सोमवार, 17 दिसंबर 2012

लहू के लाल बुंद.

शायद अच्छा ही किया तुमने
पलकें बिछाने के पहले
कांटे बिछा दिये मेरी राहों पर
और
बंद कर लिये अपने घर के द्वार
अब जब-जब खोलोगी तुम
अपने दिल के बंद द्वार
पाओगी मेरा सिसकता दिल
चौखट पर पड़ा हुआ
और गुजरोगे जब भी तुम
अपनी ही गलियों से
देखोगे मेरे पैरों के निशां
वापसी के
और हरेक निशां पे
टपके हुए लहू के लाल बुंद.


-इंद्रमणि साहू
 
मन और मिजाज मेरा

मन और मिजाज मेरा
शहर और गांव से भी
गया-गुजरा है
मानता हॅू
सफर कर रहा है
मन-मिजाज मेरा
एक खास गति और लय के साथ
वजह-बेवजह
जानी-अनजानी राहों पर
बिना पहचान
और इतिहास की चिंता किये बगैर।
इस सफर में न कहीं
भूगोल है न ही फिजां
न इमारतें दिखती है आस-पास
न घुमती हुई धरती
न बाजार न चैराहा
जहां रोका जा सके
मन और मिजाज की गाड़ी ।
काश! होता
मन का शहर का अता-पता
जिनके बदौलत कायम है मिजाज और स्मृतियां
वर्षो से
जो शायद अब बन गया है
मन का शहर की गली
हर चैराहा, हर मकान और हर छत........।
चाहता हॅू
इस सभी स्थलों पर
खोल दूं
एक साथ कई सांस्कृतिक केंद्र
मन और मिजाज का
जहां बहता रहे
जीवन का हर वो प्रवाह
जो आवश्यक  है 
ताकि संवर जाये जिंदगी
और जिंदगी का हर एक स्मृतियां
 बन जाये
श्रद्धा का आवरण भी.
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मैं 
अब
मैं नहीं
मेरा दिल
रोता है
और ढूंढता भी 
वही है....
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मैं और मेरा दिल

मैं अक्सर
कहता हॅू
कि मैं
रोता रहता हूं
और
दिल मेरा
कहता है अक्सर
कि नहीं
मैं रोता हूं.
अब मैं तुम्हें
कैसे यकीं दिलाउं
कि हकीकत है क्या ?
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चांद के पार
आत्मविश्वास भी है
और हौसला भी
फिर भी
डर लग रहा है
चांद के पार जाने से
लेकिन
यह तय है
कि जायेंगे जरूर
हार तो नहीं मानेंगे
हिम्मत तुम भी मत हारो
निश्चित रूप से
पहुंचेगे एक दिन
चांद के पार!
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अब 
अब
मैं
तुझे नहीं
तुझमें
ढूंढता हूँ.

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