काफी दिनों से मैं इस बात से चिंतित हॅू कि मैं असफल हॅू या मेरा साथी. देने में कोई चुक हो रही है या उन्हें लेने में. न सिर्फ समीक्षात्मक बैठकों में बल्कि जब मौका मिला अपनी राय, विचार और सिद्धांत से ओत-प्रोत करने का प्रयास करता हूॅ. लेकिन, आज तक कुछ साथियों के विचारों को क्रियात्मक नहीं बना पाये हैं. हाॅ, हमें मालूम है इससे उन्हीं को नुकसान हो रहा है. फिर भी, वे इस बात से चिंतित नहीं हैं. महत्वाकांक्षा मरी हुई हो तो फिर चिंता किस बात की. जिन सहकर्मियों ने इस दिशा में कुछ किया, सोचा-समझा और अपनी भुमिका का बेहतर प्रदर्शन किया वे आज पहले से बेहतर है. इस बात का हमें फ्रक है. मैं मानता हूँ कि मेरी कोशिशों में कोई कमी नहीं हुई, फिरभी कुछ साथियों के दिलों में न मैं उतर पाया और न उनके जेहन में मेरा विचार. नाकामयाब मैं हुआ या वो, मुझे नहीं मालूम. कभी-कभी मूल्यांकन मैं खुद का भी कर लेता हूँ. पाता हूँ इससे नुकसान मेरा नहीं, उन्हें ही हुआ है. यदि वे इस दिशा में कुछ साकारात्मक पहल करते, छीनकर दूसरे की जवाबदेही-जिम्मेदारी भी संभालते तो बेशक उनमें आत्मविश्वास, आत्मशक्ति, अनुभव और कला-कौशल में निखार आता। इस प्रक्रिया में वे स्वयं प्रेरित होते, बड़े महानुभवों या ईश्वर का आर्शिवाद प्राप्त होता. क्योंकि ईश्वर भी सतत प्रयास करने वाले को ही मदद करते हैं.
निसंदेह, हम सभी अपने कार्य में, मन में किसी खाश चीजों की सिद्धि तो चाहते ही हैं, परंतु इसके लिए न 'कार्य मंदिर' में जाते हें और न ही साधना करते हैं। भला ऐसे में परमात्मा भी क्या करेंगे. फिर हम नाकामयाबी का रोना रोते हैं, किस्मत को कोसते हैं या फिर बनावटी हंसी के दौर से जैसे-तैसे जिंदगीं गुजार देते हैं.
कई बार मैं सोचने पर विवश होता हूॅ कि जो साथी आज तक अपनी भाषा, विचार, लिखावट में बदलाव नहीं ला सका, खैनी-बीड़ी, पान, सिगरेट जैसी मामूली आदतों पर नियंत्रण नहीं कर सका वे भला गांव-समाज की परिस्थियों को क्या बदलेंगे? मेरा मानना है कि बदलाव पहले विचारों में आनी चाहिए. यह बात मैं अक्सर अपने साथियों को कहता रहता हॅू लेकिन कोई असर नहीं होता है. अफ़सोस भी होता है. ज्यादातर मंशा येन-केन-प्रकारेण समय काट लेने की हो तो ऐसे में भावनात्मक या मानसिक बदलाव भला कैसे संभव है.
कई बार मैं सोचने पर विवश होता हूॅ कि जो साथी आज तक अपनी भाषा, विचार, लिखावट में बदलाव नहीं ला सका, खैनी-बीड़ी, पान, सिगरेट जैसी मामूली आदतों पर नियंत्रण नहीं कर सका वे भला गांव-समाज की परिस्थियों को क्या बदलेंगे? मेरा मानना है कि बदलाव पहले विचारों में आनी चाहिए. यह बात मैं अक्सर अपने साथियों को कहता रहता हॅू लेकिन कोई असर नहीं होता है. अफ़सोस भी होता है. ज्यादातर मंशा येन-केन-प्रकारेण समय काट लेने की हो तो ऐसे में भावनात्मक या मानसिक बदलाव भला कैसे संभव है.
हमें अपने साथियों की विचाराधारा, गतिविधियों एवं उनकी प्रगति-समृधि की चिंता है. शायद इसलिए हम अक्सर उनके विचारों में तरंगें उठते हुए देखने को आतुर रहते हैं.
