गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

आज की पीढ़ी को समझना जरुरी है आदर और संस्कारों के महत्व

 वर्तमान समय बड़ा विचित्र है. बहुत ही चिंताजनक स्थिति है. आजकल के बच्चे न केवल अपने माता-पिता का, बल्कि बड़े-बुजुर्गों का भी आदर नहीं करते हैं. पांव छूने जैसी परंपराएँ, जो सम्मान और विनम्रता का प्रतीक होती थीं, आज की पीढ़ी के लिए सिर्फ एक पुरानी परंपरा बनकर रह गई हैं. माता-पिता या बुजुर्गों के पांव छूना सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह आदर, आशीर्वाद और संस्कारों की एक अभिव्यक्ति होती है, जो हमारे भारतीय समाज की गहरी जड़ों से जुड़ी है.

देवी-देवताओं के प्रति आस्था भी आज के बच्चों में कम होती दिखाई दे रही है. आधुनिकता, तकनीकी प्रगति और तर्क-वितर्क के इस युग में, कई बार बच्चे आस्था और परंपराओं को "पुराना" या "असंगत" मानकर नज़रअंदाज कर देते हैं. वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र सोच को प्राथमिकता देते हैं, जो अपने आप में ठीक है, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक और सांस्कृतिक जड़ों को पूरी तरह से त्याग देना कहीं न कहीं समाज के नैतिक मूल्यों को कमजोर करता है.

संस्कार, शिष्टाचार, और धार्मिक आस्था केवल परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के उन महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक हैं जो हमें नैतिक रूप से मजबूत बनाते हैं. बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना, माता-पिता का सम्मान करना, और देवी-देवताओं में आस्था रखना हमें विनम्रता, कृतज्ञता, और आध्यात्मिकता की दिशा में बढ़ाता है.

आज की पीढ़ी को यह समझाने की जरूरत है कि पांव छूने या देवी-देवताओं में आस्था रखने से उनकी आधुनिक सोच या व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ेगा. बल्कि यह उनके जीवन में संतुलन और संतोष को बनाए रखेगा. आदर और विनम्रता के संस्कारों को बनाए रखना सिर्फ समाज और परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है.

सही मार्गदर्शन और समझ के साथ, हम इस दूरी को पाट सकते हैं और अपनी पीढ़ी को एक मजबूत सांस्कृतिक और नैतिक धरोहर सौंप सकते हैं.

- Indramani Sahu

07.02.2025

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