बुधवार, 23 सितंबर 2020

टूटी है उम्मीदें, टूटे है अरमान इनसे....शम्भूलाल जी के नाम

"सोचकर मुझको होती है हैरानी बहुत है,

हम दो कदम और वो आठ कदम पर क्यों है?
हर दिन मिलना, हर दिन बिछड़ना होता है,
फिर भी इन्हीं को हर कोई परखता क्यों है?

दे गया है ग़म ज़माने भर का, लेकिन
हर कोई इन्हीं को अजमाता क्यों है?
चाहता है ये मुझे दिल से,
फिर चंद खुशियों के लिए तड़पाता क्यों है?

दोस्ती का शिला मुझको इन्हीं से मिला है,
बोला है, बाँटकर खाएंगे, मगर खाया अकेले क्यों है?

नफरत वाली आग बुझाना सिखा है मैंने इन्हीं से,
फिर भी हमारी ज़िंदगी में फूल से ज्यादा काँटे क्यों हैं?

दिल का पत्ता फेंक कर ज़िंदगी खरीद लेते हैं ये जनाब,
मगर इतने बड़े जुआरी से मुझको जलन क्यों है?

टूटी हैं उम्मीदें, टूटे हैं अरमान इनसे,
सोचता हूँ फिर भी दोस्ती इन्हीं से क्यों है?"

-इन्द्रमणि साहू

21.08.2020

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

अब सांसे तारतम्य है...


"बहुत मुश्किलों से
सम्हाला आज
मैंने खुद को
अब सांसे 
तारतम्य है 
और व्यवस्थित भी..."

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

खुशियाँ खरीदी थी...


"ग़मों को बेचकर
खुशियाँ खरीदी थी
उफ्फ, शायद
फिर से,
बाज़ार वही पुराना सजने लगा है..."

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

दुआओं का भी तासीर रहा होगा....


"यकीं है मुझे
मेरी दुआओं का भी
तासीर रहा होगा....
मगर तुम्हें शायद
दुआओं की नहीं
दामन की दरकार थी..."
-इन्द्रमणि साहू

27/07/2020

मरहम लगाये हैं जख्मों पर...


मालूम है
बिछड़े नहीं है फ़िलहाल
रोज बातें हो रही है
फिर भी सन्नाटा सा पसरा हुआ है...

सांझ तक नहीं हुई है हमारे रिश्तों में
मगर फिर भी रात का सुन्नापन
का एहसास हो रहा है...

कल तक साथ थे हम दोनों
फिर भी आज लग रहा है
मुद्दते हो गयी मिले हुए...

अभी-अभी मरहम लगाये हैं
जख्मों पर 
फिर भी लग रहा है
सितम हज़ार ढायें हैं
एक दूजे पर....”

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

ख्वाबों के गुलिस्तां में


जाने किसकी नजर लगी
कि अब तुम्हारी
हर बात
लम्हा-लम्हा ही सही
ख्वाबों के गुलिस्तां में
इल्ज़ामात सा लगता है....
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

तुम्हें बोलना आता है


बेशक,
तुम्हें बोलना आता है
शायद इसीलिए
तुम अच्छे से सहला लेते हो
और मैं संभाल भी
नहीं पाता हूँ.
-इन्द्रमणि साहू

27/07/2020

दफ्न करते रहे सपनों को...


"छोटी-छोटी ख्वाहिशों को
आज तक समेट नहीं पाया
अपने जख्मों को
हरा नहीं कर पाया
और दफ्न करते रहे सपनों को
अपने ही घरों में  
और तुमने कह दिया
बड़ी आसानी से
कि दूसरे के जलते तवे पर
रोटी सेक ली आपने..."
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

परछाई


अपनी परछाई देखकर
खुश होता था कभी,  
आज 
तुम्हें सामने 
पाकर भी
खुश नहीं हूँ...

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

जानी-पहचानी सी डगर


“कल, जब मैं
अपनी कुछ जज्बातों से
और कुछ अल्फाजों से
उलझा अचानक से,   
सच बताऊँ,
तब से
ये डगर भी
कुछ जानी-पहचानी सी
नजर आने लगी है...”
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

मंगलवार, 23 जून 2020

तुम मुझे अच्छे लगते हो...

