आग की लपटें-1
आग की लपटें
उठती है
धधक कर
कहती है
मत जीओ इस तरह
बेखबर होकर
त्रासदी की भी सीमा
होती है बर्दाश्त करने की...
दुख-विषाद को
सहर्ष स्वीकार कर के
क्या सिद्ध करना चाहते हो तुम
इस तरह शोर-शराबे में
जीने से
आग की लपटों से
रोज-रोज सुलगने-झुलक्षने से
बेहतर है
एकांत-शांत और निर्जन
स्थल पर जाकर
मुस्कराना
जोर-जोर से
खिलखिलाकर हंसना.
आग की लपटें-2
उब गये तुम इतनी जल्दी
त्रासदी को जीते-जीते
क्यों नहीं समझ पा रहे हो
त्रासदी का सौंदर्यशास्त्र
इसमें छिपी आशा की किरण को
जाओ.
और फिर से जाओ
मेरी तरह
उस धुंए के करीब
घटना-परिधटनाओं के करीब
जो न सिर्फ सताना जानती है
बल्कि जिंदगी
जीना भी सिखाती है
आग की लपटें
न सिर्फ जलाती है
बल्कि, पकाती भी है
और चमकाती भी है
शर्त है उस तपती आग को
समझना.
राज की बात -3
तुम कहते हो
कैसे लिख लेते हैं
इतनी अच्छी-अच्छी कविताएं
कहां से ले आते हो
चुनिन्दे शब्द
मैं आज
राज की बात बता दूं
कि यह न कविता है
और न ही
चुनिन्दे शब्दों का पुलिन्दा
जिसको तुम
कविता कहते हो
वह कविता नहीं
बल्कि
मेरी-आपकी
प्रतिशोध और वियोग की
मात्र एक कार्यवाही है.
आग की लपटें
उठती है
धधक कर
कहती है
मत जीओ इस तरह
बेखबर होकर
त्रासदी की भी सीमा
होती है बर्दाश्त करने की...
दुख-विषाद को
सहर्ष स्वीकार कर के
क्या सिद्ध करना चाहते हो तुम
इस तरह शोर-शराबे में
जीने से
आग की लपटों से
रोज-रोज सुलगने-झुलक्षने से
बेहतर है
एकांत-शांत और निर्जन
स्थल पर जाकर
मुस्कराना
जोर-जोर से
खिलखिलाकर हंसना.
आग की लपटें-2
उब गये तुम इतनी जल्दी
त्रासदी को जीते-जीते
क्यों नहीं समझ पा रहे हो
त्रासदी का सौंदर्यशास्त्र
इसमें छिपी आशा की किरण को
जाओ.
और फिर से जाओ
मेरी तरह
उस धुंए के करीब
घटना-परिधटनाओं के करीब
जो न सिर्फ सताना जानती है
बल्कि जिंदगी
जीना भी सिखाती है
आग की लपटें
न सिर्फ जलाती है
बल्कि, पकाती भी है
और चमकाती भी है
शर्त है उस तपती आग को
समझना.
राज की बात -3
तुम कहते हो
कैसे लिख लेते हैं
इतनी अच्छी-अच्छी कविताएं
कहां से ले आते हो
चुनिन्दे शब्द
मैं आज
राज की बात बता दूं
कि यह न कविता है
और न ही
चुनिन्दे शब्दों का पुलिन्दा
जिसको तुम
कविता कहते हो
वह कविता नहीं
बल्कि
मेरी-आपकी
प्रतिशोध और वियोग की
मात्र एक कार्यवाही है.
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