बनैर तले नहीं हुआ. लेकिन, इस चुनाव की घोषणा होते ही वैसा ही सब कुछ दिखा जैसे विधान सभा या लोक सभा के चुनाव में दिखता है. तय सीमाओं को तौड़कर सभी ने खर्च किये. दारू-मुर्गा, खस्सी-हंडिया, पार्टी जो चला सो अलग. कुल मिलाकर इस चुनाव में भी जिसका नोट उसका वोट वाला राजनीतिक कोषिष हुई. लेकिन, सारे प्रतिनिधि पैसे के बदौलत ही चुनाव जीते हैं ऐसा भी नहीं है. मतलब बहुत से प्रतिनिधि अपने सामाजिक सरोकारों ओर जनसंघर्षषीलता के आधार पर भी चुनाव जीते हैं. अब जब चुनाव जीत गये तो जीते अधिकांष जनप्रतिनिधियों का रूतबा ही बदल गये. पार्टी नेताओं की तरह चमचमाती कारें, फियेट, मारूती, बोलरो या अन्य दोपहिया या चार पहिया वाहन और उस पर नेम प्लेट ऐसा कि कोई महामहिम ही हांे. कई अध्यक्षों ने तो लाल बत्ती तक लगा लिये.
कहने का मतलब मेरा गाडियों का मेंटेनेन्स का जुगाड़ करना या समाज सेवा के नाम पर स्वांग रचना मात्र नहीं है बल्कि, गांधी जी के सपनों को सकार रूप देना है. इसके लिए जल, जंगल, जमीन की रक्षा, कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था, षिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विस्थापन, पलायन, डायन हत्या, महाजनी और सूदखोरी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों पर पहल करना भी है. और यह सब मुद्दों पर समाधान तभी संभव है जब गांवों व प्रखंड कार्यालयों में कायम ठीकेदारी प्रथा, गुंडों-माफियाओं का कब्जा, नौकरषाहों-अफसरषाही राज व्यवस्था का खात्मा होगा. यह सब एक जनप्रतिनिधि के चाहने से नहीं होगा बल्कि, इसके लिए सभी जनप्रतिनिधियों को एक मंच पर आना होगा जैसे नौकरषाह अपने हितों के लिए एक मंच पा आ जाते हैं. आपकी संख्या भी कम नहीं है. अगर देखा जाए तो -हजयारखंड में 24 जिला, 259 प्रखंड, 34 हजार गांव और 4562 पंचायत है. जिसमें कुल पंचायत जनप्रतिनिधियों की संख्या 53,260 है. ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों एवं अध्यक्षों, उपाध्यक्षों, प्रमुखों को जोड़ लिया तो इसकी संख्या लाखों में पहुच जाती है. संख्या की दृष्टिकोण से पंचायत जनप्रतिनिधियों की एक बड़ी ताकत है लेकिन, कानूनी जानकारी या षिक्षा के मामले में आप कमजोर बने हुए हैं. इसलिए अपनी कमजोरी दूर करिये और लोक सत्ता को अफषाही से मुक्त करते हुए -हजयारखंड में पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाईये.
- इन्द्रमणि
- इन्द्रमणि
DMD ki kavitayen.
jftLVj
dc D;k gqvk] dgka gqvk
crkrs gSa jftLVj-
vDlj Lkcwr ds dke esa
vkrs gSa jftLVj-
D;k dj pqds gSa yksx
lqukrs gSa jftLVj-
vken&[kpZ dk
fn[kkrs gSa jftLVj-
pqids ls dbZ cSBd
djkrs gSa jftLVj-
,d ls gh dbZ uke
fy[kkrs gSa jftLVj-
mifLFkr nl gksa rks
lkS cukrs gSa jftLVj-
ck;sa gkFk ls Hkh fy[kuk
fl[kkrs gSa jftLVj-
i<+s&fy[ks ls vaxqBk
yxokrs gSa jftLVj-
lSdM+ksa dk ukLrk
[kkrs gSa jftLVj-
HkkM+k Hkh vDlj
gM+irs gSa jftLVj-
ekfyd dk xq.k
xkrs gSa jftLVj-
vQljksa dks csodwQ
cukrs gSa jftLVj-
&Mh,eMh fnokdj vYkxqafn;k
&2&
D;k dgwa
D;k ugha
D;k dgwa] D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
thus dh dyk lh[kkus okys dks
viuk thou <+ksrs ns[kk
rkjksa dk jkt crkus okys dks
;gka geus [kksrs ns[kk-
D;k dgwa D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
lcdk ifjp; djkus okys dks
[kqn ls vtuch gksrs ns[kk-
ftlus dgk tkxks&tkxks
mls pknj vks<+dj lksrs ns[kk-
D;k dgwa] D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
lsok dh ckr djus okys dks
geus erych gksrs ns[kk-
eu ds esy le>us okys dks
flQZ diM+s /kksrs ns[kk-
D;k dgaw] D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
ftls le>k vOoy ukfod
dLrh mls Mqcksrs ns[kk-
izse&izse jVus okys dks
uQjr ds cht cksrs ns[kk-
D;k dgwa] D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
tks bZV&bZaV tksM+ egy cuk;k
QwVikFk ij mls lksrs ns[kk-
egfQy esa ftlus lcdks galk;k
rUgk esa mls jksrs ns[kk-
D;k dgwa] D;k ugha
;gka cgqr dqN geus gksrs ns[kk-
&Mh,eMh
fnokdj vYkxqfUn;k
सुप्रीम कोर्ट ने गरीब बच्चों के लिए खोला निजी स्कूलों का दरवाजा
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा अधिकार कानून 2009 को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है- इससे देशभर गरीब लोगों के बीच खुशी की लहर है। कई वर्षो के लंबे संघषों के बाद शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है और अब इसे एक कानूनी स्वरूप दिया गया है। अब इस कानून के आने से बेशक गरीब समुदाय के लोगों को लाभ मिलेगा। क्या-ंक्या लाभ हासिल होगा वह एक नजर में कुछ इस प्रकार है-ं
Ø देश के हर 6 से 14 साल की उम्र के बच्चे को मुफ्त शिक्षा हासिल होगी यानी हर बच्चा पहली से आठवीं कक्षा तक मुफ्त और अनिवार्य रूप से पाय़ेगा।
Øनिजी या सरकारी स्कूलों में नामांकन में टीसी व बर्थ सर्टिफिकेट की बाध्यता नहीं होगी।
Øसभी बच्चों को घर के आस-ंपास के स्कूलों में दाखिला हासिल करने का हक होगा।
Øकिसी भी स्कूल में दाखिले के लिए बच्चे या माता-ंपिता की परीक्षा नहीं ली जायेगी।
Øसभी तरह के स्कूल चाहे वे सरकारी हों, अर्द्धसरकारी हों, सरकारी सहायता प्राप्त हों, गैर सरकारी हों, केंद्रीय विधालय हों, नवोदय विधालय हों, सैनिक स्कूल हों, सभी इस कानून के दायरे में आ गया है।
Øगैर सरकारी स्कूलों को भी 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ्त मुहैया करानी होगी। जो ऐसा नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द कर दी जायेगी.
