गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

कुछ गहरी बातें मन की....

 मन के अंदर कुछ हलचल सी मच रही थी, बेचैन हो रहा था. गाना सुनने और सब कुछ भूल जाने की कोशिश की, लेकिन बहुत प्रयास करने के बावजूद मन का बोझ और हलचल कम नहीं हुई. फिर सोचा, शायद लिखने से थोड़ा हल्का महसूस हो. फिर क्या, मैंने अपना मोबाइल निकाला और गाडी में ही लिखना शुरू किया. वैसे भी, मैं पहले से ही अपनी चिंताओं को लिखकर ही भूलता रहा हूँ. आज जब रांची से लौट रहा था, तो यही हुआ. मैंने पहले मोबाइल में लिखा, फिर अपने व्हाट्सएप पर भेजकर सुरक्षित रखा और बाद में घर आकर इसे यहां पोस्ट किया। उम्मीद है कि आपको पसंद आएगा।

मेरा मानना है कि दुनिया के हर पिता अपने बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए हर चुनौती का सामना करता है. अपने त्याग, मेहनत और समर्पण से वह दिन-रात अपना अनमोल जीवन बलिदान करता है. लेकिन जब वही पिता अपने बच्चों से कृतज्ञता और स्नेह की बजाय उपेक्षा और ताने सुनता है, तो उसका दिल सच में टूट जाता हैवह पिता, जो जीवनभर परिवार की हर आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपने सपनों और इच्छाओं को त्याग करता है और अपनों से ख़ुशी-ख़ुशी 'थैंक्यू' जैसे छोटे से शब्द की उम्मीद करता है. और जब वह भी नहीं मिलता, तो उसे इस बदलती मानसिकता और आधुनिक शिक्षा से घृणा होने लगती है.

सच कहें तो, एक परिवार की इमारत जिस मजबूत बुनियाद पर खड़ी होती है, वह है संस्कार, शिष्टाचार और सम्मान. लेकिन आज की पीढ़ी इस बुनियाद को कभी तरजीह नहीं देती. जहाँ तकनीक, आधुनिकता और भौतिक सुख-सुविधाओं ने रिश्तों की गहराई को सतही बना दिया है, वहीं थोड़ी सी पढ़ाई, शहरों में रहने का घमंड और डिग्री का अभिमान ने संस्कार और शिष्टाचार को बलि चढ़ा दिया है. अगर हम थोड़ी गहराई से सोचें, तो उस पिता का दर्द समझ सकते हैं, जिसने अपने बच्चों की खुशियों के लिए अपनी हर ख्वाहिश को त्याग दिया, और आज वही पिता उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार हो गया है.  कभी-कभी लगता है कि इतना कुछ करने के बाद भी बच्चों के मन में पिता के प्रति कृतज्ञता, स्नेह और आदर का भाव नहीं है, तो फिर आगे और क्या करना?

और तो और, जब एक माँ अपनी बेटी के सामने पिता की उपेक्षा और आलोचना करती है, तो यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ शिकायत नहीं रह जाती, बल्कि वह नफरत और कड़वाहट एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित हो जाती है. माँ का नकारात्मक दृष्टिकोण बेटी के मासूम मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है, और वह न सिर्फ पिता, बल्कि पूरे परिवार और खानदान के प्रति गलत धारणाएँ बना लेती है, जो अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी हैं.

बच्चे अपने माता-पिता से ही जीवन के मूल्यों और संस्कारों को सीखते हैं. यदि एक माँ, जो बच्चों की पहली गुरु होती है, लगातार अपने पति को नीचा दिखाती है और उसकी गलतियाँ गिनाती है, तो बेटी उसी नज़रिए से अपने पिता को देखने लगती है. यह भावनात्मक दूरी न सिर्फ पिता और बेटी के रिश्ते को तोड़ती है, बल्कि पूरे परिवार की गरिमा और मूल्यों को भी आहत करती है. दुख की बात यह है कि पिता बाहर तो समझाने में सक्षम होते हैं, लेकिन अपने घर में वे विफल होते हैं. उनकी बातें वहां कभी नहीं मानी जातीं. नतीजतन, परिवार के बीच प्यार और सम्मान धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है. यह स्थिति आज लगभग हर घर की कहानी बन चुकी है. एक माँ, जिसे परिवार को जोड़ने और संवारने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए, वही आज अपने बच्चों में कटुता और नकारात्मकता का बीज बो देती है. फिर एक बाप या पिता को कहां से सम्मान मिल पाएगा?

सच में, आज के समय में भौतिक वस्तुओं के प्रति उम्मीदें और अपेक्षाएँ इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि बच्चों का ध्यान मेहनत, पढ़ाई और काम की मूलभूत आवश्यकताओं से हटकर केवल चीज़ों की नवीनता पर केंद्रित हो गया है. लैपटॉप नया हो या पुराना, उसका असली उद्देश्य पढ़ाई और काम में सहूलियत देना होना चाहिए. लेकिन जब बच्चों की अपेक्षाएँ केवल नई और बेहतर चीज़ों पर केन्द्रित हो जाती हैं, तो वे उस मेहनत और संघर्ष को भूल जाते हैं, जो एक पिता ने उनकी सुविधा और भविष्य के लिए किया होता है. एक पिता, जो अपने बच्चों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए खुद को खो देता है, दिन-रात मेहनत करता है, और फिर भी उसके प्रयासों को सराहा नहीं जाता. बच्चे, जो हमेशा नई चीज़ों के चक्र में फंसे रहते हैं, वे उस पिता की भावनाओं और त्याग को समझ ही नहीं पाते.

