इंद्रमणि साहू
जिला कोडरमा: एक संक्षिप्त परिचय
समुद्रतल से 397 मीटर की ऊंचाई पर बसा है यह जिला। इसकी स्थापना 10 अप्रैल 1994 को हुई। विश्व के मानचित्र में यह जिला अबरख उद्योग को लेकर विख्यात है। कोडरमा को जिला बने आज 11 वर्ष हो चुके हैं। पहले यह हजारीबाग का अनुमंडल था। फिलहाल कोडरमा इसका मुख्यालय है। कोडरमा रेलवे लाइन से विश्व के देश का हर भाग जुड़़ जाता है। रेडियो फरमाइश फिल्मी गानों एवं फिल्मी डायलाॅगों से मशहूर झुमरी तिलैया इसी जिला का एक प्रमुख शहर है। ध्वजाधरी पहाड़, माता चंचला धाम, तिलैया डैम, पेट्रो जलप्रपात, धोरसीमर स्थित पुरातात्विक स्थल यहां का दर्शनीय स्थल के रूप में माना जाता है।
अध्ययनकर्ता
इन्द्रमणि
(स्वतं़त्र पत्रकार सह सामाजिक कार्यकर्ता)
समर्पण,
सुन्दरनगर, कोडरमा
9934148413
अध्ययन वर्ष-2005
जिला कोडरमा: एक संक्षिप्त परिचय
समुद्रतल से 397 मीटर की ऊंचाई पर बसा है यह जिला। इसकी स्थापना 10 अप्रैल 1994 को हुई। विश्व के मानचित्र में यह जिला अबरख उद्योग को लेकर विख्यात है। कोडरमा को जिला बने आज 11 वर्ष हो चुके हैं। पहले यह हजारीबाग का अनुमंडल था। फिलहाल कोडरमा इसका मुख्यालय है। कोडरमा रेलवे लाइन से विश्व के देश का हर भाग जुड़़ जाता है। रेडियो फरमाइश फिल्मी गानों एवं फिल्मी डायलाॅगों से मशहूर झुमरी तिलैया इसी जिला का एक प्रमुख शहर है। ध्वजाधरी पहाड़, माता चंचला धाम, तिलैया डैम, पेट्रो जलप्रपात, धोरसीमर स्थित पुरातात्विक स्थल यहां का दर्शनीय स्थल के रूप में माना जाता है।
इसके अतीत में झांके तो पाते हैं कि पूरे कोडरमा प्रक्षेत्र में जंगल ही जंगल था। विचरण करते हुए वन प्राणियों की बहुतायत थी। बाधीटांड ब्याघ्रों के विचरण का प्रमुख विचरण स्थल था। आज भी इस इलाके को बाधीटांड के नाम से जाना जाता है। हालांकि, अब यहां बाघ या अन्य छोटे-बड़े वनप्राणी कभी देखने को नहीं मिलता है। क्यांेकि, बड़ी तेजी से जंगलों का सफाया होता जा रहा है. अबरख की खदानें, प्रकृति की नैसर्गिक सौंदर्य और प्राकृतिक जंगलांे से भरा-पूरा इलाका अब मरुस्थल का रूप लेता जा रहा है।
आज से लगभग 15 साल पहले तक कोडरमा से लेकर गिरिडीह तक और और शहरों से लेकर जंगलों तक छोटे-बड़े अबरख फैक्ट्रियों और खदानों की जाल बिछी हुई थी. जहां लगभग एक लाख मजदूर काम करते थे। यहां की सबसे बड़ी अबरख की कंपनी क्रिश्चन माइका इंडस्ट्रीज था. जिसके अधीन लगभग चालीस हजार मजदूर कार्यरत थे। इसका प्रधान कार्यालय और मुख्य फैक्ट्री डोमचांच (कोडरमा) में था. इसके मैनेजिंग डायरेक्टर श्री रामगोपाल अग्रवाल थे. उस समय श्री अग्रवाल बड़े पूंजीपतियों में से एक था. ज्ञान और धन के मामले में धनी व्यक्ति थे शायद इसलिए उन्हें राज्यभाषा के सदस्य भी बनाए गए थे. न सिर्फ राम गोपाल अग्रवाल बल्कि यहां के कई पूंजीपतियों ने आर्थिक जगत में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है.
धीरे-धीरे अबरख उद्योग अपनी अवनति की ओर आने लगा. क्योंकि, पष्चिमी देशों ने इसका सब्स्टीच्यूट खोज निकाला. यह माना जाता है कि माईका उद्योग ने जहां एक तरफ मुट्ठी भर लोगों के हाथों में आर्थिक संपन्नता, विशेष ख्याति और विदेशी मुद्रा कैद कर दी, वहीं इस उद्योग ने हजारों लोगों को जीविकोपार्जन का एक सशक्त जरिया प्रदान किया था। सरकार को भी इससे भारी राजस्व की प्राप्ति होती थी. फिर भी सरकार ने इसका संरक्षण-संबर्द्धन के लिए कोई पहल नहीं किया. कहा जाता है कि इस क्षेत्र में अबरख उद्योग जब अपने पूरे उफान पर था तब यहां एक लाख मजदूरों व हजारों कर्मचारियों को रोजगार मिला था. यहां की सीएच कंपनी में लगभग 60 हजार तथा क्रिश्चन माइका इंडस्ट्री में लगभग 40 हजार रजिस्टर्ड कामगार थे। इसके अलावे अन्य संचालित दूसरी खदानों, तिलैया, डोमचांच, कोडरमा, लोकाई, इंदरवा, छतरबर, करमा, चाराडीह, असनाबाद स्थित माइका गोदामों में भी काफी संख्या में कामगारों (मलकट्टा) को रोजगार मिला हुआ था।
1965 की अवधि में यहां इस उद्योग की स्थिति काफी बेहतर थी। रोजाना विदेशों से खरीददार भी यहां आते रहते थे जिसके कारण यहां की आर्थिक संरचना काफी मजबूत थी। 1975 के बाद इसमें लगातार गिरावट आती गई और वर्तमान में यहां की तमाम अबरख खदानें बंद हो चुकी है। वैसे, एकाध खदानें अब भी चालू हालत में है मगर नाममात्र के. जब से अबरख की खदानें बंद हुई हैं तब से बड़े-छोटे सभी व्यापारियांे और मजदूरों-कर्मचारियों का रोजगार छिन गया है और वे बेकारी, भुखमरी, मुफलिसी की जिंदगी जीने को बाध्य हो गये हैं.
जिला बनने के बाद कोडरमा विकास के पथ पर अग्रसर होने के बजाय विनाश की ओर कदम बढ़ाया है. इसकी रौनक जो हजारीबाग जिला में शामिल ररहने पर थी, वह अब नहीं है. बताया जाता है कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रभावी होने से भी यहां की काफी खदानें बंद हुइ्र्रंं. झारखंड राज्य बनने के तुरंत बाद यहां राज्यस्तरीय एक कार्यशाला 2001 में अबरख उद्योग की बदहाली और दूर करने के उपाय विषय पर आयोजित की गइ्र्र थी। जिसमें राज्य सरकार के तात्कलीन खनन मंत्री रविंद्र राय तथा बिहार-झारखंड के सभी वरीय अधिकारी एवं विशेषज्ञ इसमें शामिल हुए थे. बावजूद, इसके उस प्रयास का आज तक कोई परिणाम सामने नहीं आ पाया। वहीं दूसरी ओर, अबरख उद्योग से पनपे उद्योगपतियों एवं व्यापारियों ने आज इस इलाकों में बड़ी संख्या में क्रेशर फैक्ट्रियां खोल ली हैं। जो इस जिला के लिए एक चुनौती बन गयी है. झारखंड और कोडरमा जिला के लिए यहां की क्रषर फैक्ट्रियां एक अशुभ संकेत है.
जानकारांे की दलील है कि अगर नए व वैज्ञानिक तरीकों से अबरख उत्खनन के व्यापार को सरकार बढ़ावा दिया जाय तो न सिर्फ यहां की स्थिति बदल सकती है बल्कि, क्षेत्र से पलायन और अपहरण-लूट की घटनाओं में भी कमी आएगी. साथ ही, सरकार को भी भारी राजस्व की प्राप्ति होगी.