Øसभी स्कूल शिक्षित-ंप्रशिक्षित अध्यापकों को ही भरती करेंगे और अध्यापक छात्र अनुपात 1ः30 रहेगा। सरकारी स्कूलों के अप्रशिक्षित शिक्षकों को सरकार तीन वर्ष के भीतर प्रशिक्षित करेगी।
Øनिजी या सरकारी स्कूलों में नामांकन में टीसी व बर्थ सर्टिफिकेट की बाध्यता नहीं होगी।
Øसभी बच्चों को घर के आस-ंपास के स्कूलों में दाखिला हासिल करने का हक होगा।
Øकिसी भी स्कूल में दाखिले के लिए बच्चे या माता-ंपिता की परीक्षा नहीं ली जायेगी।
Øसभी तरह के स्कूल चाहे वे सरकारी हों, अर्द्धसरकारी हों, सरकारी सहायता प्राप्त हों, गैर सरकारी हों, केंद्रीय विधालय हों, नवोदय विधालय हों, सैनिक स्कूल हों, सभी इस कानून के दायरे में आ गया है।
Øगैर सरकारी स्कूलों को भी 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ्त मुहैया करानी होगी। जो ऐसा नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द कर दी जायेगी.
Øसभी स्कूल शिक्षित-ंप्रशिक्षित अध्यापकों को ही भरती करेंगे और अध्यापक छात्र अनुपात 1ः30 रहेगा। सरकारी स्कूलों के अप्रशिक्षित शिक्षकों को सरकार तीन वर्ष के भीतर प्रशिक्षित करेगी।
Ø सभी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं होनी अनिवार्य है। इसमें क्लास रूम, टाॅयलेट, खेल का मैदान, पीने का पानी, लंच, लाइब्रेरी आदि शामिल है।
Ø स्कूल न तो प्रवेश के लिए कैपिटेशन फीस ले सकते हैं और न ही किसी तरह का डोनेशन। अगर इस तरह का कोई मामला प्रकाश में आया, तो स्कूल पर 25000 से 50000 रू0 तक का जुर्माना वसूला जायेगा।
Øशिक्षकों के ट्यूशन पर प्रतिबंध होगा।
Ø किसी बच्चे को शारीरिक व मानसिक सजा या दंड़ नहीं दी जा सकेगी। इसका उल्लंघन करनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।
Ø वर्ग आठ तक कोई बच्चा फेल नहीं होगा। सिर्फ उनका एसेसमेंट होगा।
-ंस्रुपीम कोर्ट के आदेश पर आधारित
Ø स्कूल न तो प्रवेश के लिए कैपिटेशन फीस ले सकते हैं और न ही किसी तरह का डोनेशन। अगर इस तरह का कोई मामला प्रकाश में आया, तो स्कूल पर 25000 से 50000 रू0 तक का जुर्माना वसूला जायेगा।
Øशिक्षकों के ट्यूशन पर प्रतिबंध होगा।
Ø किसी बच्चे को शारीरिक व मानसिक सजा या दंड़ नहीं दी जा सकेगी। इसका उल्लंघन करनेवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।
Ø वर्ग आठ तक कोई बच्चा फेल नहीं होगा। सिर्फ उनका एसेसमेंट होगा।
-ंस्रुपीम कोर्ट के आदेश पर आधारित
कोडरमा सहित पूरे राज्य में निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम की उड़ रही है धज्जियां
प्रकाश में आया है परिचय पत्र के नाम पर 15 लाख रूपये वसूले जाने का मामला
-ंइन्द्रमणि
एक अप्रैल 2009 से झारखंड सहित पूरे देश में बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू हो गया है. यह बात अलग है कि अन्य महत्वाकांक्षी कानूनों की तरह यह कानून भी जमीन पर उतर नहीं पाया है. झारखंड सरकार अब तक इस कानून के आलोक में कोई नियमावली नहीं बना पायी है. जो नियम बने भी हैं वह किसी भी तरीके से यानी झारखंडी संस्कृति एवं झारखंडी पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता है. ऐसे में, संबंधित विभाग मनमाने तरीके से विधालय संचालित कर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं. इस कानून को लेकर कोडरमा सहित पूरे राज्य में अधिकारी व अन्य पदाधिकारी उहापोह की स्थिति में है.
इस कानून को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट आदेश या नियमावली नहीं होने के कारण अधिकारी अपने मनमुताबिक कार्य संपादन कर रहे हैं. या फिर यूं कहें कि कमाने-ंखाने के वे सारे तरकीब अपनाये जा रहे हैं जो कानून के विपरीत है. ऐसा ही एक मामला अभी हाल ही में कोडरमा में देखने को मिला है.
मामला यह है कि सरकारी विधालयों के बच्चों से परिचय पत्र बनवाने के नाम पर बड़ी चलाकी से लगभग 15 लाख रूपये अधिकारियों द्वारा उगाही किये जा रहे हैं. ज्ञात हो कि जिला शिक्षा अधीक्षक, कोडरमा के पत्रांक 370 दिनांक 05 अप्रैल 2011 के आलोक में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, कोडरमा ने सभी प्राथमिक व मध्य विधालयों के प्रधानाध्यापकों को एक पत्र (संख्या-85 दिनांक 21 अप्रैल 2011) निर्गत किया है और निर्देश जारी किया है कि बच्चों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बनाने के उद्देष्य से बच्चों का परिचय पत्र बनवाना अनिवार्य है. इसके लिए अग्रेनोमी वेलफेयर सेंटर को नामित किया गया है. यह संस्था सभी छात्र-छात्राओं को फोटोयुक्त परिचय पत्र (लेमिनेशन के साथ) दिये जायेंगे. इसके लिए प्रत्येक छात्र-छात्राओं को 10 रूपये जमा करने का स्पष्ट आदेश जारी किया गया है. वहीं, विकलांग छात्र-छात्राओं से पैसे नहीं लेने का स्पष्ट निर्देश है.