जरूरत के अनुसार हमारे कार्यालय में अलग-अलग मानसिकता से लैस साथी आते रहते हैं. जाते भी हैं. मलाल इस बात का नहीं है कि वे चले जाते हैं. बल्कि, खुशी इस बात की होती है कि हमने बेहतर करने का बेहतर अवसर दिया. इससे और बेहतर करने, बेहतर कैरियर जमाने एवं बेहतर जिम्मेवारी संभालने चले गये. यहाॅ का छोटा अनुभव उन्हें जीवन भर काम आयेगा. बुनियाद में हम हैं इसी बात की हमें खुशी होती है.
कभी यह भी सोचता हॅू कि वे यहाॅ ही रहकर भी उक्त चीजें हासिल कर सकता था. लेकिन आजकल कम समय एवं शोर्टकट रास्ते से लंबी सफर तय करने की आदी हर कोई हो गया है. हलांकि, यह संभव नहीं है. चुंकि, जिंदगीं संघर्षाे का नाम है. जो जितना जहर पीता है उनकी जिंदगी उतनी ही बेहतर होती है.
यहाँ हम सभी मिलजुलकर काम करते हैं न कि नौकरी. अक्सर मालिक की भुमिका में रहते हैं न कि नौकर की भुमिका में. लेकिन, यदि शिक्षा-दीक्षा नौकरी के लिए हुआ हो और मानसिकता भी नौकरी करने की ही हो तो आप उन्हें लाख चाहो मालिक बनाने की वे नौकर ही बनेंगे. पद, पैसा, प्रलोभन बड़ी बुरी चीज है. लोग इसके चक्कर में अपनी पहचान खो देते हैं. वैकल्पिक जॉब तलाशते रहेंगे. जबकि उन्हें मालूम नहीं कि शांति, सतुष्टि और कमाई, काम करने से आती है न कि पैसे से.
यहाँ हम सभी मिलजुलकर काम करते हैं न कि नौकरी. अक्सर मालिक की भुमिका में रहते हैं न कि नौकर की भुमिका में. लेकिन, यदि शिक्षा-दीक्षा नौकरी के लिए हुआ हो और मानसिकता भी नौकरी करने की ही हो तो आप उन्हें लाख चाहो मालिक बनाने की वे नौकर ही बनेंगे. पद, पैसा, प्रलोभन बड़ी बुरी चीज है. लोग इसके चक्कर में अपनी पहचान खो देते हैं. वैकल्पिक जॉब तलाशते रहेंगे. जबकि उन्हें मालूम नहीं कि शांति, सतुष्टि और कमाई, काम करने से आती है न कि पैसे से.
हमारे कुछ पुराने साथी हैं जो हमेशा बेहतर और नया करते रहते हैं. इससे हमें भी खुशी मिलती है और उन्हें भी. कुछ साथी सिर्फ कोरम पूरा करते हैं तो कुछ निभाते है. कोई गलत को गलत कहने की हिम्मत दिखाते हैं तो कोई गलत को ही प्रेश्रय देते हैं. और तो और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो साथियों को राजनीति के शिकार भी बनाते हैं. वहीं, कुछ साथी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बहाने प्रेम-प्यार के झांसे में लड़कियों को फांसते हैं. कुछ अपने को बेगुनाह सिद्ध करने या क्रेडिट लेने के चक्कर में अक्सर रहते हैं. कोशिश नकाम होने पर सलाह-सुझाव देनेवाले पर ही झुठ-मूठ के लांछन लगाना शुरू करेंगे. हालांकि, ऐसे चलाकियों व नौटंकियों से कुल मिलाकर उन्हीं को घाटा व नुकसान होता है. हालाँकि, यह बात उन्हें कुछ दिन बाद समझ में आती है और अंततः जीतने की कोशिश में वे अक्सर हार जाते हैं. काम के सामने उनकी चलाकी, घुर्तता, घंमड, अनुभव, डिग्री और बेहिसाब काबिलियत काफी पीछे छूट जाता है. नाकारात्मक भाव या दिखावे की सीढ़ियाॅ लिए वे सफलता के मुकाम हासिल करना चाहते हैं, भला यह आज तक किसी से संभव हुआ है?
आखिरी बात यह भी कि यहाॅ हर कोई सफल होना चाहता है, उपलब्धियाॅ पाना चाहता है. यह अच्छी बात है. लेकिन, इसके लिए अंतरमन में कुछ अच्छे भाव पालने होते हैं. जलन, इर्ष्या, द्वेष या दुसरे में बुराई ढूंढ़कर आज तक किनका भला हुआ है?
इन्द्रमणि साहू
23.11.2018