जिला कोडरमा: एक नजर में
जिला का गठन 10 अप्रैल 1994
कुल आबादी 4,98,683 ;2001 के मुताबिक
पुरुष आबादी 2,49,276
महिला आबादी 2,49,407
शहरों में रहने वाली कुल आबादी8,6604
समुद्रतल से ऊंचाई 397 मीटर
कुल क्षेत्रापफल 1,31,997.9 हेक्टेयर
कुल साक्षरों की संख्या 21,0679
जनसंख्या घनत्व 380
कुल श्रमिकों का प्रतिशत 35.11 प्रतिशत
साक्षरता दर 52.73 प्रतिशत
पुरुष साक्षरता दर 71.57 प्रतिशत
महिला साक्षरता दर 34.04 प्रतिशत
प्रखंडों की संख्या 6 (कोडरमा, मरकच्चो, जयनगर,
चंदवारा, सतगांवां एवं डोमचांच)
कुल पंचायतों की संख्या 80
कुल गांवों की संख्या 717
चिरागी गांवोंु की संख्या 577
बेचिरागी गांवों की संख्या 140
प्रा0 विद्यालयों की संख्या 262
मध्य विद्यालयांे की संख्या 61
उ0 विद्यालयों की संख्या 16
महाविद्यालयों की संख्या 07
इंटर महाविद्यालयों की संख्या 2
आदिम जनजाति -
बिरहोर कुल परिवार 263
खनिज संपदा ः अबरख, ब्लूस्टोन,रेम्बो, गारनेट,
तुरमुलीन, बैरूज, पफेलसेपफर,
क्वाटर्ज, बेरियल आदि
जातीय आंकड़ा
यादव ः 2,49,535
मुस्लिम ः 59,885
घटवार ः 25,762
राजपूत ः 20295
भूमिहार, ब्राह्मण व अन्यः 18,735
मोदी एवं वैश्य ः 52,677
अनुसूचित जाति ः 67494
अ0जनजाति ः 4300
लगातार पांच वर्षों से भीषण अनावृष्टि एवं सूखा से त्रस्त है कोडरमावासी
कोडरमा जिला बीते पांच वर्षों से भीषण सूखा के चपेट में है। बीते वर्ष जहां यहां 10 प्रतिशत मात्रा रोपा हो पाया था, वहीं इस वर्ष 20 से 25 प्रतिशत रोपा हो पाया है। धान के बिचड़े खेतों में ही सूख गए। जिन बिचड़ों को किसानों ने रोपा भी, वे सूखकर कुश बन गए। खेतों में दरारें पड़ गई हैं। यही बीते पंाच वर्षों से होता आ रहा है। लिहाजा, यहां के किसान भारी फजीहत और किल्लत में जीने को बाध्य हैं। पांच साल से लगातार इस भयावहता को लेकर कोडरमावासी चिंतित हैं पर इसके कारणों पर कोई पहल या चर्चा नहीं कर रहे हैं। हां, किसान वर्ग जरूर इसके निदान के प्रति सोचते हैं, क्रशरोें के बढ़ते आतंक पर चिंता व्यक्त करते हैं, जंगल की कटाई को रोकना चाहते हैं, पर उनकी चिंता एकमुश्त नहीं हो पा रही है। कोई राजनीति पार्टी या स्वयंसेवी संस्था उनके हक अध्किार के लिए कार्य नहीं कर रही है। प्रशासन तो इस भयावहता को और बढ़ाने में जुटे हैं।
जिला बनने के 11 साल और अलग राज्य निर्माण के 10 साल बाद यहां के लोगों के जीवन स्तर में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया। वर्षा के मौसम में भी पेयजल की किल्लत बरकरार रहती है। जलस्रोत विकसित करने के लिए कोई बेहतर प्रयास नहीं चल रहा है.
कृषक रामकिसुन सुंडी (65 वर्ष) डोमचांच निवासी कहते हैं कि विकास और उद्योग के नाम पर सरकार और जिला प्रशासन द्वारा करोड़ों खर्च किया जा रहा है पर जंगल सुरक्षा, प्राकृतिक सौंदर्यता को बरकरार रखने की दिशा में कोई ठोस कदम आज तक नहीं उठाया गया है। वे कहते हैं कि यहां के नौकरशाहों, कर्मचारियों या अधिकारियों में ऐसा कोई दूरदृष्टि नहीं है कि वे इसका ख्याल कर सके। जलछाजन योजना, तालाब निर्माण योजना या सुखाड़ राहत योजना को उन्होंने बकवास, फालतू और बिचैलियों का मात्र लूट का हथकंडा बताया।
सरकारी विभाग के मुताबिक जून माह (2005) में यहां 165.7 सामान्य वर्षा होती थी पर वास्तविक वर्षा 125.8 मिमी हुई। इस तरह जून 2005 में 39.9 मिमी वर्षा में कमी हुई। इसी तरह जुलाई 2005 में 65.1 मिमी वर्षा की कमी हुई। अगस्त 2005 में 322.9 मिमी की तुलना में महज 140.4 मिमी ही वर्षापात हुआ।
विभाग के मुताबिक इस वर्ष पूरे जिले में 14 हजार हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती (रोपनी) किए जाने का लक्ष्य निर्धरित था। जिसकी तुलना में मात्रा 7671 हेक्टेयर भूमि पर रोपनी हो पाई है।
इसी तरह मक्का का लक्ष्य 4 हजार 60 हेक्टेयर था जिसके एवज में 4314 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती की गई। दलहन 6330 हजार हेक्टेयर भूमि में से 4082 हजार हेक्टेयर भूमि पर (64 प्रतिशत) खेती हो पाई है। इसी तरह तेलहन 495 हेक्टेयर भूमि मंे से 391 हेक्टेयर भूमि पर फसल लगाई गई है। अन्य फसलों में 323 हेक्टेयर भूमि से से 615 हेक्टेयर भूमि पर फसल लगाई गई है।
क्र. प्रखंड सामान्य वर्ग डड वास्तविक वर्षा डड पफसल धन ;हे0द्ध लक्ष्य वास्तविक
मक्का लक्ष्य प्राप्ति ;हे0द्ध
1 कोडरमा 317.6 120.2 4200 2766 1160 1069
2 च्ंदवारा 317.0 231.8 1600 864 550 440
3 सतगावां 239.4 153.4 1400 994 700 599
4 जयनगर 340.0 116.0 3900 1710 800 1172
5 मरकच्चो 239.3 102.8 2900 2149 850 1034
क्र0 प्रखंड दलहन ;हे0द्ध लक्ष्य प्राप्ति तेलहन लक्ष्य प्राप्ति अन्य लक्ष्य प्राप्ति
1. कोडरमा 1430 1130 100 81 68 55
2. च्ंदवारा 1400 735 95 70 75 60
3. सतगावां 1300 770 90 64 53 53
4. जयनगर 1100 662 90 45 64 373
5. मरकच्चो 1000 837 85 40 64 73
अगस्त 05 तक जिले के नंबर वन गेहड़ा खेत की फसलें कम प्रभावित हुइ्र्र हैं शेष तो पीले पड़ गए हैं। प्राकृतिक संसाधनांे की लूट और प्रदूषण इस इलाके की प्रमुख समस्या है। पर्यावरण या प्रकृति का स्वरूप बिगड़ना इसी का परिणाम हैै। प्रकृति का सहेजना और प्रकृति के साथ जीना आज यहां किसी की मंशा नहीं है। जिले में लगातार बढ़ते सूखा और प्रदूषण की समस्या सबके लिए चिंता का विषय बना हुआ है। कुछ किसानों ने कहा कि कर्ज लेकर पफसल लगाए हैं पर आगे अब ऊपर वाले की मर्जी। कुछ किसानों की स्थिति ‘क्या करें, क्या न करें’ वाली स्थिति बनी हुई है।
जीवनदायिनी प्रकृति का हो रहा अनाप-सनाप दोहन
वैसे कहा जाता है कि कोडरमा इलाका कभी भूखा और सूखा न रहा. क्योंकि यहां प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा, जंगल और प्रकृति का शाश्वत सौंदर्य व्याप्त था। आकाष में मंडराते बादल से खीचकर वारिष करवाने की क्षमता यहां की प्रकृति में था. ऐसे में प्रकृति को कौन नहीं पूजेगा यहां ? शायद इसलिए यहां ज्यादातर मंदिर पहाड़ों व जंगलों में अवस्थित है। या यूं कहंे कि यहां की प्रकृति जीवनदायिनी है। वैसे, प्रकृति जीवन देती ही है, पर यहां की प्रकृति कुछ खास है। अबरख, ब्लूस्टोन, गारनेट, तुरमुलीन, फेलसेपफर, क्वार्टज, बेरियल आदि जैसे खनिजों का यहां भंडार है। परंतु विकास के लिए प्रकृति का अनाप-शनाप दोहन आज यहां की नियति बनी हुई है। जिले के पांच प्रखंडों (2005) में से 3 प्रखंडों में लगभग 1000 की संख्या में फैली क्रेशर और दर्जनों खदान इसके प्रमाण हैं। बताया जाता है कि झारखंड का दूसरा सबसे बड़ा खदान अम्बादाहा (कोडरमा) है। ऐसे खदानों एवं क्रेशरों की बढ़ती संख्या की वजह से अब यहां की प्रकृति वरदान नहीं बल्कि अब अभिशाप सिद्ध हो रही है।
भौगोलिक स्थिति के मुताबिक यह जिला पूरी तरह पहाड़ों व जंगलों से घिरा हुआ था, जबकि आज स्थिति यह है कि आरक्षित वन 15,630 हेक्टेयर और सुरक्षित वन 73,408 हेक्टेयर शेष रह गए हैं। इस तरह कुल 89.038 हेक्टेयर वन भूमि वन क्षेत्र के एक चैथाई भाग पर भी अब जंगल नहीं रहा है।
इधर एक दशक से प्राकृतिक जंगलों को बेहिसाब तरीके से उजाड़ा जा रहा है। क्रशरों की वजह से आज पूरा इलाका प्रदूषित हो गया है। पूरा का पूरा इलाका जंगलविहीन और जलविहीन होता जा रहा है। इसका व्यापक असर कृषि पर पड़ा है। बीते पांच वर्षों से लगातार सुखाड़ व अकाल की समस्या इसी का परिणाम है। प्रकृति का अंधाघुंध दोहन से ही लगातार बंजर होती जमीन, बढ़ते प्रदूषण व गिरते भू-जल के प्रति न प्रशासन चिंतित है और न ही यहां के जनप्रतिनिधि हो। प्रशासन चिंतित इसलिए नहीं है क्योंकि उसे प्रतिमाह बंधी-बंधाई रकम पहुंुचती ही है। जनप्रतिनिध्यिों या तमाम छुटभैया नेताओं का खुद की फैक्ट्रियां व खदान हैं इसलिए वे इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं। आखिर कौन लगाएगा ? लिहाजा, लगभग सभी गांव भूख, बीमारी, गरीबी, प्यास, अकाल, सुखाड़ जैसी समस्या से जूझ रहे हैं।
क्रशरों की बढ़ती संख्या की वजह से ही यहां की प्राकृतिक सौंदर्यता एवं हरियाली लगातार समाप्त होती जा रही है। यहां 12,958 हेक्टेयर जमीन खेती लायक है जो क्रेशरों से उत्पन्न प्रदूषित ध्ूाल (डस्ट) से यहां की जमीन लगातार बंजर हो रही है। यह स्थिति देख किसान खासे चिंतित हैं। चाहे वह किसान कटरियाटांड के मंजूर आलम, मो0 अस्लम, मो0 इब्राहिम हो या नवलशाही के रामचंद्र साब, बिरजू मंडल, बदरी पंडित, एतवारी साव....। सभी के दुख एक समान है। सभी चाहते हैं कि इस इलाके का क्रशर बंद हो जाय पर वे सभी बंद करने के लिए संघर्ष करने से डरते हैं। वे क्रशर मालिकों से पंगा नहीं लेना चाहते हैं, क्योंकि उनकी पहुंच और पैसा सभी जगह हावी है। पद, पैसा और पहुंच की वजह से गरीबों, मजदूरांे एवं किसानों को आज न्याय नहीं मिल पा रहा है।