यह कार्यक्रम चाहे जैसा भी हो पर यह गैर कानूनी व अपराधपूर्ण भी है. क्योंकि, इस देश में निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 लागू है. जिसमें बच्चों से किसी भी तरह का शुल्क नहीं लेने का प्रावधान है. सवाल 10 रूपये का नहीं है बल्कि, सवाल व्यवस्था और कानून का है. वैसे, देखा जाय तो 10 रूपये बहुत छोटा रकम लगता है परंतु गणितीय सुत्र के हिसाब से जोड़ा जाये तो यह 10 रूपया 15 लाख रूपये तक पहुंच जाता है. क्योंकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग एक लाख 50 हजार बच्चे नामांकित है और परिचय पत्र के नाम पर उनसे 10 रूपये वसूले जा रहे हैं. इस हिसाब से कुल 15 लाख रूपये होता है. यह रूपैया किस कोष में जायेगा यह बताने वाला कोई नहीं है. इस परिस्थिति में यहां कई तरह के उहाफोह की स्थिति बनी हुई है. जितनी मुंह उतनी बातें हो रही है.
कुल मिलाकर, झारखंड में नियमावली नहीं बनने के कारण सरकारी विधालयों में कानून का बुरा हाल है. किसी-किसी जिला में अखबारों में विज्ञापन निकलवाने के बाद भी जिले में अवस्थित निजी स्कूल सरकार को छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की संख्या, फीस, वर्ग कक्ष व अन्य सुविधाओं की जानकारी नहीं दे रहे हैं. प्राइवेट विधालयों के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार की ओर से हमलोगों को कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है. आज कोडरमा सहित अधिकांश जिलों में ग्राम शिक्षा समिति और स्कूल प्रबंधन समिति ये दोनों कमिटियां कार्य कर रही है और इन दोनों कमिटियों के चक्कर में स्कूल के प्रधानाध्यापक बेमौत मारे जा रहे हैं. कानून के तहत जितने सारे प्रावधान किये गये हैं उस पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है. आखिर इस कानून का क्या होगा?
एक अप्रैल 2009 से झारखंड सहित पूरे देश में बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू हो गया है. यह बात अलग है कि अन्य महत्वाकांक्षी कानूनों की तरह यह कानून भी जमीन पर उतर नहीं पाया है. झारखंड सरकार अब तक इस कानून के आलोक में कोई नियमावली नहीं बना पायी है. जो नियम बने भी हैं वह किसी भी तरीके से यानी झारखंडी संस्कृति एवं झारखंडी पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता है. ऐसे में, संबंधित विभाग मनमाने तरीके से विधालय संचालित कर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं. इस कानून को लेकर कोडरमा सहित पूरे राज्य में अधिकारी व अन्य पदाधिकारी उहापोह की स्थिति में है.
इस कानून को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट आदेश या नियमावली नहीं होने के कारण अधिकारी अपने मनमुताबिक कार्य संपादन कर रहे हैं. या फिर यूं कहें कि कमाने-ंखाने के वे सारे तरकीब अपनाये जा रहे हैं जो कानून के विपरीत है. ऐसा ही एक मामला अभी हाल ही में कोडरमा में देखने को मिला है.
मामला यह है कि सरकारी विधालयों के बच्चों से परिचय पत्र बनवाने के नाम पर बड़ी चलाकी से लगभग 15 लाख रूपये अधिकारियों द्वारा उगाही किये जा रहे हैं. ज्ञात हो कि जिला शिक्षा अधीक्षक, कोडरमा के पत्रांक 370 दिनांक 05 अप्रैल 2011 के आलोक में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, कोडरमा ने सभी प्राथमिक व मध्य विधालयों के प्रधानाध्यापकों को एक पत्र (संख्या-85 दिनांक 21 अप्रैल 2011) निर्गत किया है और निर्देश जारी किया है कि बच्चों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बनाने के उद्देष्य से बच्चों का परिचय पत्र बनवाना अनिवार्य है. इसके लिए अग्रेनोमी वेलफेयर सेंटर को नामित किया गया है. यह संस्था सभी छात्र-छात्राओं को फोटोयुक्त परिचय पत्र (लेमिनेशन के साथ) दिये जायेंगे. इसके लिए प्रत्येक छात्र-छात्राओं को 10 रूपये जमा करने का स्पष्ट आदेश जारी किया गया है. वहीं, विकलांग छात्र-छात्राओं से पैसे नहीं लेने का स्पष्ट निर्देश है.
यह कार्यक्रम चाहे जैसा भी हो पर यह गैर कानूनी व अपराधपूर्ण भी है. क्योंकि, इस देश में निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 लागू है. जिसमें बच्चों से किसी भी तरह का शुल्क नहीं लेने का प्रावधान है. सवाल 10 रूपये का नहीं है बल्कि, सवाल व्यवस्था और कानून का है. वैसे, देखा जाय तो 10 रूपये बहुत छोटा रकम लगता है परंतु गणितीय सुत्र के हिसाब से जोड़ा जाये तो यह 10 रूपया 15 लाख रूपये तक पहुंच जाता है. क्योंकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग एक लाख 50 हजार बच्चे नामांकित है और परिचय पत्र के नाम पर उनसे 10 रूपये वसूले जा रहे हैं. इस हिसाब से कुल 15 लाख रूपये होता है. यह रूपैया किस कोष में जायेगा यह बताने वाला कोई नहीं है. इस परिस्थिति में यहां कई तरह के उहाफोह की स्थिति बनी हुई है. जितनी मुंह उतनी बातें हो रही है.
कुल मिलाकर, झारखंड में नियमावली नहीं बनने के कारण सरकारी विधालयों में कानून का बुरा हाल है. किसी-किसी जिला में अखबारों में विज्ञापन निकलवाने के बाद भी जिले में अवस्थित निजी स्कूल सरकार को छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की संख्या, फीस, वर्ग कक्ष व अन्य सुविधाओं की जानकारी नहीं दे रहे हैं. प्राइवेट विधालयों के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार की ओर से हमलोगों को कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है. आज कोडरमा सहित अधिकांश जिलों में ग्राम शिक्षा समिति और स्कूल प्रबंधन समिति ये दोनों कमिटियां कार्य कर रही है और इन दोनों कमिटियों के चक्कर में स्कूल के प्रधानाध्यापक बेमौत मारे जा रहे हैं. कानून के तहत जितने सारे प्रावधान किये गये हैं उस पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है. आखिर इस कानून का क्या होगा?
