शनिवार, 16 अगस्त 2025

एक मौन उपस्थिति

सच कहूँ तो,

वह गाय ही तो है-
यह अलग बात है कि
कभी-कभी वह हल्के से
अपना सींग हिलाती है।
पर कहती भी तो है-
डरने की ज़रूरत नहीं,
मैं यहाँ बस यूँ ही खड़ी हूँ।

उसे यूँ ही देख, कभी-कभी लगता है
जैसे वह देवी का दूसरा रूप हो,
जो मेरे द्वार पर
जैसे मौन साधना में खड़ी रहती हो।

जानता हूँ - वह मेरी नहीं है,
शायद वह भी जानती है
कि यह गली ठीक नहीं,
संकरी है, फिसलन भरी है।
फिर भी,
हर रोज़ आकर रुक जाती है
मेरे ही द्वार के सामने।

हम नहीं चाहते कि वह चली जाए,
फिर भी बार-बार उसे भगाते हैं,
किसी जानी-अनजानी विवशता में,
बहुत कुछ सोचकर।
पर वह लौट आती है,
जैसे किसी अदृश्य नाता
बाँध लिया हो उसने यहाँ।

उसकी उपस्थिति मेरे भीतर कुछ जगाती है,
कभी शांति, कभी धैर्य,
तो कभी एक अजीब-सा सुकून देती है;
जैसे कोई पुराना रिश्ता
जो हमारे हिस्से का न होकर भी
हमारे जीवन में लगातार बना रहता है।

सच कहूँ तो,
उसकी स्थिरता में
मुझे किसी विदुषी का ध्यान दिखता है,
उसकी शांत पगुराई में
जैसे कोई प्रार्थना प्रतिध्वनित होती है।

और हाँ, जिस दिन वह नहीं आती,
मेरे भीतर एक शून्य पसर जाता है-
अनजानी-सी व्याकुलता
मेरे भीतर चलने लगती है,
लगता है जैसे जीवन से
कोई अदृश्य आशीर्वाद
अनुपस्थित हो गया हो...”

-इंद्रमणि साहू

16/08/2025

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