डस्ट फांकते लोग और बंजर होती जमीन
कोडरमा जिला में सबसे ज्यादा राजस्व चुकाने वाले एवं फसल उत्पादन करने वाले क्षेत्र डोमचांच इन दिनों प्रदूषण, गंदगी, बीमारी और भूमि का बंजरीकरण के दौर से गुजर रहा है। इस समस्या की विकरालता का अंदाजा इसी से लगाया ला जा सकता है कि लगभग 200 वर्ग किमी0 क्षेत्र में लगभग 900 क्रेशर, कोडरमा सदर में 400 एवं मरकच्चों प्रखंड में लगभग 500 और लगभग 200 की संख्या में छोटे-बड़े खदान हैं। चंदवारा प्रखंड में भी लगभग 100 क्रेशर हैं। खदान और क्रेशरों की वजह से तेजी से जंगल उजड़ रहा है और वहीं दूसरी ओर प्रदूषण, गंदगी और बीमारी इन दिनों डोमचांच एवं डोमचांच के आस-पास के इलाके की निशानी बन गई है। पेड़ के पत्ते हरा होता है पर इस इलाके के पेड़ों की पत्तियां सफेद हैं। पत्थरों के टूटने एवं उनसे उड़ने वाले ध्ूालकण (डस्ट) से सभी पेड़ों की पत्तियां सफेद-सफेद सी हो गई है। बरियारडीह से कोडरमा तक बगैर हेलमेट पहने मोटरसाइकिल से गुजर पाना दुभर है।
शाम के वक्त तो पास से पांच से 10 फीट की दूरी भी दिखना मुश्किल होता है। कहा जाता है कि शाम को वायुमंडल ठंडा होने के कारण ध्ूालकण ऊपर उठने की बजाय नीचे ही मंडराता रहता है। इस क्षेत्र में बढ़ता हुआ ध्ूालकण, गैस, बढ़ता सौर, दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होता जल और नष्ट होते पेड़-पौध्ेा प्रदूषण के खतरे की ओर बढ़ाते जा रहे हैं।
फुलवरिया, धरगांव, इंदरवा, नवलशाही, पहाड़पुर, नवादा, नेरुपहाड़ी, कटरियाटांड, गेंदवाडीह, सलैयडीट, पंचगांवां मोड़, पुरनाडीह, महेशपुर, डुमरगढ़हा, मरकच्चो, बरियारडीह, चमारो, काराखूट, बहादुरपुर, नावाडीह आदि दर्जनों गांव के आम नागरिकों का जीवन इन क्रशरों की वजह से दमघोटू बन गया है। न सिर्फ क्रेशरोें में कार्यरत मजदूर इसके शिकार हो रहे हैं बल्कि आसपास के लोग और आने-जानेवालों पर भी इसका बेहद बुरा असर पड़ रहा है।
उक्त इलाकों के लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र मरुभूमि बन चुका है। क्रेशरों एवं खदान की गंदगी से ऐसा हुआ है। सड़क के दोनों किनारे की जमीन देखने से इसका सहज अंदाजा लग जाता है। लोग अपनी बेकारी और बेरोजगारी दूर करने के लिए जंगल व वृक्षों की कटाई करते हैं। लोग साइकिल पर इसे लादकर डोमचांच-कोडरमा बाजार में बेचकर अपना गुजारा करते हैं। सखुआ एवं अन्य कीमती लकडि़यां का टुकड़ा-टुकड़ा कर बाजार में ले जाकर बेचते हैं। प्रति साइकिल 100 से 150 रुपया में इसकी बिक्री होती है। न सिपर्फ डोमचांच, बगड़ों, कोडरमा, नवलशाही आदि चैक चैराहे पर स्थित होटलों में मोटा-मोटा लकड़ी जलावन के काम में लाते हैं। संपन्न परिवारों में भी लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है। कहा जाता है कि कोयला और गैस से अभी यहां लकड़ी सस्ता है। साइकिल पर सवार लकड़ी बेचने वाले मजदूर और बोझा ढोने वाली महिला मजदूर हर रोज कतारों में देखने को अक्सर मिल जाते हैं। यह नजारा बरियारडीह से लेकर लोकाई तक देखने को ज्यादा मिलती है।
इस तरह लगतार कटते जंगल, बढ़ते क्रशरों की संख्या आदि से इस क्षेत्र के हजारों एकड़ भूमि बंजर होती जा रही है। लगतार जलस्रोत भरता जा रहा है।
कुल मिलाकर एक भी गांव पर्यावरणीय, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, साामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से समृद्ध और खुशहाल नहीं है।
इस इलाके की प्रमुख बीमारियां
ग्रामीण बताते हैं कि न सिर्फ क्रशरों एवं खदानों में कार्यरत मजदूर गंभीर बीमारियांे के शिकार हो रहे हैं बल्कि आम नागरिक भी इन दिनों क्रशरों के डस्ट से बीमार पड़ रहे हैं। बताया जाता है कि नवलशाही, निरुपहाड़ी, फुलवारिया के आस-पास केे पांच गांव में करीब 25 लोग बीते पांच वर्षो में टीवी रोग की चपेट में आकर अपनी जान गवां चुके हैं। वैसे, इलाके की प्रमुख बीमारियों में से डस्ट एलर्जी, साइनस, दमा, टीवी, सिलोकोसिस, इस्नोफीलिया, खांसी आदि हैं। इस इलाके में ऐसे रोगियों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है।
ऐसे कहा जाता है कि किसी भी औद्योगिक क्षेत्र में पांच सौ माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर डस्ट सहनीय माना जाता है। परंतु, इस क्षेत्र के लोग इससे तीन गुणा ज्यादा डस्ट फांक जाते है।
घटता, जल, कटता जंगल, निठल्ला प्रशासन और बेहाल जनता
‘दिल को तेरी तलाश तेरी जुस्तजूं तो हैै, मिलना तेरा मुहाल है मगर आरजू तो है’ काशिफ के शेर की यह पंक्ति कोडरमा जिला के लोगों के दिल की बात कह जाती है। यहां के लोगों को अब अपनी महबूबा की नहीं, रोजगार, बिजली, सिंचाई, पानी, जंगल आदि की आरजू है। लेकिन इन चीजों का मिलना अब इन्हें मुहाल लगता है।
वैसे भी, अबरख उद्योग बंद होने के बाद कोडरमा जिला खासकर कोडरमा सदर एवं मरकच्चों प्रखंड के 90 फीसदी से अधिक जनता जिंदगी जीती नहीं बल्कि काटती (ढोती) है। यहां की जनता को अब जिंदगी काटना भी दूभर हो गया है। वजह यह कि क्रेशरों की बढ़ती संख्या से खेती और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ ही रहा है दूसरी ओर बेरोजगारी के कारण ज्यादातर लोग अब पलायन कर गए हैं। यहां एक साल की ख्ेाती में अधिक से अधिक 5-6 माह का अनाज होता है। मानसून के भरोसे खेती होती है। मानसून धोखा दिया तो यह भी उन्हें हाथ से धोना पड़ता है। उधर रासायनिक खाद, विदेशी बीज के बढ़ते प्रचलन से भी खेती घाटे का सौदा लगने लगा है।
कोडरमा सदर एवं मरकच्चो प्रखंड के लगभग 50 गांवों में पाये जाने वाले कीमती पत्थरों का बे-रोक-टोक अवैद्य उत्पखन्न हो रहा है। उत्खनन के काम को आसान व सहज बनाने के लिए पत्थर माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर जंगल उजाड़े जा रहे हैं। लिहाजा, यहां का रहा-सहा जंगल उजाड़ता जा रहा है। इस काम में बच्चों एवं महिला मजदूरों को भी हाड़-तौड़ खटाया जाता है। अब तो ऐसे खदानों एवं क्रेशरों में ज्यादातर मजदूर बिहार के विभिन्न जिलों से आए हुए हैं। लोकल मजदूरांे की संख्या काफी कम है। लोकल मजदूर सिर्फ पत्थर तोड़ने और ट्रक में चिप्स लादने का काम करते हैं।
यहां के लोग आज भी महाजनी शोषण के शिकार हैं। हालांकि, बहुत हद तक इससे मुक्ति मिली है। लेकिन, इधर ज्यादातर लोग सरकारी कर्ज में फंसे हुए हैं। जो अभी तक बैंक से ऋण नहीं ले सका है वे लेने की काफी उत्सुक हैं।
कटरियाटांड के असीम अंसारी एक गुमटी चलाता है। मारुति चैक के नरेंद्र मंडल एक छोटा सा होटल और मो. इब्राहिम अंसारी (कटरियाटांड) कोलकाता में एक मजदूर के रूप में काम करता है, मो. अंसारी अभी धान रोपने के लिए आए हैं। तीनों के विचार एक सा है। तीनों कहते हैं कि क्रशर का असर अब दिखने लगा है। पहले तो लगा कि क्रशर की संख्या जितनी अधिक होगी, उतने सारे लोगों को रोजगार मिलेगा। पर अब लगने लगा कि एक क्रशर में जहां 10-15 लोगों को रोजगार मिलता है वहीं, सैकड़ों को इससे हानि होती है। तीनों कहते हैं कि अब तक इसके खिलाफ आंदोलन या विरोध नहीं हुआ है लेकिन अब होगा। एक सवाल के जवाब में वे लोग कहते हैं कि विधायक अन्नपूर्णा देवी, पूर्व संसाद तिलकधारी सिंह एवं वर्तमान सांसद बाबूलाल मरांडी या प्रशासन को अभी तक किसी ने लिखित या मौखिक शिकायत नहीं किया है। शिकायत करेंगे भी तो कार्यवाही नहीं होने वाला है क्योंकि, सभी बड़े लोगों का ही क्रशर है या क्रशरों में पूंजी फंसा हुआ है। एक अन्य सवाल के जवाब में कहते हैं कि यहां रोजगार की विकट समस्या तो है पर ‘घर की बुनियाद कोड़ना’ रोजगार या स्वरोजगार तो नहीं न कहलाएगा।
वहीं फुलवारिया पंचायत के पूर्व मुखिया कृष्ण मुरारी मेहता के मुताबिक अबरख उद्योग बंद होने के बाद यहां के लोगों का एक मात्र सहारा क्रशर है। क्रशर बंद होने पर इस इलाके मेें एक बार फिर कोलाहल मच जाएगा। चोरी, डकैती, लूट, हत्या, अपहरण आदि घटनाओं में काफी इजाफा हो जाएगा। उनके मुताबिक यह उद्योग और 25-30 साल तक बेहतर तरीके से संचालित होगा। चूंकि यहां पत्थरों का अकूत भंडार है। उनका मानना है कि सरकार का इस उद्योग को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इससे मजदूरों को रोजगार मिलने केे साथ-साथ सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा। चूंकि श्री मेहता का अपना भी क्रेशर और खदान है इसलिए क्रशर के हानि के बारे में वे न बताकर सिर्फ इसके लाभ ही लाभ बताते हैं।
काराखूट की कलवा देवी (45 वर्ष) पत्थर तोड़ने का काम करती हैं। वे कहती हैं कि इस काम में हमेशा मौत का भय बना रहता है। आये दिन हादसे होते रहते हैं। वे अपने दर्दे-ब्यां में कहते हैं कि यहां यह काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या ?