Ek Sarthak Pahal
f'k{kk
vf/kdkfj;ksa o eaf=;ksa ij djkjk rektk % Hkh{kkVu dj fo/kky; Hkou cuokus ij
etcwj xzkeh.k
& bUnzef.k@Mh,eMh
fnokdj
f’k{kk ds uke ij djksM+ksa [kpZ
ds ckotwn Hkh{kkVu dj fo/kky; Hkou cuokus ij etcwj gq, xzkeh.k- D;ksafd] loky
gS cPpksa ds Hkfo"; dk- ;g ekeyk gS fxfjMhg ftyk varxZr ysnk xkao dk- tks
fxfjMhg iz[kaM ds if’peh Nksj ij vofLFkr gS- yxHkx 40 xkaoksa ds 450 xjhc
cPpksa dk Hkfo"; fVdk gS ,d ek= Vhvkjih mPp fo/kky; ysnk esa tgka ek= rhu
dejs ¼20 X 15 dk½ gS- dejs ds chpksa&chp gS
eksVk&lk FkEHk- ,d&,d cSp ij vkB ls ukS cPpsa cSBrs gSa- nsj ls vkus
okys cPps txg ds vHkko esa okil ?kj ykSV tkrs gSa- bl fo/kky; esa Nk=ksa dh
vis{kk Nk=kvksa dh la[;k vf/kd gS- D;ksafd] vfHkHkkodx.k csfV;ksa dks 'kgj esa
j[kdj i<+kus esa vleFkZ gSa- ,slk Hkh ugha gS fd fo/kky; fodkl gsrw
xzeh.kksa us igy ugha dh- ij] foHkkx ds dku esa twa rd ugha jsaxk- {ks=h;
la?kZ"k lfefr ds }kjk Hkou fuekZ.k o i;kZIr f’k{kdksa dh ekax dks ysdj dbZ
ckj mik;qDr ,oa vU; mPpkf/kdkfj;ksa dks fy[kk] /kjuk&izn’kZu] jSyh vkfn ds
ek/;e ls Kkaiu lkSaik x;k- exj] vktknh ds 60 lkyksa ds ckn rd flQZ v’oklu feyrk
jgk- ;gka xfBr cky lkaln ds lnL;ksa o Nk=&Nk=kvksa }kjk ftyk fxfjMhg esa ,d
,sfrgkfld jSyh fudkyh x;h vkSj mDr fo/kky; ds dfe;ksa o [kkfe;ksa dks nwj djus
gsrw Kkaiu fn;k x;k- ysfdu] bldk Hkh dksbZ vlj inkf/kdkfj;ksa ij ugha iM+k- ekuks
mudh laosnuk gh ej x;h gksa-
dqy feykdj ns[kk tk; rks ljdkj dh
nksgjh uhfr dk f’kdkj gS ;g fo/kky;- tcfd] bl fo/kky; esa 75 izfr’kr cPps nfyr]
'kksf"kr] fiNM+k ,oa vkfnoklh gSa- ljdkj dh nksgjh o xanh uhfr ls gkj
ekudj xzkeh.kksa us [kqn dej dl fy;k gS vkSj vius neij fo/kky; fuekZ.k djus rwy
x;s gSa- yksxksa us Hkh{kkVu djus dk fu.kZ; fy;k- 17 lnL;h Vhe dk xBu dj
?kj&?kj tkdj fo/kky; ds fy, pank fd;k tk jgk gS- nks dejksa dk dke izxfr ij
gS- bl Vhe dk usr`Ro rks iwjs turk ds gkFkksa esa gSa- ckotwn fo’ks"k :I
ls jkes’oj iz- oekZ] vfuy iz- oekZ] lqjs’k] fnokdj vkfn dh Hkwfedk fo’ks"k
gS- Hkh{kkVu ysnk] vyxqUnk] ctVks] flUnofj;k iapk;r ds lHkh xkaoksa esa fd;k tk
jgk gS- yksx c<+p
ns jgs gSa- ftl fo/kky; u ,;j QkslZ] ch,l,Q f’k{kd] nkjksxk] lkfgR;dkj fn;k
ns’k dks vkt ogh fo/kky; ljdkj dh uhfr;ksa ls vkB&vkB vkalw cgk jgh gS-
fo/kky; dks fdlh izdkj dk ljdkjh lg;ksx ugha fey ik jgk gS- yxkrkj o"kksZ
ls mis{kk dk na’k >syrs gq, Vhvkjih fo/kky; dk dk;kdYi vc ljdkj ugha cfYd]
LFkkuh; turk dj jgh gS- ;g iz;kl u flQZ vuks[kk gS cfYd f’k{kk vf/kdkfj;ks&eaf=;ksa
ij djkjk rektk Hkh gS-
koderma ka haal 2
dksMjek esa /kM+Yys ls py jkg gS uu T;qfMf’k;y LVkEi isij dk
CySdeSfyax dk /ak/kk
&
bUnzef.k lkgw
dksMjek esa o"kksZ ls uu T;qfMf’k;y LVkEi isij ¼xSj
U;kf;d eqnzkad½ dk ?kksj vHkko gSA NksVs jde ds LVkEi isij ij Hkkjh jde dh
olwyh dh tk jgh gSA 2 :i;s ls ysdj 10 :i;s dk LVkEi isij o"kksZ ls ns[kus
rd dks ugha ulhc gks jgk gSA fygktk] 2] 5 ;k 10 :i;s ds LVkEi isij ds txg 20]
50 ;k 100 ds LVkEi isij ls dke pyk;k tk jgk gSA og Hkh rhu&pkj xqus ds nj
ijA bl laca/k esa lkekftd dk;ZdrkZ lg vf/koDrk f’ko uanu 'kekZ us dbZ ckj bl
lanHkZ esa ftyk iz’kklu dks fyf[kr f’kdk;r ntZ djk;h gSA le;≤ ij ftys
esa yxus okyh turk njckj esa Hkh ekeyk dbZ ckj mBs gSa ijarq urhtk vkt rd flQj
jgk gSA fygktk] vke turk dk dbZ t:jh dk;Z izHkkfor gks jgk gS vkSj vke turk ij
vkfFkZd cks> dkQh c<+ lk x;k gSA
crk;k tkrk gS fd o"kksZ ls dksMjek ftyk esa tes
inkf/kdkjh }kjk tku&cq>dj LVkEi isij dk d`f=e vHkko cuk;k x;k gSA ftlls
vf/kdkjh bl vfu;ferrk ls oS/k&voS/k rjhds ls Lo;a ekykeky gks gh jgs gSA
lkFk gh] vizR;{k :i ls LVkEi HksaMjksa dks Hkh ekykeky djus esa lg;ksx iznku dj
jgs gSaA iz’kklu dks lc dqN dh tkudkjh gksrs gq, Hkh os viuh vka[k can fd;s gq,
gSaA fygktk] iz’kklu ds ukd ds uhps /kM+Yys ls CySdeSfyax dk /ak/kk py jgk gS
vkSj vke&voke ywVh tk jgh gSA
koderma ka haal
dksMjek ds thounkf;uh izÑfr dk gks jgk vuki&luki
