मंगलवार, 28 जुलाई 2020

अब सांसे तारतम्य है...


"बहुत मुश्किलों से
सम्हाला आज
मैंने खुद को
अब सांसे 
तारतम्य है 
और व्यवस्थित भी..."

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

खुशियाँ खरीदी थी...


"ग़मों को बेचकर
खुशियाँ खरीदी थी
उफ्फ, शायद
फिर से,
बाज़ार वही पुराना सजने लगा है..."

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

दुआओं का भी तासीर रहा होगा....


"यकीं है मुझे
मेरी दुआओं का भी
तासीर रहा होगा....
मगर तुम्हें शायद
दुआओं की नहीं
दामन की दरकार थी..."
-इन्द्रमणि साहू

27/07/2020

मरहम लगाये हैं जख्मों पर...


मालूम है
बिछड़े नहीं है फ़िलहाल
रोज बातें हो रही है
फिर भी सन्नाटा सा पसरा हुआ है...

सांझ तक नहीं हुई है हमारे रिश्तों में
मगर फिर भी रात का सुन्नापन
का एहसास हो रहा है...

कल तक साथ थे हम दोनों
फिर भी आज लग रहा है
मुद्दते हो गयी मिले हुए...

अभी-अभी मरहम लगाये हैं
जख्मों पर 
फिर भी लग रहा है
सितम हज़ार ढायें हैं
एक दूजे पर....”

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

ख्वाबों के गुलिस्तां में


जाने किसकी नजर लगी
कि अब तुम्हारी
हर बात
लम्हा-लम्हा ही सही
ख्वाबों के गुलिस्तां में
इल्ज़ामात सा लगता है....
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

तुम्हें बोलना आता है


बेशक,
तुम्हें बोलना आता है
शायद इसीलिए
तुम अच्छे से सहला लेते हो
और मैं संभाल भी
नहीं पाता हूँ.
-इन्द्रमणि साहू

27/07/2020

दफ्न करते रहे सपनों को...


"छोटी-छोटी ख्वाहिशों को
आज तक समेट नहीं पाया
अपने जख्मों को
हरा नहीं कर पाया
और दफ्न करते रहे सपनों को
अपने ही घरों में  
और तुमने कह दिया
बड़ी आसानी से
कि दूसरे के जलते तवे पर
रोटी सेक ली आपने..."
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

परछाई


अपनी परछाई देखकर
खुश होता था कभी,  
आज 
तुम्हें सामने 
पाकर भी
खुश नहीं हूँ...

-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020

जानी-पहचानी सी डगर


“कल, जब मैं
अपनी कुछ जज्बातों से
और कुछ अल्फाजों से
उलझा अचानक से,   
सच बताऊँ,
तब से
ये डगर भी
कुछ जानी-पहचानी सी
नजर आने लगी है...”
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020