डोमचांच निवासी अशोक केडिया (45 वर्ष) पेशे से आॅटो ड्राइवर हैं पर चिंतन और सिद्धांत के मुताबिक किसी समाजसेवी या राजनेता से कम नहीं लगते हैं, कहते हैं कि पत्थर के अवैध उत्खनन कार्य में प्रशासन का संरक्षण प्राप्त है। यह काम नेताओं के द्वारा होता है। नेतागण देश सेवा के नाम पर देश को लूटते हैं। यहां के भी ज्यादातर नेताओं का चाहे वह छोटा नेता हो या बड़ा। क्रशर और खनन उनकी आमदनी बढ़ाने का सर्वश्रेष्ठ जरिया है। ऐसे तमाम नेताओं का अफसरों से सांठगांठ है। इसलिए वर्षों से यह उद्योग फल-फूल रहा है। न कोई कानून, न मर्यादा और न ही नीतियां। सब कुछ यहां ऐसे चल रहा है मानो विभाग यहां है ही नहीं। क्रशरों के मामले में कोई क्रशर मालिक एक भी औपचारिक नियम का पालन नहीं कर रहा है। वे कहते हैं कि जनता की नजर में जरूर वह नेता हो सकता है पर मेरी नजर में वे सभी लोग इस जिला के आर्थिक अपराधी हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं होती है, होगी भी नहीं। यदि होता तो ये बड़े बड़े मकान और बहुमंजिला जो आए दिन बन रहे हैं, नहीं बनते। वे आगे कहते हैं कि अबरख बंद हुआ तो क्रशर और पत्थर खदान का उद्योग पनपा। 25-30 साल बाद यह भी बंद होगा तब इस जिला का एकमात्र उद्योग होगा-अपहरण उद्योग। अभी भी यह जिला इस मामले में आगे हैं। तब और ज्यादा होगा। यह संभावना व्यक्त करते हुए यह भी बताते हैं कि 25-30 साल बाद खाली पड़े खदानों मेें मांगुर मछली पाला जाएगा और उस मांगुर का खुराक अपहरण किया हुआ आदमी होगा। चूंकि, आदमी की हत्या कर अपहरणकर्ता या लूटेरा उसे उसी खदान में फेंकेगा। आज यह जिला वैसे भी अपहरण के मामले में बदनाम है।
कुल मिलाकर यहां का जल, जंगल और जमीन आज खतरे में है। प्रशासन लगातार निठल्ला और जनता बेहाल होती जा रही है।
भर गया भथिया तालाब
जिला मुख्यालय से महज 15 किमी की दूरी पर कटरियाटांड (गिरीडीह रोड) स्थित भथिया तालाब कभी इस इलाके का प्रमुख तालाब के रूप में जाना जाता था। तालाब का निर्माण पूरे पारंपरिक तरीके से हुआ था। पर, आज यह तालाब क्रशर डस्ट से लगभग भर चुका है। ग्रामीण चुप हैं। शायद इसलिए कि क्रशर और खदान दबदबावालों का है। लगभग एक एकड़ क्षेत्र में फैला इस तालाब का पानी भी दूषित और हरा हो चुका है। दिन-ब-दिन तालाब का क्षेत्र घटता जा रहा है। कहा जाता है कि इस तालाब से खेतों की सिंचाई और मांगूर मछली का पालन होता था। मछली का बंटवारा कटरियाटांड के लोग आपस में मिलकर करते थे। अब न वह समाज मे वह एकता रहा और न वह तालाब। या यूं कहें कि तालाब का स्वरूप बिगड़ने के साथ-साथ समाज का स्वरूप भी बिगड़ा।
तालाब के आस-पास का घना जंगल, झार-झुरमुट और बांस का गुंथ लगभग खत्म हो चुका है। इसके जगह पर क्रशर डस्ट और खदान का बेकार मिट्टी से बना कृत्रिम पहाड़ दिखाई देता है। लोग कहते हैं कि तालाब का क्षेत्रफल घटने के साथ-साथ पानी का स्तर भी लगभग खत्म हो चुका है। लोग कहते हैं कि पास में खदान और जंगल का खात्मा हो जाने के कारण तालाब क्या कुंआ का पानी भी सूख गया है। कटरियाटांड के ग्रामीण क्रशर-खदान मालिकों के खिलाफ कुछ भी बोलने से घबराते हैं। अभी यही 6 माह पहले इसी गांव के ग्रामीणों एवं खदान मालिकों के बीच हुए झगड़े में ग्रामीणों की हार हो गई। जबकि पूरा ग्रामीण इस मामले को लेकर एकजूट थे। चूंकि खदान ग्रामीण के कब्जे की जमीन है। ग्रामीणों के हक अधिकार के साथ उनकी जज्बात की लड़ाई भी थी। ग्रामीणों ने अपना अधिकार पाने के लिए खदान कार्य लगभग 20 दिनों तक बाधित कर दिया। बाद में इस मामले को लेकर एक बड़े रूप में पंचायत बैठी। क्रशर मालिकों एवं खदान मालिकों ने पंचों को खरीदकर अपने पक्ष में कर लिया। लिहाजा ग्रामीण एकजूट होने के बावजूद वे हार गये।
इस तरह देखा जाए तो इस पूरेे इलाके में क्रषरों का संचालन तीन तरीके से हो रहा है. पहला वैधानिक दूसरा अवैध तरीके से और तीसरा बलपूर्वक तरीके से।
इस घटना के बाद ग्रामीणों में काफी निराशा और हताशा की प्रतिछाया व्याप्त है। उनका आत्मविश्वास डोल गया है। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि पंचों के रूप में शामिल कई नेताओं का चरित्र भी लोगों के सामने आ चुका है।
भथिया तालाब भर जाने के मामले में ग्रामीण पूरी तरह चुप हैं। शुरुआती दौर में चर्चा होती भी थी। अब आपस में चर्चा भी बंद है। कुल मिलाकर भथिया तालाब भरने के मामलों की तरह कई छोटे-छोटे मामले में एक योग्य, निष्ठावान, ईमानदार और सच्चे युवा नेतृत्व कर्ताओं का घोर अभाव को दर्शाता है।
अपहरणनगरी के रूप में तब्दील होता जा रहा है माइकानगरी
कोडरमा को जिला बने 11 वर्ष और अलग झारखंड राज्य के गठन हुए चार बाद भी इस क्षेत्र के लोगों की अपेक्षाएं व आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई है। नतीजतन तमाम क्षेत्रों में लूट, अपहरण, हत्या आदि की घटनाएं बेशुमार बढ़ी है। पिछले एक दशक में यह जिला अपहरण के मामले में काफी चर्चित रहा है। जबकि यही करीब एक दशक पहले यह पूरा इलाका माइका उद्योग के लिए चर्चित था। अब लगातार यह माइका नगरी ‘अपहरण नगरी के रूप में तब्दील होता जा रहा है। जब से माइका उद्योग मरा है तब से यहां के ज्यादातर लोग भूख, बेरोजगारी, बेकारी, बीमारी, बेचारगी व मुफलिसी की जिंदगी जीने को बाध्य है।
वेसे, यह क्षेत्र कृषि पर आधारित क्षेत्र है। लेकिन प्रशासन या जनप्रतिनिधियों की ओर से सिंचाई सुविधा विकसित करने या कृषि की बेहतरी के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। लिहाजा, यहां के किसान मायूस और उपेक्षित हैं। ठीक उसी तरह महिलाओं की स्थिति भी काफी बदतर है। चाहे वह क्रशर में कार्य करने वाली महिला हो, खेतों में काम करने वाली हो या फिर घर में, सभी उपेक्षित, शोषित, अपमानित और पीडि़त हैं। इसके कई स्वरूप हैं।
जिला बनने के पहले और जिला बनने के बाद भी यहां के प्रशासनिक अधिकारी अपनी अकर्मण्यता व विकास की खानापूर्ति में विश्वास करते हैं। वहीं राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने के फिराक में रहते हैं। वे युवाओं और महिलाओं को सिर्फ ‘यूज’ करते हैं और जनसमस्याआंें को नजरअंदाज कर पूंजीपतियों व माफिया तत्वों से साठ-गांठ कर अपनी राजनीति को अंजाम देते हैं।
