रविवार, 19 मई 2024

चंद बूंद पानी

 .....और जो, 

समझना ही 

नहीं चाहे 

उसे कितना भी 

समझा लो 

सब बेकार.....!

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समेट-समेट कर 

संभाल-संभाल कर 

जीना चाहते हैं 

आए-गए की तरह नहीं

और एक तुम हो 

कि......!

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प्यासे को 

चंद बूंद पानी 

की थी जरुरत 

पर  उन्होंने तो,

उसे कुएँ में ही डुबो दिया...!

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कौंधता है 

चुभता है 

और झकझोरता भी 

खूब है 

उनकी बातें 

आज भी...."

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रेत को 

मुट्ठी में बंद 

किये तो हैं 

देखते हैं 

टिकता भी है 

या नहीं....!

-इन्द्रमणि साहू 

 

मगर अफ़सोस!

 सजा तो 

मुकर्रर कर दी 

मगर अफ़सोस!

कम से कम 

कोई गुनाह 

करने दिया होता....!

-इन्द्रमणि साहू 



शुक्रवार, 3 मई 2024

कभी-कभी

 "कभी-कभी 

अपनी मुर्खता पर भी 

हंसी आती है..."

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"याद रखना

तुम्हें भी लिखूंगा

एक-एक शब्द 

तब, जब 

पूरी तरह समझ जायेंगे..."

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"किस्मत 

बदलती है 

बैठकर मात्र 

सोचने रहने से नहीं....."

-इन्द्रमणि साहू