इस स्थिति में सबसे बड़ा दुख तब होता है, जब एक पिता इतने प्रयासों के बाद भी अपनी बेटी को खुश नहीं देख पाता, बल्कि उल्टे आरोपों, तानों और शिकायतों का सामना करता है. एक समय था जब जीवन में छोटी-छोटी चीज़ें भी मायने रखती थीं. खुश रहने के लिए कहीं से भी ख़ुशी ढूंढी जाती थी. खुशियाँ नई वस्तुओं में नहीं, बल्कि रिश्तों की आपसी समझ, कृतज्ञता और स्नेह में होती हैं.  काश! आज के बच्चे यह समझ पाते.

मैं सोचता हूँ, जब एक पिता, जिसने हमेशा सच्चाई और ईमानदारी से जीवन जिया है, को बार-बार झूठा कहा जाए या उस पर हमेशा झूठ बोलने की तोहमत लगाई जाए, तो उनकी आत्मा की स्थिति क्या होगी? यह सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है. दर्द, निराशा और कष्टदायक भावनाएँ तब और हिलोरें मारने लगती है तब जब उसे अपने बच्चों द्वारा इस तरह के निराधार आरोपों का सामना करना पड़े. एक ही बात को लेकर जिद पकड़ें रहना या नकारात्मकता से घिरे रहना सही नहीं है. माँ की बातों में आकर, या फिर माँ के बचाव में जब बच्चे भी कुछ ऐसा ही व्यवहार अपनाते हैं, तो एक पिता की आत्मा आहत से भर उठता है.

आजकल यह देखा जा रहा है कि सामान्यतः बच्चे बिना किसी सवाल के माँ की बातों को "परम सत्य" मान लेते हैं. अपनी बात साबित करने के लिए समय-समय पर पिता की हजारों गलतियों को सामने लाया जाता है. माँ के इस व्यवहार के कारण पिता की इज्जत घर से गायब हो जाती है, और उन्हें तुच्छ समझा जाने लगता है. मेरा मानना है कि पिता की भूमिका एक एटीएम मशीन की नहीं होनी चाहिए बल्कि, वह एक मार्गदर्शक, संरक्षक और परिवार का स्तंभ के रूप में भी देखा जाना चाहिए. पहले कुछ ऐसा ही था. पर आजकल घरों में मायों का ज्यादा चलती है.

कुलमिलाकर, एक पिता अपना दर्द चुप और शांत होकर अंदर ही अंदर सहने की कोशिश करता है, मगर देखना है कितने दिन तक....?

इन्द्रमणि साहू 

7.2.2025 

आज की पीढ़ी को समझना जरुरी है आदर और संस्कारों के महत्व

 वर्तमान समय बड़ा विचित्र है. बहुत ही चिंताजनक स्थिति है. आजकल के बच्चे न केवल अपने माता-पिता का, बल्कि बड़े-बुजुर्गों का भी आदर नहीं करते हैं. पांव छूने जैसी परंपराएँ, जो सम्मान और विनम्रता का प्रतीक होती थीं, आज की पीढ़ी के लिए सिर्फ एक पुरानी परंपरा बनकर रह गई हैं. माता-पिता या बुजुर्गों के पांव छूना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह आदर, आशीर्वाद और संस्कारों की एक अभिव्यक्ति होती है, जो हमारे भारतीय समाज की गहरी जड़ों से जुड़ी है.

देवी-देवताओं के प्रति आस्था भी आज के बच्चों में कम होती दिखाई दे रही है. आधुनिकता, तकनीकी प्रगति और तर्क-वितर्क के इस युग में, कई बार बच्चे आस्था और परंपराओं को "पुराना" या "असंगत" मानकर नज़रअंदाज कर देते हैं. वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र सोच को प्राथमिकता देते हैं, जो अपने आप में ठीक है, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक और सांस्कृतिक जड़ों को पूरी तरह से त्याग देना कहीं न कहीं समाज के नैतिक मूल्यों को कमजोर करता है.

संस्कार, शिष्टाचार, और धार्मिक आस्था केवल परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के उन महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं जो हमें नैतिक रूप से मजबूत बनाते हैं. बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना, माता-पिता का सम्मान करना, और देवी-देवताओं में आस्था रखना हमें विनम्रता, कृतज्ञता, और आध्यात्मिकता की दिशा में बढ़ाता है.

आज की पीढ़ी को यह समझाने की जरूरत है कि पांव छूने या देवी-देवताओं में आस्था रखने से उनकी आधुनिक सोच या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. बल्कि यह उनके जीवन में संतुलन और संतोष को बनाए रखेगा. आदर और विनम्रता के संस्कारों को बनाए रखना सिर्फ समाज और परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है.

सही मार्गदर्शन और समझ के साथ, हम इस दूरी को पाट सकते हैं और अपनी पीढ़ी को एक मजबूत सांस्कृतिक और नैतिक धरोहर सौंप सकते हैं.

- Indramani Sahu

07.02.2025