झारखंड और बिहार के सीमा पर अवस्थित यह जिला इन दिनों विचित्र त्रासदी के दौर से गुजर रहा है। सैकड़ों क्रशरों, दर्जनों तत्थर खदानों और बचा-खुचा माइका का कारोबार के रहने के बावजूद विकास के लिए तरसते लोग, रोजगार के लिए मुंबई, दिल्ली, मेरठ आदि नगरों की ओर भागते लोगों की भरमार है। युवतियों की बिक्री, जंगलों की कटाई, पहाड़ों की लूट और छोटे बच्चों से लेकर व्यवसायी वर्ग तक का अपहरण, राहगीरों के साथ छिनतई आदि यहां की आज त्रासदी बनी हुई है। माइका उद्योग खत्म होने के साथ ही इस त्रासदी की उत्पत्ति हुई है। क्रशरों की भरमार हुई पर लोग इस उद्योग के प्रति आकर्षित नहीं है। यह उद्योग मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के बजाय उनका और प्रकृति का अस्तित्व खत्म करने पर उतारू है। शायद इसलिए इस उद्योग में स्थानीय मजदूरोें की भागीदारी नाममात्र का है। ज्यादातर मजदूर बिहार और दूसरे जिले के हैं। नवलशाही निवासी सह पत्रकार रामदेव शर्मा कहते हैं कि क्रशर व खदान मालिक लोकल मजदूरो को रखना नहीं चाहते हैं। उनका मानना है कि लोकल मजदूरों से उनका ‘पोसाई’ नहीं पड़ता है। जबकि हकीकत यह है कि बाहर के मजदूर दिन-रात काम करके ‘माल’ ज्यादा उत्पादन करते हैं और दूसरी बात यह है कि किसी प्रकार कोई घटना होने पर उस मामले को निपटाने में क्रशर मालिकों को सहुलियत होती है। स्थानीय मजदूरों के साथ वे ऐसा कुछ नहीं कर पाते हैं। जबकि खदानों व क्रशरों में छोटी बड़ी कई घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। इस तरह इस इलाके में प्रचुर भाग में प्राकृतिक संसाधन रहने के बावजूद लोग आज भूख, बीमारी से मर रहे हैं। युवा वर्ग बड़े पैमाने पर अपराधी वर्ग में शामिल हो रहे हैं? आज कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे के प्रति गंभीर नहीं है। लिहाजा, आज कोडरमा या झुमरी तिलैया का नाम सुनते ही लोगों के जेहन में कई दृश्य मंडराने लगते हैं ? आए दिन अपहरण की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण लोग भयाक्रांत है।
कृषक रामकिशुन सुंडी और वरिष्ठ समाजसेवी देवेंद्र मेहता कहते हैं कि 125 साल पहले से चले आ रहे माइका उद्योग को यदि पुनर्जीवित किया जाए तो इस क्षेत्र की बदहाली और बेरोजगारी की समस्या शीघ्र दूर हो सकती है। माइका उद्योग की पुनस्र्थापना के कई संभावनाएं अब भी बची हुई हैं। जरूरत है सिर्फ सरकार की इच्छा शक्ति को विस्तार रूप देने की। दोनों कहते हैं कि जिले के पांच प्रखंडों के आधे से अधिक गांव आज उग्रवाद और अपराधिक गिरोह से प्रभावित हैं। वे आगे कहते हैं कि क्रशर से लोगों को कोई फायदा नहीं है। पर, पूंजीपतियों एवं अधिकारियों को इससे अच्छी कमाई हो रही है। अबरख उद्योग मरने के साथ क्रशर उद्योग में बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही शोषण और शराब की एक नई परंपरा यहां शुरुआत हो गई। जो एक गंभीर चुनौती है। इससे यहां के लोगों को कब मुक्ति मिलेगी, मिलेगी या नहीं, निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
पिछले डेढ़ दशक से अपहरण की घटनाओं मंे लगातार इजाफा होता जा रहा है। जो पुलिस प्रशासन के लिए एक चुनौती बनी हुई है। बताया जाता है कि झारखंड के गिरिडीह, बोकारो, डालटेनगंज, हजारीबाग के प्रमुख उद्योगपतियों, पुलिस तथा चिकित्सा विभाग से जुड़े लोगों का अपहरण इसी जिलों से होकर दूसरे जगहों पर ले जाते हैं। बताया जाता है कि अब तक अपहरण की जो घटनाएं हुई हैं। वह या खेसमी जंगल या बरियाडीह जंगल (घाटी) में घटी है। पर दिन दहाड़े घर या दुश्मनों में घुसकर अपहरण की परंपर वर्ष 2004 से आरंभ हुई है।
सबसे पहले यानि 1994 में सबसे पहला अपहरण झुमरी तिलैया निवासी राजकुमार मोदी का हुआ जबकि एक दशक बाद यानि दिसंबर 2004 में दिन दहाड़े घर दुकान में घुसकर पहला अपहरण हुआ अतिव्यस्त चैराहा झंडा चैक स्थित दुकान ‘आनंद विहार’ के मालिक प्रसि (व्यवसायी एवं वरिष्ठ रीटेरियन ओमप्रकाश खेतान का।
इस प्रकार 1994 से 2005 तक अब तक लगभग 150 लोगों का अपहरण हो चुका है। यानि हर साल लगभग 15 लोगों का अपहरण। इस प्रकार अपहरण कांड यहां एक उद्योग का रूप लिया है जो झारखंड सरकार के लिए चुनौती है। स्थानीय पुलिस प्रशासन की दक्षता पर एक विशेष प्रष्न चिन्ह.
लोग कहते हैं कि देखते ही देखते पूरा का पूरा इलाका आज उग्रवाद व अपराध की आगोश में समा गया। अपराधियों व उग्रवादियों की धमक के कारण पूरा इलाका आज ठहर सा गया है। जिससे विकास कार्य काफी प्रभावित है। अधिकारी भय से सुदूर ग्रामीण इलाकों जैसे मरकच्चों, सतगावां एवं डोमचांच के कुछ इलाकों के लगभग सभी स्वास्थ्य केंद्र व उपस्वास्थ केंद्र बंद पड़े हुए हैं। प्रखंड कार्यालय भी भगवान भरोसे हैं। प्रखंड में पदस्थापित कुछ पदाधिकारी हिम्मत जुटाकर दिन में डयूटी करते तो हैं परंतु शाम ढलने के पूर्व ही लोग कार्यालय व प्रखंड छोड़ देते हैं। अपराधियों व उग्रवादियों की सक्रियता के कारण ही लोग अब इन क्षेत्रों में रिश्तेदारी करने भी कतराने लगे हैं।
कुल मिलाकर बेशकीमती खनिज संपदाओं को अपने आंचल में समेटे वन संपदाओं से परिपूर्ण यह जिला आम उग्रवाद व अपराध का दंश झेल रहा है।
कई आपराधिक गिरोह सक्रिय है इस इलाके में
लाखों की लेवी वसूलते हैं नक्सली एवं आपराधिक गिरोह के सदस्य
यहां के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग एवं राजनीतिक पाटियांे के नुमाइंदों का कहना है कि क्रेशर फैक्ट्रियांें का बढ़ना औद्योगिक विकास है। इससे ही इस क्षेत्र का कायाकल्प हो रहा है। बड़े-बड़े बिल्डिंग खड़ा होना इसी का परिणाम है। क्षेत्र के भविष्य और मजदूरों की स्थिति पर सवाल पर कहते हैं कि बड़े पैमाने पर मजदूरों को भी इससे रोजगार मिल रहा है। स्थानीय मजदूरों के साथ साथ अन्य राज्यों के मजदूरों को रोजगार मुहैया करा जा रही है। लगभग 15 से 25 हजार मजदूर फिलहाल क्रशर, खदान और अबरख उद्योग में लगे हुए हैं। जिसमें 80 फीसदी मजदूर बाहर के (बिहार के) हैं। कहा जा रहा है कि डोमचांच, कोडरमा एवं तिलैया के पत्थर माफिया, क्रशर मालिक, अबरख उद्योग में लगे व्यवसायी एवं ब्लू स्टोन के माफिया आने वाले वर्षों में और राज्य व देश के जाने-माने उद्योगपतियों के रूप में जाना जाने लगेगा।
यह संभावना यहां जिस तीव्र गति से प्रबल होता दिख रहा है। ठीक इसके विपरीत यहां अपहरण, लूटपाट, छिनतई, डकैती और चोरी की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। उक्त संभावना को कम करने के खातिर ही यहां कई आपराधिक गिरोह सक्रिय है। जो गिरिडीह एवं कोडरमा जिले के सीमाई इलाके में स्थित थोडथम्बा, राजधनवार, गावां, डोमचांच, मरकच्चो, सतगावां आदि थाना क्षेत्रों के अंतर्गत हैं।
चूंकि कोडरमा बिहार प्रदेश की सीमा है। गिरोहों के लिए कोडरमा की भौगोलिक स्थिति (बनावट)्र काफी मददगार सिद्ध होती है। इन गिरोहों का काम मुख्यतः सड़क लूट, छिनतई, डकैती और अपहरण कर फिरौती वसूलना है। आए दिन यहां ऐसी घटनाएं घटती रहती है। इससे लोग सहमे हुए हैं। अखबारों में यह जिला इसी मामले को लेकर सुर्खियों में रहा है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ वर्ष 2004 में कुल 28 लोगों का अपहरण हुआ। इनमंे से कई लोग आपराधिक गिरोहों को फिरौती देकर छूटे।