"आस-पास की घटनाओं-परिघटनाओं 
गतिविधियों के प्रति 
संवेदनशील हो, 
अनुभव करते हो 
गहराई से 
आत्मविश्वासी हो 
स्वीकार करते हो 
सहज हो 
तमाम खुराफातों के बाबजूद 
दुसरे की परवाह 
फिक्र करते हो 
कोई बनावटी नहीं दीखता है 
इसलिए 
तुम मुझे 
अच्छे लगते हो..."
-इन्द्रमणि साहू 

ख्वाहिश

"बस,
मेरी एक ही ख्वाहिश है
लम्बी सड़क, हल्की वारिश 
बहुत सारी बातें
और बस 
मैं और तुम...."
-इन्द्रमणि साहू 

सोमवार, 22 जून 2020

डस्ट फांकते लोग और बंजर होती जमीन

कोडरमा जिला में सबसे ज्यादा राजस्व चुकाने वाले एवं फसल उत्पादन करने वाले क्षेत्र डोमचांच इन दिनों प्रदूषण, गंदगी, बीमारी और भूमि का बंजरीकरण के दौर से गुजर रहा है। इस समस्या की विकरालता का अंदाजा इसी से लगाया ला जा सकता है कि लगभग 200 वर्ग किमी0 क्षेत्र में लगभग 900 क्रेशर, कोडरमा सदर में 400 एवं मरकच्चों प्रखंड में लगभग 500 और लगभग 200 की संख्या में छोटे-बड़े खदान हैं। चंदवारा प्रखंड में भी लगभग 100 क्रेशर हैं। खदान और क्रेशरों की वजह से तेजी से जंगल उजड़ रहा है और वहीं दूसरी ओर प्रदूषण, गंदगी और बीमारी इन दिनों डोमचांच एवं डोमचांच के आस-पास के इलाके की निशानी बन गई है। पेड़ के पत्ते हरा होता है पर इस इलाके के पेड़ों की पत्तियां सफेद हैं। पत्थरों के टूटने एवं उनसे उड़ने वाले डस्ट से सभी पेड़ों की पत्तियां सफेद-सफेद सी हो गई है। बरियारडीह से कोडरमा तक बगैर हेलमेट पहने मोटरसाइकिल से गुजर पाना दुभर है।
शाम के वक्त तो पास से पांच से 10 फीट की दूरी भी दिखना मुश्किल होता है। कहा जाता है कि शाम को वायुमंडल ठंडा होता है, इस कारण धूलकण ऊपर उठने की बजाय नीचे ही मंडराता रहता है। इस क्षेत्र में बढता हुआ धूलकण, गैस, बढता सौर, दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होता जल और नष्ट होते पेड़-पौधे, प्रदूषण के खतरे की ओर बढते जा रहे हैं। 

फुलवरिया, धरगांव, इंदरवा, नवलशाही, पहाड़पुर, नवादा, नेरुपहाड़ी, कटरियाटांड, गेंदवाडीह, सलैयडीह, पंचगांवां मोड़, पुरनाडीह, महेशपुर, डुमरगढहा, मरकच्चो, बरियारडीह, काराखूट, बहादुरपुर, नावाडीह आदि दर्जनों गांव के आम नागरिकों का जीवन इन क्रशरों की वजह से दमघोटू बन गया है। न सिर्फ क्रेशरो में कार्यरत मजदूर इसके शिकार हो रहे हैं बल्कि आसपास के लोग और आने-जानेवालों पर भी इसका बेहद बुरा असर पड़ रहा है।
उक्त इलाकों के लगभग 10000 हेक्टेयर क्षेत्र मरुभूमि बन चुका है। क्रेशरों एवं खदान की गंदगी से ऐसा हुआ है। सड़क के दोनों किनारे की जमीन देखने से इसका सहज अंदाजा लग जाता है। लोग अपनी बेकारी और बेरोजगारी दूर करने के लिए जंगल व वृक्षों की कटाई करते हैं। लोग साइकिल पर इसे लादकर डोमचांच-कोडरमा बाजार में बेचकर अपना गुजारा करते हैं। सखुआ एवं अन्य कीमती लकड़ियां का टुकड़ा-टुकड़ा कर बाजार में ले जाकर बेचते हैं। प्रति साइकिल 100 से 150 रुपया में इसकी बिक्री होती है। न सिर्फ डोमचांच, बगड़ो, कोडरमा, नवलशाही आदि चैक चैराहे पर स्थित होटलों में मोटा-मोटा लकड़ी जलावन के काम में लाते हैं। संपन्न परिवारों में भी लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है। कहा जाता है कि कोयला और गैस से अभी यहां लकड़ी सस्ता है। साइकिल पर सवार लकड़ी बेचने वाले मजदूर हर दिन हम सभी को रास्ते में दिखाई देते हैं.
इस तरह लगतार कटते जंगल, बढते क्रशरों की संख्या आदि से इस क्षेत्र के हजारों एकड़ भूमि बंजर
होती जा रही है। लगतार जलस्रोत भरता जा रहा है।
कुल मिलाकर एक भी गांव पर्यावरणीय, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से समृद्ध और खुशहाल नहीं है।