nksgu
bUnzef.k
lkgw
oSls dgk
tkrk gS fd dksMjek bykdk dHkh Hkw[kk vkSj lw[kk u jgk- D;ksafd ;gka izpqj ek=kk
esa [kfut laink] taxy vkSj izd`fr dk 'kk'or lkSan;Z O;kIr FkkA vkdk’k esa
eaMjkrs ckny ls [khapdj okfj’k djkus dh {kerk ;gka dh izd`fr esa Fkk- ,sls esa
izd`fr dks dkSu ugha iwtsxk ;gka \ 'kk;n blfy, ;gka T;knkrj eafnj igkM+ksa o
taxyksa esa vofLFkr gSA ;k ;wa dgas fd ;gka dh izd`fr thounkf;uh gSA oSls]
izd`fr thou nsrh gh gS] ij ;gka dh izd`fr dqN [kkl gSA vcj[k] CywLVksu] xkjusV]
rqjeqyhu] QsylsQj] DokVZt] csfj;y vkfn tSls [kfutksa dk ;gka HkaMkj gSA ijarq rFkkdfFkr
fodkl ds fy, izd`fr dk vuki&'kuki nksgu vkt ;gka dh fu;fr cuh gqbZ gSA ftys
esa yxHkx 1000 dh la[;k esa Øs'kj vkSj ntZuksa [knku blds izek.k gSaA crk;k
tkrk gS fd >kj[kaM dk nwljk lcls cM+k [knku vEcknkgk ¼dksMjek½ gSA ,sls
[knkuksa ,oa Øs'kjksa dh c<+rh la[;k dh otg ls vc ;gka dh izd`fr ojnku ugha
cfYd vc vfHk'kki fl) gks jgh gSA
HkkSxksfyd fLFkfr ds
eqrkfcd ;g ftyk iwjh rjg igkM+ksa o taxyksa ls f?kjk gqvk Fkk] tcfd vkt fLFkfr
;g gS fd vkjf{kr ou 15]630 gsDVs;j vkSj lqjf{kr ou 73]408 gsDVs;j 'ks"k jg
x, gSaA bl rjg dqy 89-038 gsDVs;j ou Hkwfe ou {ks= ds ,d pkSFkkbZ Hkkx ij Hkh
vc taxy ugha jgk gSA
b/kj ,d n'kd ls izkd`frd
taxyksa dks csfglkc rjhds ls mtkM+k tk jgk gSA Ø'kjksa dh otg ls vkt iwjk bykdk
iznwf"kr gks x;k gSA iwjk dk iwjk bykdk taxyfoghu vkSj tyfoghu gksrk tk
jgk gSA bldk O;kid vlj d`f"k ij iM+k gSA chrs ikap o"kksZa ls yxkrkj
lq[kkM+ o vdky dh leL;k blh dk ifj.kke gSA izd`fr dk va/kk?kqa/k nksgu ls gh
yxkrkj catj gksrh tehu] c<+rs iznw"k.k o fxjrs Hkw&ty ds izfr u
iz'kklu fpafrr gS vkSj u gh ;gka ds tuizfrfuf/k ghA yksx dgrs gSa fd iz'kklu
fpafrr blfy, ugha gS D;ksafd mls izfrekg ca/kh&ca/kkbZ jde igqaqprh gSA jgh
ckr tuizfrfuf/k;ksa dh rks os bl ekeys esa vkokt D;ksa mBk;saxsA mudk ;k reke
NqVHkS;k usrkvksa dk [kqn dh QSfDVª;ka o [knku lapkfyr gSa vkSj gtkjksa dh
dekbZ izfrekg gks jgh gSaA ,slh ifjfLFkfr esa vke turk dks blds fy, vkxs vkuk
pkfg, ysfdu turk ,dtwV gS gh ugha] vkSj loky ;g Hkh mBrk gS fd fcYyh ds xys esa
?kaVh dkSu cka/ks\ fygktk] vkt yxHkx lHkh xkao Hkw[k] chekjh] xjhch] I;kl]
vdky] lq[kkM+ tSlh leL;k ls tw> jgs gSaA
Ø'kjksa dh c<+rh la[;k
dh otg ls gh ;gka dh izkd`frd lkSan;Zrk ,oa gfj;kyh yxkrkj lekIr gksrh tk jgh
gSA ;gka 12]958 gsDVs;j tehu [ksrh yk;d gS tks Øs'kjksa ls mRiUUk iznwf"kr
/wky ¼MLV½ ls ;gka dh tehu yxkrkj catj gks jgh gSA ;g fLFkfr ns[k fdlku [kkls
fpafrr gSaA pkgs og fdlku dVfj;kVkaM ds eatwj vkye] eks0 vLye] eks0 bczkfge gks
;k uoy'kkgh ds jkepanz lkc] fcjtw eaMy] cnjh iafMr] ,rokjh lko----A lHkh ds
nq[k ,d leku gSA lHkh pkgrs gSa fd bl bykds dk Ø'kj can gks ij os lHkh can djus
ds fy, la?k"kZ djus ls Mjrs gSaA os Ø'kj ekfydksa ls iaxk ugha ysuk pkgrs
gSa] D;ksafd mudh igqap vkSj iSlk lHkh txg gkoh gSA in] iSlk vkSj igqap dh otg
ls xjhcksa] etnwjkas ,oa fdlkuksa dks vkt U;k; ugha fey ik jgk gSA
MLV
Qkadrs yksx vkSj catj gksrh tehu
dksMjek ftyk esa lcls
T;knk jktLo pqdkus okys ,oa Qly mRiknu djus okys {ks= Mksepkap bu fnuksa
iznw"k.k] xanxh] chekjh vkSj Hkwfe dk catjhdj.k ds nkSj ls xqtj jgk gSA bl
leL;k dh fodjkyrk dk vanktk blh ls yxk;k yk tk ldrk gS fd yxHkx 200 oxZ fdeh0
{ks= esa yxHkx 700 Øs'kj] dksMjek lnj esa 300 ,oa ejdPPkks iz[kaM esa yxHkx 300
vkSj yxHkx 200 dh la[;k esa NksVs&cM+s [knku gSaA panokjk iz[kaM esa Hkh
yxHkx 100 Øs'kj gSaA [knku vkSj Øs'kjksa dh otg ls rsth ls taxy mtM+ jgk gS
vkSj ogha nwljh vksj iznw"k.k] xanxh vkSj chekjh bu fnuksa Mksepkap ,oa
Mksepkap ds vkl&ikl ds bykds dh fu'kkuh cu xbZ gSA iRFkjksa ds VwVus ,oa
muls mM+us okys /wkyd.k ¼MLV½ ls bl bykds ds lHkh isM+ksa dh ifÙk;ka
lQsn&lQsn lh gks xbZ gSA cfj;kjMhg ls dksMjek rd cxSj gsyesV igus
eksVjlkbfdy ls xqtj ikuk nqHkj gSA
'kke ds oDr rks ikl ls