वैसे, इस इलाके में नक्सली गुु्रप और आपराधिक गिरोहों का अलग-अलग काम करने के तरीके हैं। इस बारे में लोग ऐसे जानकारी देते हैं जैसे नक्सली आजू-बाजू खड़ा हों। लोगों को इसके बारे में पूरी जानकारी रहने के बावजूद भी जानकारी देने से हिचकते हैं। हालांकि जो भी हो पर कोडरमा जिला इन दिनों नक्सली ग्रुप एवं आपराधिक गिरोहों के घृणित गतिविधियों से चर्चित होता जा रहा है। आपराधिक गिरोह बिना बताए अपनी गतिविधियों चलाते हैं, वहीं नक्सली गिरोह पूर्व सूचना पर आधरित। क्षेत्र के पत्थर खदान, क्रशर फैक्ट्री, विकास योजनाओं के बिचैलिया वर्ग एवं बीड़ी पत्ता के ठेकेदारों से ये नक्सली संगठन भारी-भरकम लेवी वसूलते हैं। डोमचांच इलाके में फैले क्रशर व पत्थर खदानों का संचालन इन संगठनों की मर्जी पर ही चलता है। ऐसा कहा जाता है। बगैर लेवी दिए खदानों का संचालन नामुमकिन है। खदान संचालकों का भी मानना है कि प्रशासन के बल पर खदान नहीं बल्कि नक्सली को खुश करके खदान और क्रशर चलाया जा रहा है। हां, थोड़ा-बहुत अफसर को भी चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है।
अधिकांश खदानें जंगल में हैं और ऐसे क्षेत्रों में नक्सली ग्रुप सक्रिय हैं। ऐसे में यह ग्रुप खदान संचालकों पर भारी पड़ा रहता है। जब ऐसे ग्रुप खदान पर आते हैं तो संचालकों के माथे पर पसीने छूटने लगते हैं। नक्सली दस्ता के लिए रात्रि भोजन तथा ठहरने का इंतजाम खदान संचालकों को ही करना पड़ता है।
अध्ययन के क्रम में यह बात भी सामने आई कि हर साल जिले के कोडरमा, मरकच्चो, सतगावां के जंगलों में बीड़ी पत्ता की ठेकेदारी होती है। जिसमें लाखों रुपये बतौर लेवी दी जाती है। यह ठेकेदारी भी उनके अनुमति से ही संभव हो पाता है। इसके अलावा क्षेत्र के विकास कार्यों से भी लेवी वसूलते हैं। इसके पहले भी अबरख खदानांे के मालिकों द्वारा भी उग्रवादियों को प्रतिमाह लेवी दी जाती थी। फिलहाल जंगल क्षेत्र में स्क्रैप माइका (ढि़बरा) का व्यवसाय अभी भी बड़े जोर-शोर से चल रहा है।
एक क्लोज मित्र के मुताबिक इस जिले में उग्रवारियों का कोइ अपना औपचारिक संगठन नहीं है। लेकिन, अगल-बगल जिलों में सक्रिय संगठन का प्रभाव यहां भी है। उग्रवादियों/नक्सलियों के नाम पर यहां अपराधकर्मी सक्रिय हें। जिनका काम लेवी वसूलना है।
जो भी हो, पर मजदूरों का शोषण अवैध खदान, क्रेशर संचालन, शराब के बढ़ते कारोबार, जंगल संपदा की लूट आदि सरीखे मामलों में जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों की चुप्पी से क्षेत्र में सक्रिय माफियाआं उग्रवादियों और अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
जिले का औद्योगिक परिदृश्य: विकास और संभावनाएं
खनन तथ धातु उद्योग का इतिहास तांबे के साथ ही शुरू होता है। जिले में ताम्र उधोग तो नहीं पर तांबा की तरह कीमती खनिज संपदा जैसे रेम्बो, ब्लूस्टोन, गारनेट, तुरमलीन, बैरूज, फेेलसेपफर, क्वाटर्ज, वेरियल आदि विद्यमान हैं। पिछले दो दशक तक इस जिले में तांबे के बर्तनोें का उपयोग होता रहा था। अभी भी कुछ घरों में प्रतीकात्मक व शुभ पूजन-पाठ हेतु ऐसे कीमती धातु के बर्तन हैं। लगभग 20-25 वर्षों के पहले तक यह जिला के उक्त कीमती खनिज संपदा से अज्ञात था। खनन का कार्य सिर्फ और सिर्फ अबरख का होता था। गिरिडीह में कोयला और कोडरमा में माइका का इतिहास लगभग एक सा है।
उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक अबरख उद्योग का खनन एवं व्यवसाय बिल्कुल देशी तरीके से चल रहा था। 1870 में झाझा सेक्शन के रेलवे निर्माण इंजीनियर एफ.एफ.क्रिश्चेन ने त्यागपत्र देकर अपना पूरा समय अबरख खनन, परिष्करण एवं निर्यात में लगाया। इन्हीं दिनों एक जर्मन व्यवासायी मूर भी अबरख व्यवसाय में जम चुके थे। कहा जाता है कि प्रथम भारतीय अबरख व्यवसायी थे-क्रांतिकारी मनोरंजन गहाठाकुत्र्ता। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं 20वीं सदी के पूर्वाद्ध में सारे विश्व में अबरख युग का महत्व फैल गया था तथा इसमें भारत का एकाधिकार था। विश्व का सर्वश्रेष्ठ अबरख कोडरमा एवं गिरिडीह जिले में ही मिलता है। कोडरमा के ढाव, ठोढ़ाकोला, नवलशाही, डोमचांच, खेसमी, जंगल आदि और गिरिडीह के डोरंडा, गांवा, तिसरी आदि क्षेत्रों में कइ्र्र महत्वपूर्ण खदानें हैं। इन क्षेत्रों मेें आज भी लगभग 10 हजार मजदूर स्क्रैप माइका चुनकर गुजर बसर कर रहे है। लेकिन, तब यानी 25-30 साल पहले मजदूर खनिज एवं खुदरा व्यवसायी आदि कुल मिलाकर लगभग दो लाख लोग अबरख व्यवसाय में लगे हुए थे। धीरे-धीरे इस उद्योग का सरकारीकरण हुआ और यह उद्योग क्रमशः इतिहास के पन्नों में सिमटता चला गया। इस उद्योग में जब मंदी आई है या सिमट गया है तब से लोगों के बीच भयंकर भुखमरी की स्थिति पैदा कर दी। इस उद्योग में लगे मजदूरों ने खेती बारी नए सिरे से शुरू कर दी या फिर नौकरी की तलाश में बाहर चले गए। लगभग 80 के दशक में इस उद्योग में मंदी का दौर आया। तब से लेकर आज तक इसके पुनस्र्थापना व पुनर्जीवित करने की तमाम संभावनाओं की तलाश जारी है। इसी संभावनाओं के क्रम में क्रशर तथा पत्थर खदान का सामने लाकर रखी गई है। पर यह उद्योग माइका उद्योग ने पिछले 10-20 सालों में बचा-खुचा माइका की अनोखी चमक भी अपने धुल-धुसरित-अंधियारी डस्ट से गौण कर दिया है।
हालांकि, माइका उद्योग की पुर्नस्थापना की कई संभावनाएं अब भी इस इलाके में हैं। जरूरत है सिपर्फ ईमानदार कोशिश करने की।
ढिबरा से लगभग 10 हजार मजदूरों का अब भी होता है गुजारा
जिले के बड़े व्यवसायी या पूंजीपति वर्ग जहां राजस्थान से माइका मंगाकर अपना कारोबार जिंदा रखा है वहीं कुछेक व्यवसायी सस्ते दर पर स्क्रैप माइका को खरीदकर माल सप्लाई व निर्यात कर रहे हैं। 20-25 साल पहले विश्व का सबसे उत्तम क्वालिटी का अबरख यहां मिलता था। सरकार की उदासीनता और कथित राजनेताआं की राजनीति की वजह से लगभग सभी अबरख माइंस बंद हो चुका है। लेकिन, अब भी कोडरमा सदर प्रखंड के सपही, ढाब, जोड़ासीमर, भूजवा, सतगावां प्रखंड के नीमाडीह, जसोडीह एवं मरकच्चो प्रखंड के अरयो, कटियो, नीमडीह आदि दर्जनों गांवों के बच्चे महिला एवं वृद्ध अबरख के खदानों के अंदर से ढि़बरा चुनकर लाते हंै और अपनी जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ा रहे हैं। ज्यादातर गरीब महिला-पुरुष खेसमी एवं ढ़ाब जंगल से दिनभर ढि़बरा चुनते हैं। बदले में उन्हें 30 से 60 रुपये मेहनताना मिल जाता है। 60 रुपये कमाने के लिए कम से कम एक परिवार के तीन सदस्य ढिबरा चुनते हैं। कोडरमा के अम्बादाहा खेसमी एवं ढाब जंगल में ऐसे लगभग 500 नए गढ्ढे बनते हैं। ढिबरा चुनने वालों में ज्यादातर महिलाएं ही रहती हैं। वे सूर्य उगने के पहले घर से चलकर बासी जलपान के साथ जंगल पहंुंच जाते हंै। दिनभर में यही करीब 20 से 40 किग्रा ढि़बरा जमा कर पाती हैं। ढि़बरा की क्वालिटी के आधर पर उन्हें 1 रुपया से 3 रुपया प्रतिकिलोग्राम की दर से मजदूरी मिलती है। इस तरह गरीब महिलाएं कई किस्म के यातनाओं को सहकर अपनी जीविकोपार्जन तो करती हैं। कई बार उन्हेें अपनी जान से भी हाथ धेना पड़ जाता है। बीते साल 3 दिसंबर 2004 को कोडरमा के छतरपुर गांव स्थित जयंती माइंस में अबरख का ढ़ीबरा चुनने गए तीन लोग क्रमशः मो. फारूक अंसारी (45 वर्ष) साबू परवीन (11 वर्ष) एवं खदीजा खातून (30 वर्ष) की मौत चाल घसने से हो गई। प्रो. फारूख और साबू परवीन छतरबर निवासी थे और आपस में बाप-बेटी थे। जबकि खदीजा खातून बाराटोला के रहने वाली थी।