स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा संकट सिर्फ नहीं है करोना महामारी, बल्कि बच्चों के भविष्य का भी है संकट...कोडरमा-गिरिडीह के माइका-माइंस के क्षेत्र में फलफुल रहा है बाल तस्करी का धंधा


लॉकडाउन की वजह से क्षेत्र में खासकर माईका-माइंस व कोल माइंस क्षेत्र के गांवों में इन दिनों बड़ी त्रासदी जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी हैं. लोगों के पास खाने-पीने के लिए संसाधनों का घोर अभाव हो गया है. राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय बाल अधिकार विशेषज्ञों ने बच्चों की तस्करी की घटनाओं में कथित रूप से इजाफा होने, मौजूदा दौर में आर्थिक परेशानियों को झलने में अक्षम परिवार बच्चों को फिर गर्त में धकेल देने, बच्चों की तस्करी करने वाले सक्रीय होने के के संकेत दिए हैं. और यह संकेत अब कोडरमा और गिरिडीह में सच होता दिख रहा है. कोडरमा एवं गिरिडीह के विभिन्न गांवों में आज बाल तस्कर घूम रहे हैं. पहले यह धंधा रांची, खूंटी, सिमडेगा, गुमला, लोहरदग्गा आदि जिलों में खूब था और अब गैर आदिवासी जिलों में भी दलाल गरीबों को लालज दे रहे हैं, सब्जबाग दिखा रहे हैं. गरीब उनके झांसे में आकर अपनी बेटियों को महानगरों में भेजने को मजबूर हो रहे हैं. मरता क्या नहीं करता, न चाहते हुए थोड़ी सी रकम और पेट की आग के लिए मजबूरन यह सब करना पड़ता है. अभी हाल ही में कोडरमा रेलवे स्टेशन से एक बाल तस्कर के द्वारा 4 नाबालिक बच्चियों को दिल्ली ले जाये जा रहे थे, तभी चाइल्डलाइन की टीम ने जीआरपी एवं आरपीएफ के सहयोग से सभी चार बच्चियों को रेस्क्यू करने में सफल रही. ये सभी बच्चियां गिरिडीह जिले के माइका-माइंस क्षेत्र अर्थात तिसरी थाना क्षेत्र के गांवों के हैं और सभी का उम्र 14 से 17 वर्ष तक के बीच है। पहले भी इस स्टेशन पर कोडरमा, नवादा, गिरिडीह, चतरा, हजारीबाग आदि जिलों के बाल श्रमिकों को रेस्क्यू किया गया है. या यूँ कहें कि यह स्टेशन बाल तस्करों व बाल श्रमिकों के लिए हब बन गया है. 

वैसे, झारखण्ड पहले से बाल तस्करी के मामले में बदनाम रही है. यहाँ की बेटियां दिल्ली सहित अन्य महानगरों में बाल तस्करों के द्वारा ले जाया जाता रहा है. हालाँकि, इसकी रोकथाम एवं उचित कार्यवाही के लिए स्थानीय सिविल सोसाइटी के लोगों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है, फिर भी यह धंधा यहाँ खूब फलफूल रहा है.
कोविड-19 के इस महामारी के दौर में परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है. यह महामारी सिर्फ स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा संकट नहीं है बल्कि यह बच्चों के भविष्य का भी संकट है. बाल तस्करी का मामला हो या फिर बाल श्रम, इसके लिए यहाँ कानून तो है लेकिन शायद छोटे और गरीबों के लिए....बड़े और अधिकारियों के लिए नहीं, अगर देखा जाय तो ज्यादातर ऐसे लोगों के घरों में ही ये बच्चे या बच्चियां आया का काम करती है. अभी हाल ही में कोडरमा के बांझेडीह पावर प्लांट में कार्यरत सीएसआर अधिकारी के घर में सिमडेगा की एक 15 वर्षीय बालिका पिछले एक साल से कार्य करते पायी गयी, रेस्क्यू भी हुआ लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से आज तक उनके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं हुई. वहीँ, दूसरी ओर सदर अस्पताल कोडरमा के सामने चाय-समोसे वाली एक ढाबे में कार्यरत 15 वर्षीय 2 बालकों के रेस्क्यू होने पर ढाबे के मालिक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गया. कोर्ट में मामला चल भी रहा है.  

