मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
बुधवार, 27 मई 2009
अभ्रख उद्योग पर अस्तित्व का संकट
( sanjeev sameer)
पत्थरो से बंजर होती कोडरमा की जमीन
झारखंड का कोडरमा जिला कुछ दिनों पहले तक पूरी तरह पहाडों व जंगलों से घिरा हुआ था. लेकिन आज स्थिति ठीक इसके विपरीत है. यहां चल रहे क्रषर एवं छोटे-बडे पत्थर के खदानों के कारण पूरे जिले में धूलकणों की मोटी तह बिछ गई है. कभी हरा-भरा दिखाई देने वाला यह इलाका आजकल प्रदूषण गंदगी एवं भूमि बंजरीकरण के दौर से गुजर रहा है. समस्या की विकरालता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिले के डोमचांच इलाके में लगभग दौ सौ वर्ग किमी क्षेत्र के अंदर नौ सौ से अधिक क्रशर एवं दो सौ से अधिक की संख्या में छोटे-बडे पत्थर खदानें है. जिले के डोमचांच इलाका एक ओर जहां सबसे ज्यादा राजस्व चुकाता है वहीं दूसरी औरं सबसे अधिक गिट्टी का उत्पन्न भी करता है. यहां पर क्रषरों की बढती संख्या और उससे निकलने वाले गैस, धूलकण और षोर ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है. जिले के चंदवारा प्रखंड की भी हालत कुछ ऐसी ही है. यहां भी लगभग सौ की संख्या में क्रषर काम कर रहे है. इन प्रखंड के अन्तर्गत आने वाले गांव फुलवरिया, धरगांव, इंदरवा, नवलषाही, पुरनाडीह, बरियाडीह आदि गांवों के लोग इन क्रषरों की वजह से दमघोंटू जिंदगी जीने के लिये मजबूर हैं. सिर्फ इतना ही नहीं इनकी वजह से यहां के जंगल तेजी से उजडते जा रहे है. इन इलाकों के जो गिने चुने पेड बचे है उनकी पत्तियां हरी नहीं ब्लकि धूलकण एवं डस्ट के कारण सफेद हो चुकी हैं. ऐसे इलाकों में शाम के वक्त पांच फीट से कम की दूरी पर भी कुछ नहीं दिखाई देता है. वैज्ञानिकों के अनुसार शाम को वायुमंडल ठंडा होने के कारण धूलकण नीचे मंडराता है जिसकी वजह से इस समय चीजों को देखने में मुष्किल होती है. जिन इलाकों में धूलकण की मात्रा जितनी अधिक होती वहां चीजें उतनी अस्पश्ट दिखाई पडती है. क्रषरों से निकलने वालें धूंये व धूलकण ने न केवल यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला हैं अपित इन इलाक की जमीन भी इससे बुरी तरह प्रभावित है. हजार हेक्टयर से अधिक की जमीन यहां पर मरूभूमि में तब्दील हो चुकी है. इन बंजर बनते जमीन को देख यहां किसान काफी चिंतित है. कटरियाटांड के मंजूर आलम व मो. अस्लम का कहना है कि क्रषरों की वजह से पूरा इलाका जंगलविहीन बन चुका है. जिसका व्यापक असर कृशि पर पडा है पिछले पांच साल से सुखाड व अकाल की समस्या इसी का परिणाम है. नवलषही के रामचंद्र साव, बिरजू दास, बदरी पंडित की सोच कुछ ऐसी ही है. ये सभी चाहते है कि क्रषर बंद हो. गौर करने की बात तो यह है कि इस विकराल समस्या पर न ही प्रषासन चिंतित है और न ही जनप्रतिनिधि. प्रषासन को पैसा मिलता है. जबकि ज्यादातर जनप्रतिनिधि के खुद के ही क्रषर चलते हैं ऐसे में इनके खिलाफ आवाज उठाये तो कौन?
(इन्द्रमणी)
शनिवार, 25 अप्रैल 2009
मेरी manjil
वर्षो से
अब दूर चला गया हूँ
भटकते- भटकते
लौट पाना मुश्कल है
इतने दूर चला आया हूँ
लौटने की कौशिश में
भटकता ही जा रहा हूँ
अब भटकन ही
मेरा आनंद है
और आनंद ही
मेरी manjil।
-Indramani
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
प्लीज़
तुझे भी
ताजुब्ब होगा
यह जानकर
की
इतना सब कुछ
होने के बाद भी
मैं
अपने-आपको
कोस नहीं रहा हूँ
हाँ , हंस रहा हूँ
अपनी हालात पर
प्लीज़ , तुम न हँसना
मेरी इस कमजोरी पर।
-इन्द्रमणि
मेरी जिंदगी
मुझसे रिश्ता
रखना चाहता है
शब्द और कविता की तरह
मगर
मुझे अक्सर
तलास रहती है
अपनी जिंदगी
जिनसे हम रिश्ता
कायम करना चाहते हैं
सदा - सदा के लिए
कविता के
एक-एक शब्द के
अर्थों की तरह।
- indramani
मैं और मेरी लाश
एक अजीम चौराहे पर
मिलकर घंटों बातें की
घर की, कैरिअर की ,
प्रेम की, समाज की, स्वर्ग की......
तब उन्होंने कहा
बस इतना ही करो बातें
क्यूंकि, सड़ रही हूँ मैं
आने लगी है बू मुझसे
दफना दो मुझे कहीं
मैंने कहा-
बू सिर्फ़ तुमसे नहीं
यहाँ के हर गलिओं,
हर चौराहों, हर चौबारों,
हर घरों से भी
बू आ रही है
शराब की, पेशाब की,
उल्तियौं की, हत्याओं की,
वफ़ाऔं की , बिचारों की
भावनाओं की.....
तो मैं कितने को दफनौऊ
और कहाँ- कहाँ
वह भी अकेले
उन्होंने कहा
अकेले कहाँ हो तुम
तुम्हारे जैसे कई इन्सान है यहाँ
मैंने कहा- शायद आपने
गौर से देखा नहीं हैं
यहाँ के बाज़ारों को
जहाँ सारे इन्सान
बिक रहे हैं
मांस के भाव मैं
खूंटों पर टंगे-टंगे
उन्हें मेरी baatoun पर
यकीं आ गया
तब कहा- कोई बात नहीं
चलो हम दोनों मिलकर
पहले यह काम कर लेते हैं
फ़िर तुम दफना देना
यहीं कहीं, यहीं कहीं!
-इन्द्रमणि
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
एक कविता तुम्हारे नाम
लिख लेता हूँ
एक साथ कई कविताएँ
तुम्हारे नाम के
पर
तुम्हारी मौजूदगी में
जड्शुन्य हो जाता हूँ .
contact
samarpan,
At- Sundernagar,
Po & Dist- Koderma
pin- 825410
Jharkhand
Mob- 09934148413
Email- indramani2006@indiatimes.com