शनिवार, 25 अप्रैल 2009

मेरी manjil

भटक रहा हूँ
वर्षो से
अब दूर चला गया हूँ
भटकते- भटकते
लौट पाना मुश्कल है
इतने दूर चला आया हूँ
लौटने की कौशिश में
भटकता ही जा रहा हूँ
अब भटकन ही
मेरा आनंद है
और आनंद ही
मेरी manjil।
-Indramani

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

तुम्हीं बताऔ

कभी मेरे मन में भी
उत्साह था
जीने की
आज क्यों आकर्षण
ख़त्म सा हो गया है
अपनी ही जिंदगी से.

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

प्लीज़

हाँ
तुझे भी
ताजुब्ब होगा
यह जानकर
की
इतना सब कुछ
होने के बाद भी
मैं
अपने-आपको
कोस नहीं रहा हूँ
हाँ , हंस रहा हूँ
अपनी हालात पर
प्लीज़ , तुम न हँसना
मेरी इस कमजोरी पर।
-इन्द्रमणि

मेरी जिंदगी

मेरी जिंदगी
मुझसे रिश्ता
रखना चाहता है
शब्द और कविता की तरह
मगर
मुझे अक्सर
तलास रहती है
अपनी जिंदगी
जिनसे हम रिश्ता
कायम करना चाहते हैं
सदा - सदा के लिए
कविता के
एक-एक शब्द के
अर्थों की तरह।
- indramani

मैं और मेरी लाश

मैं और मेरी लाश
एक अजीम चौराहे पर
मिलकर घंटों बातें की
घर की, कैरिअर की ,
प्रेम की, समाज की, स्वर्ग की......

तब उन्होंने कहा
बस इतना ही करो बातें
क्यूंकि, सड़ रही हूँ मैं
आने लगी है बू मुझसे
दफना दो मुझे कहीं

मैंने कहा-
बू सिर्फ़ तुमसे नहीं
यहाँ के हर गलिओं,
हर चौराहों, हर चौबारों,
हर घरों से भी
बू आ रही है
शराब की, पेशाब की,
उल्तियौं की, हत्याओं की,
वफ़ाऔं की , बिचारों की
भावनाओं की.....

तो मैं कितने को दफनौऊ
और कहाँ- कहाँ
वह भी अकेले
उन्होंने कहा
अकेले कहाँ हो तुम
तुम्हारे जैसे कई इन्सान है यहाँ

मैंने कहा- शायद आपने
गौर से देखा नहीं हैं
यहाँ के बाज़ारों को
जहाँ सारे इन्सान
बिक रहे हैं
मांस के भाव मैं
खूंटों पर टंगे-टंगे

उन्हें मेरी baatoun पर
यकीं आ गया
तब कहा- कोई बात नहीं
चलो हम दोनों मिलकर
पहले यह काम कर लेते हैं
फ़िर तुम दफना देना
यहीं कहीं, यहीं कहीं!
-इन्द्रमणि

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

एक कविता तुम्हारे नाम

एकांत क्षणों में
लिख लेता हूँ
एक साथ कई कविताएँ
तुम्हारे नाम के
पर
तुम्हारी मौजूदगी में
जड्शुन्य हो जाता हूँ .

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Indramani
samarpan,
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