भटक रहा हूँ
वर्षो से
अब दूर चला गया हूँ
भटकते- भटकते
लौट पाना मुश्कल है
इतने दूर चला आया हूँ
लौटने की कौशिश में
भटकता ही जा रहा हूँ
अब भटकन ही
मेरा आनंद है
और आनंद ही
मेरी manjil।
-Indramani
मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
शनिवार, 25 अप्रैल 2009
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
प्लीज़
हाँ
तुझे भी
ताजुब्ब होगा
यह जानकर
की
इतना सब कुछ
होने के बाद भी
मैं
अपने-आपको
कोस नहीं रहा हूँ
हाँ , हंस रहा हूँ
अपनी हालात पर
प्लीज़ , तुम न हँसना
मेरी इस कमजोरी पर।
-इन्द्रमणि
तुझे भी
ताजुब्ब होगा
यह जानकर
की
इतना सब कुछ
होने के बाद भी
मैं
अपने-आपको
कोस नहीं रहा हूँ
हाँ , हंस रहा हूँ
अपनी हालात पर
प्लीज़ , तुम न हँसना
मेरी इस कमजोरी पर।
-इन्द्रमणि
मेरी जिंदगी
मेरी जिंदगी
मुझसे रिश्ता
रखना चाहता है
शब्द और कविता की तरह
मगर
मुझे अक्सर
तलास रहती है
अपनी जिंदगी
जिनसे हम रिश्ता
कायम करना चाहते हैं
सदा - सदा के लिए
कविता के
एक-एक शब्द के
अर्थों की तरह।
- indramani
मुझसे रिश्ता
रखना चाहता है
शब्द और कविता की तरह
मगर
मुझे अक्सर
तलास रहती है
अपनी जिंदगी
जिनसे हम रिश्ता
कायम करना चाहते हैं
सदा - सदा के लिए
कविता के
एक-एक शब्द के
अर्थों की तरह।
- indramani
मैं और मेरी लाश
मैं और मेरी लाश
एक अजीम चौराहे पर
मिलकर घंटों बातें की
घर की, कैरिअर की ,
प्रेम की, समाज की, स्वर्ग की......
तब उन्होंने कहा
बस इतना ही करो बातें
क्यूंकि, सड़ रही हूँ मैं
आने लगी है बू मुझसे
दफना दो मुझे कहीं
मैंने कहा-
बू सिर्फ़ तुमसे नहीं
यहाँ के हर गलिओं,
हर चौराहों, हर चौबारों,
हर घरों से भी
बू आ रही है
शराब की, पेशाब की,
उल्तियौं की, हत्याओं की,
वफ़ाऔं की , बिचारों की
भावनाओं की.....
तो मैं कितने को दफनौऊ
और कहाँ- कहाँ
वह भी अकेले
उन्होंने कहा
अकेले कहाँ हो तुम
तुम्हारे जैसे कई इन्सान है यहाँ
मैंने कहा- शायद आपने
गौर से देखा नहीं हैं
यहाँ के बाज़ारों को
जहाँ सारे इन्सान
बिक रहे हैं
मांस के भाव मैं
खूंटों पर टंगे-टंगे
उन्हें मेरी baatoun पर
यकीं आ गया
तब कहा- कोई बात नहीं
चलो हम दोनों मिलकर
पहले यह काम कर लेते हैं
फ़िर तुम दफना देना
यहीं कहीं, यहीं कहीं!
-इन्द्रमणि
एक अजीम चौराहे पर
मिलकर घंटों बातें की
घर की, कैरिअर की ,
प्रेम की, समाज की, स्वर्ग की......
तब उन्होंने कहा
बस इतना ही करो बातें
क्यूंकि, सड़ रही हूँ मैं
आने लगी है बू मुझसे
दफना दो मुझे कहीं
मैंने कहा-
बू सिर्फ़ तुमसे नहीं
यहाँ के हर गलिओं,
हर चौराहों, हर चौबारों,
हर घरों से भी
बू आ रही है
शराब की, पेशाब की,
उल्तियौं की, हत्याओं की,
वफ़ाऔं की , बिचारों की
भावनाओं की.....
तो मैं कितने को दफनौऊ
और कहाँ- कहाँ
वह भी अकेले
उन्होंने कहा
अकेले कहाँ हो तुम
तुम्हारे जैसे कई इन्सान है यहाँ
मैंने कहा- शायद आपने
गौर से देखा नहीं हैं
यहाँ के बाज़ारों को
जहाँ सारे इन्सान
बिक रहे हैं
मांस के भाव मैं
खूंटों पर टंगे-टंगे
उन्हें मेरी baatoun पर
यकीं आ गया
तब कहा- कोई बात नहीं
चलो हम दोनों मिलकर
पहले यह काम कर लेते हैं
फ़िर तुम दफना देना
यहीं कहीं, यहीं कहीं!
-इन्द्रमणि
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
एक कविता तुम्हारे नाम
एकांत क्षणों में
लिख लेता हूँ
एक साथ कई कविताएँ
तुम्हारे नाम के
पर
तुम्हारी मौजूदगी में
जड्शुन्य हो जाता हूँ .
लिख लेता हूँ
एक साथ कई कविताएँ
तुम्हारे नाम के
पर
तुम्हारी मौजूदगी में
जड्शुन्य हो जाता हूँ .
contact
Indramani
samarpan,
At- Sundernagar,
Po & Dist- Koderma
pin- 825410
Jharkhand
Mob- 09934148413
Email- indramani2006@indiatimes.com
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