ikap ls 10 QhV dh nwjh Hkh fn[kuk eqf'dy gksrk gSA dgk tkrk gS fd 'kke dks
ok;qeaMy BaMk gksus ds dkj.k /wkyd.k Åij mBus dh ctk; uhps gh eaMjkrk jgrk gSA
bl {ks= esa c<+rk gqvk /wkyd.k] xSl] c<+rk lkSj] fnu&izfrfnu
iznwf"kr gksrk ty vkSj u"V gksrs isM+&ikS/sk iznw"k.k ds
[krjs dh vksj c<+krs tk jgs gSaA
Qqyofj;k] /kjxkao] banjok]
uoy'kkgh] igkM+iqj] uoknk] us#igkM+h] dVfj;kVkaM] xsanokMhg] lyS;MhV] iapxkaoka
eksM+] iqjukMhg] egs'kiqj] Mqejx<+gk] ejdPPkks] cfj;kjMhg] pekjks] dkjk[kwV]
cgknqjiqj] ukokMhg vkfn ntZuksa xkao ds vke ukxfjdksa dk thou bu Ø'kjksa dh otg
ls ne?kksVw cu x;k gSA u flQZ Øs'kjkssa esa dk;Zjr etnwj blds f'kdkj gks jgs
gSa cfYd vklikl ds yksx vkSj vkus&tkusokyksa ij Hkh bldk csgn cqjk vlj iM+
jgk gSA bldh jksdFkke ds fy, iwoZ mik;qDr f’ko 'kadj frokjh us vius Lrj ls
csgrj dne mBk;k Fkk] ysfdu] mudk rcknyk gksrs gh fLFkfr fQj tl dh rl gks x;h
gSA
dgk tkrk gS fd dz’kjksa dh
otg ls bl bykds ds yxHkx 10]000 gsDVs;j {ks= e#Hkwfe cu pqdk gSA lM+d ds
nksuksa fdukjs dh tehu ns[kus ls bldk lgt vanktk yx tkrk gSA yksx viuh csdkjh
vkSj csjkstxkjh nwj djus ds fy, taxy o o`{kksa dh dVkbZ djrs gSaA yksx lkbfdy
ij bls ykndj Mksepkap&dksMjek cktkj esa cspdj viuk xqtkjk djrs gSaA l[kqvk
,oa vU; dherh ydfM+;ka dk VqdM+k&VqdM+k dj cktkj esa ys tkdj csprs gSaA
izfr lkbfdy 100 ls 150 #i;k esa bldh fcØh gksrh gSA u flQZ Mksepkap] cxM+ks]
dksMjek] uoy'kkgh vkfn pkSd pkSjkgs ij fLFkr gksVyksa esa eksVk&eksVk ydM+h
tykou ds dke esa ykrs gSaA laiUUk ifjokjksa esa Hkh ydM+h dk gh bLrseky gksrk
gSA dgk tkrk gS fd dks;yk vkSj xSl ls vHkh ;gka ydM+h lLrk gSA lkbfdy ij lokj
ydM+h cspus okys etnwj vkSj cks>k
bl rjg yxrkj dVrs taxy]
c<+rs Ø'kjksa dh la[;k ls bl {ks= ds gtkjksa ,dM+ Hkwfe catj gksrh tk jgh
gSA ijaikfjd tylzksr Hkjrk tk jgk gSA dqy feykdj dksMjek ds ,d Hkh xkao
i;kZoj.kh;] lkaLd`frd] jktuhfrd] vkfFkZd] lkkekftd vkSj 'kS{kf.kd
n`f"Vdks.k ls le`) vkSj [kq'kgky ugha gSA
bl bykds
dh izeq[k chekfj;ka
xzkeh.k crkrs gSa fd u
flQZ Ø'kjksa ,oa [knkuksa esa dk;Zjr etnwj xaHkhj chekfj;kas ds f'kdkj gks jgs
gSa cfYd vke ukxfjd Hkh bu fnuksa Ø'kjksa ds MLV ls chekj iM+ jgs gSaA crk;k
tkrk gS fd dz’kj izHkkfor bykdksa esa izfro"kZ 25 ls T;knk yksxksa dh ekSr
Vhoh ,oa flyksdksfll dh pisV esa vkus ls gksrh gSA oSls] bl bykds dh izeq[k
chekfj;ksa esa ls MLV ,ythZ] lkbul] nek] Vhoh] flyksdksfll] bLuksQhfy;k] [kkalh
vkfn gSaA bl bykds esa ,sls jksfx;ksa dh la[;k yxkrkj c<+rh gh tk jgh gSA
,sls dgk tkrk gS fd fdlh
Hkh vkS|ksfxd {ks= esa ikap lkS ekbØksxzke izfr D;wfcd ehVj MLV lguh; ekuk tkrk
gSA ijarq] bl {ks= ds yksx blls rhu xq.kk T;knk MLV Qkad tkrs gSA yksx vkt Hkh
iwoZ mik;qDr f’ko 'kadj frokjh ds }kjk mBk;s dne dh ljkguk djrs gSa vkSj vis{kk
djrs gSa fd dksMjek dks gj mik;qDr f’ko 'kadj frokjh tSlk gksA rHkh dksMjek dh
le`f) vkSj [kq’kgkyh cjdjkj jg ik;sxhA
¼ys[kd leiZ.k laLFkku ds lfpo ,oa Lora=
i=dkj gSaA½
गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करनेवाले परिवार के बच्चों को गुणवतापूर्ण षिक्षा देने की गरज से लाया गया है आरटीई 2009
-इन्द्रमणि साहू
झारखंड में निःषुल्क एवं अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम एक अप्रैल 2010 से लागू हो गया है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करनेवाले परिवार के बच्चों को गुणवतापूर्ण षिक्षा देने की गरज से यह अधिनियम लाया गया है। जिसे निःषुल्क एवं अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के नाम से जाना जाता है।