छतरबर, बाराटोला, सलैडीह, चीतरपुर सहित दर्जनों गांवों के दर्जनों लोग रोज की तरह ढ़ीबरा चुनने जयंती माइंस गए थे। अचानक एक महिला समीना खतून ने मिट्टी ध्ंासते देखा और अपने साथियों से भागने को कहा। लेकिन उक्त तीनों मिट्टी में दब गए और दम घुटने से उनकी वहीं मौत हो गई। हल्ला होने के बाद आस-पास अन्य गढ्ढों में ढीबरा चुनने वाले एवं गांव के कुछ लोग तुरंत इक्ट्ठा हुए। मिट्टी जहां ध्ंासी थी वहीं खुदाई की गई पर तब तक काफी विलंब हो चुका था। लगभग 8 फीट गढ्ढा खोदने के बाद तीनों शवों को बाहर निकाले गए।
इस तरह आए दिन ऐसी कई छिटपुट घटनाएं घटती रहती है। ढि़बरा चुनने वालों में जिले के सैकड़ों बच्चे भी शामिल हैं। चाहे वह जयंती माइंस हो या चरकी माइंस या अन्य माइंस सभी जगह सुबह से शाम तक बच्चों का एक बड़ी जामात ढि़बरा चुनते मिल जाता है। ये बच्चों ज्यादातर अनुसूचित जनजाति अनुसूचित जाति एवं पिछड़ी जातियों के होते हैं। महज दो तीन रुपये किलो बिकने वाली ढि़बरा के लिए यहां के बच्चे अपना स्कूल छोड़कर इस कार्य में लगे रहते हैं। इन मासूमों की चिंता न तो सरकार और न ही यहां के जनप्रतिनिधियों को है। यहां के स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस दिशा में कोई पहल नहीं कर रही है।
ढिबरा चुनने वाले एक 10 वर्षीय संदीप कुमार का कहना है कि स्कूल में जाने से उसे क्या मिलेगा। कम से कम ढि़बरा चुनकर और उसे बेचने से 20-25 रुपये कमा तो लेते हैं। रुपये क्या करते हैं के जवाब में वे कहते हैं कि 5 रुपया रखकर शेष राशि वे अपने माता पिता को देते हैं। संदीप कुमार तिलैया बस्ती के वार्ड न0 एक के हरिजन टोला के रहने वाले हैं। संदीप के पिता रिक्शाचालक हैं। इसी बस्ती के अमरदीप, नीरज कुमार दास, सुखलाल दास, मनोज कुमार आदि सभी ढि़बरा चुनकर घर के इनकम में अपनी आमदनी जमा करते हैं।
इस तरह लगभग 10 हजार मजदूर प्रतिदिन ढि़बरा में अपना भविष्य तलाशता और मौत के करीब जाती जिंदगी यहां देखने को मिल जाती है।
घड़ल्ले से हो रही है अवैध कटाई
कोडरमा वन प्रमंडल जो झारखंड के प्रवेश द्वार पर स्थित है, या यूं कहें कि गिरिडीह, हजारीबाग गया वन प्रमंडल से सटा हुआ है, जहां कीमती खैर की लकड़ी के साथ-साथ अन्य कीमती लकड़ी पाया जाना है। आज इसी विशाल जंगल धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहा है। अब अधिकांश जगह विशाल पेड़ की जगह पुटुस की झाड़ी या अन्य जंगलों में मात्र झाड़ी नजर आती है। इस क्षेत्र में बहुत ही बेरहमी से जंगल की अवैध कटाई हो रही है। वन प्रमंडल मुख्यालय के अगल-बगल की जंगल भी इस कटाई का शिकार हो रहा है। प्रतिदिन लगभग 200 से 500 महिलाएं बोझा लेकर वन प्रमंडल पदाधिकारी के कार्यालय से होकर गुजरती है। इससे झांडी, ढाब, डोमचांच, ढोढाकोला, ताराघाटी, दिबौर, छतरपुर, बरियाडीह, नवलशाही, फुलवरिया, नेरोपहाड़ी सहित अन्य क्षेत्रों में उपस्थित धने जंगलों का घनत्व लगातार कम होती जा रही है। अब तो ज्यादातर इलाकों में सिर्फ झाड़ी ही झाड़ी नजर आती है। एक तरफ क्रशरों की बढ़ती संख्या और खदानों का क्षेत्रफल बढ़ने से जहां जंगलों की कटाई हो रही हैं वहीं लकड़ी विक्रेताओं द्वारा भी बड़ी ही धड़ल्ले से जंगलों की कटाई हो रही है। कोयला और गैस से तकरीबन यहां लकड़ी सस्ता है। जिससे यहां के गरीब से अमीर परिवार के लोग अपने घरों एवं दुकानों, होटलों आदि में मोटी-मोटी लकडि़यों का इस्तेमाल जलावन के रूप में होता है।
पर्यावरण के मूल्य के हिसाब से अगर अनुमान लगाया जाय तो प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख रुपये की अवैध कटाई हो रही है। अब तो लोग जंगल में बचे खुटी को भी निकाल कर ले जा रहे हैं। वन प्रमंडल इस अवैध कटाई को रोकने में पूरी तरह असफल है। राजनीतिक दल या स्वयंसेवी संगठनांे द्वारा भी इस इलाके में पर्यावरण संरक्षण व जागरूकता हेतु कोई पहल नहीं की जा रही है।
हां, वन प्रमंडल द्वारा अपने बचाव हेतु यदा-कदा एक आध केश किया है। वह भी गरीब-गुरुबों का। बड़ा गिरोह को पकड़ा ही नहीं जाता है। खास दबंग, जाति विशेष लोगों को विभाग द्वारा छोड़ दिया जाता है। लिहाजा, आज इस क्षेत्र मेे फर्नीचर दुकानों की संख्या दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है।
वायु प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं अबरख नगरी के मजदूर
अबरख उद्योग के लिए कभी विश्व प्रसिद्ध रहा कोडरमा इन दिनों क्रेशर प्लांटों, पत्थर उत्खनन की बहुलता की वजह से एक तरफ जहां वायु प्रदूषण का शिकार हुआ है, वहीं दूसरी ओर क्रेशर प्लांटो, पत्थर खानों हेतु लीज पर ली गई वन विभाग की भूमि पर चल रहे अस्थाई खनन में कार्यरत मजदूर और आस-पास रहने वाले ग्रामीण इन दिनों वायु प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं। लिहाजा, यहां के लोग सूखी खांसी, श्वास रोग सहित दर्जनों किस्म के रोगों के शिकार हो रहे हैं।
नवलशाही, नवादा, फूलबरिया, पहाड़पुर, कटरियाटांड, नेरूपहाड़ी, डोमचांच, सलैडीह आदि दर्जनों गांवों के ग्रामीणों के लिए प्रतिदिन बढ़ता ध्ूालकण, गैस, बढ़ता शोर से रू-ब-रू होना पड़ता है. कुछ मजदूर तो कभी-कभी अपने मुंह, नाक पर कपड़ा तो बांधते हैं पर ज्यादातर मजदूर यंू ही दिन-रात काम करते रहते हैं और डस्ट फांकते रहते हैं। इसलिए ज्यादातर मजदूर कब हृदय रोग के शिकार हो जाते हैं उन्हें पता भी नहीं चलता है। इन दिनों इस इलाकों में बड़ी संख्या में डस्ट एलर्जी, इस्नोफेलिया, खांसी आदि रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई है।
क्रशर उद्योग के मालिक मजदूरों की सुख-सुविधाओं की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। सरकारी नियमों का अनुपालन तो तनिक भी होता ही नहीं है जिसके कारण वायु प्रदूषण तेजी से फैलता जा रहा है। जिसके ग्रामीण और आम नागरिक त्रस्त हैं। चूंकि जितने क्रशर मशीन उत्पादन एवं पत्थर तोड़ने की मशीन हैं वे सभी डोमचांच, पुरनाडीह, नवलशाही आदि गांव के सड़क के किनारे अवस्थित है। जहां वाहनों, ट्रक, डमफर, जीप, बस, कोच आदि चलते रहते हैं जिससे पूरा इलाका ध्ूाल धुसरित होता रहता है। ध्ूाल-धूसरित इतना धना होता है अचानक देखने से यही प्रतीत होता है कि बादल छाया हुआ है। लिहाजा, यात्रियों एवं आम नागरिकों को भारी फजीहत का सामना करना पड़ रहा है।
कुल मिलाकर कहें तो यह कि इस इलाके में क्रशर उद्योग में कारखाना अधिनियम, सुरक्षा अधिनियम, भविष्यनिधि संचय अधिनियम आदि का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन हो रहा है।
अबरख के साथ साथ डोमचांच (कोडरमा प्रखंड) की भी चमक समाप्त