कुल मिलकर देखा जाय तो ये मानव तस्कर, आपराधिक गुट या गरीब माता-पिता सभी छोटे बच्चों व मासूमों को बाल श्रम में धकेल रहे हैं. यही कारण है कि आज महानगरों के आलावे छोटे शहरों, ईंट भट्टों, निर्माण कार्यों, माइका माइंस के खादानों, कोयला खादानों, चाय की छोटी दुकानों, गैरेजों आदि स्थानों पर काम करते बच्चे अक्सर मिल जाते हैं. जहाँ बच्चे 9 से 15 घंटे तक कार्य करते हैं.
झारखण्ड में भी सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से बाल श्रम के खिलाफ जागरुकता फैलाने का काम हो रहा है, बाबजूद आजतक इस पर अंकुश नहीं लग पाया है. एक आकलन के अनुसार इस लॉकडाउन की वजह से इस राज्य में बाल मजदूरी की समस्या और ज्यादा गंभीर होने वाली है. क्योंकि, अधिकांश लोगों के पास खाने के लिए भरपेट अनाज नहीं है. कोल माइंस हो या माइका माइंस का क्षेत्र, आज यहाँ भुखमरी से लोग बेहाल है. सरकार की ओर से संचालित मनरेगा योजना या अन्य सुविधा इस एरिया में नाम मात्र की पहुँच रही है. ऐसे में इस प्रथा पर कैसे अंकुश लगेगा, यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है.
इन्द्रमणि साहू
22 जून, 2020

