बुधवार, 6 जून 2012

मेरी तीन कविताएं


आग की लपटें-1
आग की लपटें
उठती है
धधक कर
कहती है
मत जीओ इस तरह
बेखबर होकर
त्रासदी की भी सीमा
होती है बर्दाश्त करने की...
दुख-विषाद को
सहर्ष स्वीकार कर के
क्या सिद्ध करना चाहते हो तुम
इस तरह शोर-शराबे में
जीने से
आग की लपटों से
रोज-रोज  सुलगने-झुलक्षने से 
बेहतर है
एकांत-शांत और निर्जन
स्थल पर जाकर
मुस्कराना
जोर-जोर से
खिलखिलाकर हंसना.

आग की लपटें-2
उब गये तुम इतनी जल्दी
त्रासदी को जीते-जीते
क्यों नहीं समझ पा रहे हो
त्रासदी का सौंदर्यशास्त्र
इसमें छिपी आशा की किरण को
जाओ.
और फिर से जाओ
मेरी तरह
उस धुंए के करीब
 घटना-परिधटनाओं के करीब
जो न सिर्फ सताना जानती है
बल्कि जिंदगी
जीना भी सिखाती है
आग की लपटें
न सिर्फ जलाती है
बल्कि, पकाती भी है
और चमकाती भी है
शर्त है उस तपती आग को 
समझना.
        राज की बात -3
तुम कहते हो
कैसे लिख लेते हैं
इतनी अच्छी-अच्छी कविताएं
कहां से ले आते हो
चुनिन्दे शब्द
मैं आज
राज की बात बता दूं
कि यह न कविता है
और न ही
चुनिन्दे शब्दों का पुलिन्दा
जिसको तुम
कविता कहते हो
वह कविता नहीं
बल्कि
मेरी-आपकी
प्रतिशोध और वियोग की
मात्र एक कार्यवाही है.

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