उल्लेखनीय है कि षिक्षा को मौलिक अधिकार बने हुए तीन साल से ज्यादा वक्त बीच चुका है। लेकिन, अभी भी यह अधिकार जमीन पर उतरता दिख नहीं रहा है। और तो और, आरटीई के मानकों के अनुरूप देष के 95 फीसदी स्कूलों में कोई संरचना नहीं है। कानून लागू होने के बाद कुछ प्रगति जरूर हुई है पर यह काफी नहीं है। इस कानून के मुताबिक हर स्कूल में जितनी कक्षा उतने षिक्षक और प्रधानाध्यापक के लिए कार्यालय होना चाहिए। साथ ही, स्कूल का भवन सभी मौसम के लिए उपयुक्त होना चाहिए। कानून के मुताबिक स्कूल में छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय, एक खेल का मैदान, समुचित पाठ्य सामग्री से युक्त एक पुस्तकालय, बिजली, कम्प्यूटर इत्यादि की सुविधा इत्यादि होनी चाहिए। इसके लिए जिला षिक्षा अधीक्षक को नोडल पदाधिकारी बनाया गया है। लेकिन, उनके स्तर से अभी तक इसके अनुपालन के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया है। ग्राम षिक्षा समिति को भंग किये बगैर जैसे-तैसे और आनन-फानन में लगभग सभी विधालयों में स्कूल प्रबंधन समिति का गठन जरूर कर लिया गया है। इस समिति के सदस्यों का कार्यषाला के जरिए उन्मुखीकरण भी लगभग सभी जिलों किया गया है। यह महज पैसे खर्च करने के उद्देष्य से किया गया। व्यवहार में अभी भी ग्राम षिक्षा समिति ही सक्रिय और विधालयों पर हावी है। सच्चाई यह भी है कि विधालय के प्रधानाध्यापक उक्त दोनों समितियों के चक्कर में पिसे जा रहे हैं।
झारखंड में निःषुल्क एवं अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम एक अप्रैल 2010 से लागू हो गया है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करनेवाले परिवार के बच्चों को गुणवतापूर्ण षिक्षा देने की गरज से यह अधिनियम लाया गया है। जिसे निःषुल्क एवं अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के नाम से जाना जाता है।
उल्लेखनीय है कि षिक्षा को मौलिक अधिकार बने हुए तीन साल से ज्यादा वक्त बीच चुका है। लेकिन, अभी भी यह अधिकार जमीन पर उतरता दिख नहीं रहा है। और तो और, आरटीई के मानकों के अनुरूप देष के 95 फीसदी स्कूलों में कोई संरचना नहीं है। कानून लागू होने के बाद कुछ प्रगति जरूर हुई है पर यह काफी नहीं है। इस कानून के मुताबिक हर स्कूल में जितनी कक्षा उतने षिक्षक और प्रधानाध्यापक के लिए कार्यालय होना चाहिए। साथ ही, स्कूल का भवन सभी मौसम के लिए उपयुक्त होना चाहिए। कानून के मुताबिक स्कूल में छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय, एक खेल का मैदान, समुचित पाठ्य सामग्री से युक्त एक पुस्तकालय, बिजली, कम्प्यूटर इत्यादि की सुविधा इत्यादि होनी चाहिए। इसके लिए जिला षिक्षा अधीक्षक को नोडल पदाधिकारी बनाया गया है। लेकिन, उनके स्तर से अभी तक इसके अनुपालन के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया है। ग्राम षिक्षा समिति को भंग किये बगैर जैसे-तैसे और आनन-फानन में लगभग सभी विधालयों में स्कूल प्रबंधन समिति का गठन जरूर कर लिया गया है। इस समिति के सदस्यों का कार्यषाला के जरिए उन्मुखीकरण भी लगभग सभी जिलों किया गया है। यह महज पैसे खर्च करने के उद्देष्य से किया गया। व्यवहार में अभी भी ग्राम षिक्षा समिति ही सक्रिय और विधालयों पर हावी है। सच्चाई यह भी है कि विधालय के प्रधानाध्यापक उक्त दोनों समितियों के चक्कर में पिसे जा रहे हैं।
आखिर इस परिस्थिति में सबको षिक्षा और समान षिक्षा का क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने 6 से 14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य षिक्षा देने वाले षिक्षा अधिकार कानून को संवैधानिक रूप से वैध ठहरा कर सारे भ्रम को दूर कर दिया है। कोर्ट ने सरकारी, सहायता प्राप्त तथा बगैर सहायता के चलने वाले स्कूलों को भी गरीब बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित करने का आदेष दिया है, सिर्फ गैर सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे मुक्त रखा गया है। इस फैसले के बाद अब प्राइवेट स्कूलों को गरीब तबके के बच्चों को अपने यहां दाखिला देना होगा। इसे एक बड़ी पहल कहा जा सकता है। इससे न सिर्फ गरीब बच्चों के लिए षिक्षा के दरवाजे खुलेंगे, बल्कि यह षिक्षा के क्षेत्र में मौजूद अमीर और गरीब के बीच की खाई एक हद तक मिटेगा। प्राइवेट स्कूल अभी भी इस कानून पर ऐतराज जताते हैं। जाहिर है मुनाफे के गणित पर चलने वाले निजी संस्थानों को यह फैसला आर्थिक रूप से नुकसानदेह लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस महत्वपूर्ण फैसले के माध्यम से प्राईवेट स्कूलों को सामाजिक जवाबदेही का भी एहसास कराया है। सभी को गुणात्मक षिक्षा मुहैया कराने के लिए यह कदम ही काफी नहीं है। इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार को कमर कसकर आगे आना होगा। इसके लिए स्कूलों में पर्याप्त संरचनाओं का बंदोवस्त करना पड़ेगा। हालांकि, इसके लिए समय बहुत कम है। कानून के मुताबिक