...और हाँ, आपके इसी हरकत से हम मशहूर और मजबूत हुए

सच यह है कि किसी के बदनाम करने से कोई बदनाम नहीं होता. नफरत का भाव पैदा नहीं होता. क्योंकि प्राय: यहाँ सभी के पास खुद का विवेक, सोच और समझ है.
हम बस इतना जानते हैं कि हमसे जितने लोग खुश है, उनकी खुशी ही हमारी ख़ुशी है. आज तक हमने औरों की ख़ुशी देखकर ही खुश होना सीखा है. रही बात उनका जो आज तक मुझे या अपनी जिन्दगी को नहीं समझ पाया, दूसरे से प्रेरणा नहीं ले पाया, खुद का व्यवहार नहीं बदल पाया, उन्हें आप लाख टिप्स बता दो, वे खुश नहीं होंगे और न ही जीवन जीने के तरीके सीख पायेंगे. उलटे उन्हें खुश करने के चक्कर में आप खुद ही डिस्टर्ब हो जायेंगे.  
ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं किया. भरपूर मौका दिया. साथ चलने और चलाने का भी प्रयास किया. परन्तु सब बेकार. अब इस मर्ज की दवा ढूँढ रहा हूँ. हालाँकि, मुझे यह काम बहुत पहले करना चाहिए था. उसी का नतीजा है कि आज पछताता रहा हूँ. इन्तेज़ार करता रहा कि सुधार होगा. लेकिन, उम्मीदों पर पानी फिर गया. अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची. उनकी नियत और सोच बर्दाश्त से बाहर है.
पहले कोई कुछ भी कहता था तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता था, परन्तु अब फर्क पड़ता है. पहले हम वस्त्रों में लगे धूल को झाड़ने जैसा ऐसे लोगों को धूल समझ कर झाड़ते थे. अब भी कोशिश करता हूँ, परन्तु हो नहीं पाता है. ऐसी परिस्थिति में चुप बैठना ठीक नहीं है. फिर ऐसे लोगों के परिवारों एवं उनकी जिन्दगी के बारे में सोचने लगता हूँ. चूँकि, शुरू से हमारी कार्यशैली और नियत ऐसी रही नहीं कि किसी को कष्ट पहुंचाएं. किसी को दुःख देकर/देखकर खुश हो जाएँ. कुछ चीजों को मैं समय को फैसला लेने छोड़ देता हूँ और अपने कार्य को अच्छे और इमानदारी से करने में जुट जाता हूँ. यही कारण है कि आज तक कोई मुझे नुकसान नहीं पहुंचा पाया है. यदि नुकसान हुआ भी तो मैंने उसमे में भी फायदा ढूँढ लिया हैं. हालाँकि, इस दिशा में प्रयास खूब हुए हैं. नुकसान करने के प्रयासों ने हमें मशहूर और मजबूत होने का अवसर दिया.    
और हाँ, लगे हाथ यह भी कह दूँ कि आज तक उन्होंने मेरे भोलेपन और अच्छाई का खूब गलत फायदा भी उठाया. वर्षों से मेरे साथ रहकर मेरे अस्तित्व, व्यक्तिव से न पूर्णतया परिचित हो सका, न दोस्त बन सका और न ही परिवार का हिस्सा. शायद यही कारण है कि वे आज अपना फर्ज निभाना भूल गए. माना, मैं कहीं किसी विन्दु पर गलत भी हूँ तो उन्हें क्या चाहिए. गलती को दिखाए, ढके या फिर सुधार कर दे या उलटे नमक-मिर्च मिलाकर खामखाँ सबके माइंड में गलत या नफरत का भाव पैदा करे? ‘दुश्मन जैसे दोस्त’ या साथ छोड़ने वाले साथी यदि यह काम करे तो बात समझ में आती है. दुर्भावनावश, तुच्छ मानसिकता की वजह से वे कुछ भी करेंगे-कहेंगे. वहां हम यह सोचकर बात पचा लेते हैं कि हम तरक्की के दिशा में अग्रसर हैं, तभी तो लोग मेरी बुराई कर रहे हैं या मुझसे जल रहे हैं.
मैं भलीभांति जानता हूँ कि हमारी कोई गलती नहीं है फिर भी तुम हमें बदनाम करने की भरसक कोशिश कर रहे हो. तुम्हें जलन है किसी खाश टेलेंट से, किशी खाश चहरे से. परन्तु यह तुम्हारा प्रॉब्लम है. इस व्यवहार से मुझे लगता है इससे तुम्हारा छवि का ही मखौल उड रहा है. मेरी नजरों से कौन गिर रहा है, दूर कौन हो रहा है, लोग नीचा किसे देख रहा है. घाटा किसे हो रहा है. कभी फुर्सत में सोचना. बता देना चाहता हूँ कि गलतफमिया और अहम का बर्फ इतना मत जमने दो कि फिर उसे पिघला न सको. शंका, संदेह, संशय, शक और अनुमान के आधार पर किसी भी शख्स का मुल्यांकन मत करो. इससे न सिर्फ भावनाएं टूटती है, बल्कि अटूट, अविरल और अंतहीन रूप से बहने वाली प्रेमधारा, आत्मा से उठने वाली लयबद्ध संगीत, अपनेपन की खुशबू और अंतस दिव्य अनुभूति का भी खात्मा हो जाता है. 
तुम्हारा यह प्रयास शायद इसलिए भी हो रहा है कि तुम हमें अपना प्यार मानते हो. करीबी और नजदीकी महसूस किये हो, तुम नहीं चाहते हो कि यह सब किसी कारणवश छीन जाए. इसीलिए तुम्हे कोई नहीं भाता खाशकर अच्छे चहरे या टेलेंट....ऐसे लोगों का साथ देखकर तुम्हारा दर्द और बैचैनी बढ़ जाती है और मन में जो भी दुर्भावनावश बातें आती है, बक देते हो. तब तुम्हारा ध्यान नहीं रहता है कि मेरा या तुम्हारा खुद का स्वाभिमान एवं इज्जत का क्या होगा? कई बार अपने को उनसे बेहतर सिद्ध करने के चक्कर में भी यह हरकत हो जाती है. आलोचना या निंदा करना अच्छी बात नहीं है. अच्छा होता यदि तुम अपना व्यवहार सुधार लेते. शायद कोई तुम्हारा अपना बन जाता. तुम भी हँसते-गाते औरों की तरह. यदि ऐसा नहीं कर पा रहे हो तो यकीन मानिए यह तुम्हारा दुर्भाग्य हैं.
हमारा क्या है, हम ऐसे आलोचनाओं को एक अवसर मानकार अंदर झांकते हैं और खुद को संवारते हुए गहराई में उतर जाते हैं. जो गलत दीखता है उसे हम सहजता से स्वीकार भी करते हैं. शायद यही कारण है हमारा व्यक्तित्व निखरता जा रहा है और तुम अपने को खोते जा रहे हो. 
मुझे मालूम है आजकल तुम बेहद परेशान हो. जिंदगी की उलझनों को सुलझाने में उलझे हुए हो. तुम्हें हर पल यही लगता है कि अच्छे लोग क्यों यहाँ आ रहे हैं. ऐसे अच्छे लोग तुम्हें साधारण तरीके से कुछ पूछ भी ले तो तुम्हें लगता है कि उन्होंने तुम्हारे सम्मान और भावनाओं को ठेस पहुँचाया है.
मैं यह भी जानता हूँ कि इस दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार लोग हैं. इसलिए यह मानकर चल रहा हूँ कि जीवन जीने के लिए ऐसे हर तरह के लोगों से सामना करना पड़ेगा. कबीर का दोहा भी याद है कि निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय..
इन्द्रमणि साहू
22 जून, 2020