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
main aur meri baicheni
eSa vkSj esjh cSpsuh
irk ugha]
vkneh ;g D;ksa ugha lksprk gS fd tc eSaus viuk esgurkuk ys gh fy;k gS rks fQj
esjk ml ij ;k ml laLFkku ij ,glku ;k rjDdh dk ;ksxnku dSlk\ ysfdu] ;gka vkneh viuk
esgurkuk ysus ds ckn Hkh eu esa ;g vkl yxk;s j[krk gS fd esjk ;ksxnku ;k ,glku
og O;fDr ;k laLFkk ;kn j[ks] xq.k xk;s vkSj f<+
eSaus
vius gh deZ{ks= vkSj laLFkk ds vanj ;g ns[kk gS fd tks lkFkh tqM+s] ekuns; Hkh
fy;s vkSj ;g dgrs ik;k x;k fd eSaus gh ml laLFkk dks ;gka ls ogka rd igqapk;k-
laLFkk dks vkxs c<+k;k gS- bruk gh ugha] laLFkk ;k daiuh NksM+us ds ckn os ¼ogh
ekuns; ;k osru ikusokys lkFkh½ ml laLFkk ;k daiuh dk [kwc f’kdk;r Hkh djrs gSa-
iqu% tqM+us ds ckn Hkh muds eu esa ;g ckr cjdjkj jgrh gS fd eq>s ;gka ls ,d
u ,d fnu viuk dke fudy tkus ds ckn] fodYi fey tkus ds ckn] ;k LokFkZ iwjk gks
tkus ds ckn fudy gh tkuk gS bl Hkkouk esa fyIr O;fDr Hkyk ml laLFkk ;k daiuh ds
mn~ns’;ksa dks Hkyk fdruk iwjk dj ik;sxk- D;k ,sls O;fDr ml laLFkk ;k daiuh dk
dke iwjs ru&eu&/ku yxkdj dj ik;sxk\ ,sls lkfFk;ksa dk ;gh lksp iuirk gS
fd gesa bl laLFkk dks vkxs D;ksa c<+kuk] uke gksxk rks budk ;k laLFkk dk]
blesa esjk D;k Qk;nk- cgqr T;knk izksfQV Hkh gks x;k rks izksfQV caVsxk gh
ugha] eq>s rks flQZ viuk ekuns; ;k osru ij gh rks thuk gS- bl rjg dh
nqHkkoZukvksa ds f’kdkj O;fDr laLFkk ;k ekfyd dk fodkl ;k izksfQV dks ugha
jksdrk gS cfYd] vius fodkl o O;fDrRo dks foLrkj :i nsus ls jksdrk gS-
euq";
ds vanj bZ";kZ] }s"k vkSj tyu dh Hkkouk jgrk gh gS ftlls mcjuk gj
fdlh ds cqrs dh ckr ugha gS- eSaus bls xkSj ls dbZ;ksa dks ns[kk gS- bl rjg
vkneh tc iwjs eu ls dke ugha djrk gS vkSj viuk uke ;k ;’k ;k iqjLdkj Hkh ikuk
pkgrk gS- ,slh ifjfLFkfr esa ekfyd ;k laLFkk pkgdj Hkh ,sls yksxksa dks
fo’ks"k voljksa ls Hkh oafpr dj nsrk gS-
vkt gj
fdlh dks vkRefujh{k.k vkSj xgjkbZ ls vkRefoospu djus dh t:jr gS] ysfdu bl
izfdz;k ls xqtjus ds ctk; fcuk lksps&le>s nwljs ij ;k vius ckWl ;k
laLFkk ds mij vkjksi yxk tkrs gSa- tks u muds fgr esa gksrk gS vkSj u laLFkk ds
fgr esa- viuk bZxks ds pyrs viuk HkfOk"; pkSiV dj ysrk gS-
oSls
ns[kk tk; rks ;gka gj ;qok lkFkh dh viuh ,d cSpsuh gS] ges’kk og vius thou dk
edln qB cksyuk pkfg, bu lkjs rF;ksa dks os tkuus esa viuk fnekx og ugha
yxkrk gS ftlls mUgsa ;g lc gkfly ugha gks ikrk gS-
ogha]
eSaus dbZ;ksa dks xkSj ls ns[kk gS fd tc dksbZ lkFkh ;qok fdlh laLFkku ;k daiuh
esa tqM+rk gS rks ukSdjh djus ds lkFk&lkFk ;g vis{kk iky ysrk gS fd eSa Hkh
ckWl gh cuwa- ikyuk Hkh pkfg,] egRokdak{kh gksuk dksbZ cqjk ugha gS ij ckWl ds
lkjs xq.k dks os ugha viukrs gSa- ckWl dh tks tckcnsgh] ftEesnkjh] Vkbe easVu]
Vsa’ku] esgur] ihM+k bR;kfn dks os ns[krs gSa vkSj u gh mlls og okfdQ gksuk
pkgrk gS flQZ ckWl dk LVsaVMZ ns[k th dks yypkuk csodwQh gh rks gS- esjk
O;fDrxr ekuuk gS fd 'kkWVZdV jkLrs ls
vkf[kj
esa ;g dguk gS fd gS fd ;gka gj fdlh dks nwljksa dh chch] nwljs dk igukok&vkSus dh t:jr gS- jkrks&jkr ekykseky ds lius
dks iwjk djus ds pDdj esa os dgha dk ugha gks ikrk gS-
eq>s
yxrk gS fd vkneh dh rjDdh muds lksp ij fuHkZj djrk gS og Hkh mudh lkdkjkRed
lksp ij- pkgrk rks gj dksbZ gS vkleka dks Nwuk exj gekjk lksp vkSj drZO; ;k
esgur vxj tSls&rSls gks rks Hkyk vkleka dks dHkh Nqvk ugha tk ldrk gS-
eSaus vius dbZ lg;ksfx;ksa vkSj lg;kf=;ksa dks utnhd ls ns[kk gS- os u rks
esgur esa fo’okl djrs gSa vkSj u gh lPpkbZ esa- ,slh ifjfLFkfr esa vkleka dh
mapkbZ muls vNwrk jg tkrk gS-
dqN
yskx ,sls Hkh lekt ;k laLFkku esa gS tks ;g pkgrk gS fd gekjk Hkys gh rjDdh u
gks ij mudk rjDdh ugha gksuk pkfg,- bl tqxr esa os ges’kk iz;kl djrk jgrk gS
vkSj nwljs ds rjDdh dks gjlaHko jksdus dk iz;kl djrs gSa] bldk urhtk ;g gksrk
gS fd ------------------------------------------------------------
bUnzef.k lkgw
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)