अबरख उद्योग को लेकर कभी विश्व के मानचित्र पर रहने वाला डोमचांच (कोडरमा प्रखंड) का इलाका इन दिनों तीसरे दर्जें का इलाका बनकर रह गया है। अभी भी सबसे ज्यादा राजस्व चुकाने वाला यह क्षेत्र प्रखंड बनने को मोहताज है। देश के करोड़ों अरबों रुपये का विदेशी मुद्रा देने वाला यह इलाका आज खुद कंगाल हो गया है।
कहा जाता है कि 120 साल पहले यानी 1870 ई0 के आस-पास यहां अबरख उत्खनन कार्य प्रारंभ हुआ था। तब उस समय ‘उत्तम श्रेणी का अबरख’ और ‘उत्खनन’ में इसका विश्व में पहला स्थान था। डोमचांच, कोडरमा, नवादा, जमुई से लेकर गिरिडीह के गांवा, तिसरी इलाके तक माइका का स्रोत पाया गया था। तिसरी का माइका विश्व में तीसरा स्थान था। इसी तीसरे दर्जे का माइका इलाका के नाम पर इसका नाम ‘तीसरी’ हो गया। वही तिसरी जो इलाका झारखंड को पहला मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को दिया।
जब गिरिडीह और कोडरमा (झुमरी तिलैया) में शहरों का विकास नहीं हुआ था तब यहां की चमचमाती सड़कें, भव्य मकान और भीड़ भरी दुकानों की रौनक देखते बनती थी। दिन-रात विदेशी खरीददारों और माईका उद्यमियों की भीड़ से यहां चहल-पहल रहती थी। कोडरमा जिला में सबसे ज्यादा चमक-धमक कहीं था तो वह इलाका था - डोमचांच और गिरिडीह जिला में चंदौरी का इलाका। इन इलाकों में तब लोग बाग-बाग थे। पूरा का पूरा इलाकों अमन-चैन और समृद्धि का पर्याय था।
न केवल अबरख वरन प्रकृति ने इस क्षेत्र को बेशुमार कीमती पत्थर, धने जंगल और अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य से सजाया था। छोटे-बड़े पहाडि़यों के बीच बसे यहां के घने जंगल की सुंदरता देखते बनती थी। अबरख बंद होने के साथ ही लोगों ने तुरंत वन पदार्थों एवं कीमती पत्थरों के व्यवसाय में जुड़ गए। यह इस इलाके का रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार का स्कोप है। क्योंकि यह व्यवसाय आज तथाकथित नेताओं और माफियाओं के कब्जे में आ चुका है। कुछ खास वर्ग के लोगों के एकाधिकार में है। अब अबरख तरासने वाले कुशल हाथ आज बेजार हो गए हैं। अबरख उद्योग में आई मंदी ने इस इलाके की सूरत ही बिगड़ दी। अब इन दिनों सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार एवं बढ़ते अपराध के कारण इस इलाके की संस्कृति बदल गई है। माइका उद्योग से विस्थापित हाथ रोजगार की तलाश में बाहर पलायन कर गए। जो कुछ बचे हैं वे वन माफिया एवं पत्थर माफिया के संपर्क में आकर प्राकृतिक सौंदर्य एवं प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने पर तुले हुए हैं। लिहाजा, कभी जिन इलाकों में लोग सामूहिक रूप से जाने से डरते थे। अब वहां मैदानी भाग नजर आता है। कुल मिलाकर बरियारडीह से लेकर कोडरमा तक का पूरा का पूरा इलाका आज प्राकृतिक संसाधनों व विकास के मामले मेें लूट व बदहाली का पर्याय बन गया है।
स्वतंत्रता सेनानी नवल किशोर महथा (45 वर्ष) कहते हैं कि 1934 ई0 में सीएमआई; क्रिश्चियन माइका इंडस्ट्रीज लिमिटेड नामक कंपनी प्रसिद्ध कंपनियों में एक थे। 1946 तक इस कंपनी का संचालन आर. जी. अग्रवाल द्वारा किया गया। डोमचांच में संचालित इस फैक्ट्री में तब लगभग 40,000 मजदूर काम करते थे। तब मजदूरों की हाजिरी दो आना से लेकर 2 हजार रुपए तक था। ठेकेदार घर-घर जाकर माइका का छिल्ला पहुंचाते थे। महिलाएं घर का सारा काम काज करते हुए फुर्सत के समय सामूहिक रूप से कहीं बैठकर माइका का छिल्ला बारीकी से पतला-पतला करती थी। 25 पैसे प्रति किलो की दर से उन्हें भुगतान कर ‘फकनी’ ले जाते थे। यहां लगभग सभी घरों में इसका व्यवसाय होता था।
वे कहते है कि माइका उद्योग पूंजी आधरित नहीं था। शुद्ध वातावरण था और लोग ईमानदारीपूर्वक काम करते थे। लोग जल्दी बीमार नहीं पड़ते थे। यदि बीमार होते भी थे तो लोग सीमरकंद, कोरला, छाल का गाढ़ा आदि जड़ी-बूटी खा-पीकर अपनी बीमारी दूर कर लेते थे। तब इस इलाके में जंगलों व जड़ी-बूटियों की बहुतायत थी। अब बीमारी इतनी बढ़ने के कारणों में कहते हैं कि डीजल, पंच, गाड़ी, मोटर, क्रशर, प्रदूषण आदि बढ़ने के कारण नई-नई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं यंत्रों के विकास और जंगलों के विनाश के कारण ही वर्षा अनियमित हो गया है। कुंआ, तालाब, पोखर आदि समय से पहले सूख जाने लगा। जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। तब इतनी गर्मी नहीं थी और न ही पानी के लिए कहीं झगड़ा-झंझट होता था। अब तो तापमान इतना अधिक होने लगा कि 9-10 बजते-बजते लोग घरों में घुस आते हैं। तब डोमचांच का इलाका इतना घनी आबादी वाला भी न था। अकाल के दौरान माइका उद्योग ने यहां के लोगों को अकाल महसूस नहीं होने दिया। तब यहां साइकिल फैक्ट्री एवं कपड़ा फैक्ट्री भी था। बिजली विभाग सहित दर्जनों विभाग डोमचांच में था। जहां सैकड़ों मजदूर, कारीगर, इंजीनियर, सुपरवाइजर, मोटिया, ठेकेदार, हेल्पर, गार्ड अदि का कार्य करते थे। तब यहां की खेती प्राकृतिक तरीके से होता थी। रासायनिक खाद विदेशी बीज, कीटनाशक दवा आदि का प्रचार था ही नहीं। लोग महुआ, मकई, गोंदली, कोदो आदि भी उपजाते थे। भ्रष्टाचार, लूट, बेइमानी कम थी। झगड़ा-झंझट होने पर महतो, पंच के माध्यम से निपटाया जाता था तब कुछ इसी तरह की परंपरा थी.
1970-75 तक यहां की स्थिति बेहतर व सामान्य रही। धीरे-धीरे इस इलाके की स्थिति माइका उद्योग की बंदी के साथ ही बिगड़ता चला गया. वे कहते हैं कि 1985 तक किसी तरह डोमचांच के कालीमंडा के प्रांगण में रामलीला, ड्रामा, कीर्तन, भजन, नाटक आदि खेला गया। यह खेल सामाजिक समरता को बरकरार रखने के उद्देश्य से की जाती थी। कबड्डी और कैली बिच्छा जैसे पारंपरिक खेल अब लगभग समाप्त हो चुकी है। बैलगाड़ी जैसे पारंपरिक यातायात के साधन अब देखने को नहीं मिलता है। और तो और अभी भी 90 फीसदी लोग माइका के उपयोगिता के बारे में नहीं जानते हैं। जबकि यहां उस समय दर्जनों माइंस थे जैसे अगरहिया माइंस, बुढिया माइंस, फुटलहिया माइंस, जयंती माइंस, चरकी माइंस आदि। तब इस व्यापार के लिए कोइ्र्र विशेष पंूजी की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। अब यह पूंजी पर निर्भर हो गया है। जहां पंूजी है वहां शोषण जुल्म और मुनाफा है। आज भी यहां के लोग इस उद्योग को सभी उद्योगों से सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। लोग कहते हैं कि यह एक प्रकार का राजशाही उद्योग है। इस उद्योग से न कोई बेरोजगार रहता है और न आतंकित।
लेकिन, अबरख उद्योग बंद होने के साथ-साथ डोमचांच इलाके की अनुपम चमक, सौंदर्यता, एकता, सामूहिकता और प्रकृति की लोकप्रियता लगातार समाप्त होती जा रही है।
सरकारी मानकों का पालन नहीं
मनीप्लस के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं लोग
जिंदगी जीने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते हैं। कुछ लोग यहां ‘मनीप्लस’ के लिए तो कुछ लोग जिंदगी गुजारने के लिए तमाम सरकारी मानकों, नैतिकता के हदों को तोड़कर आगे बढ़ने को आतुर हैं।
कुछ लोग कम मेहनत पर ज्यादा मजदूरी पाते हैं तो ज्यादातर लोग ज्यादा मेहनत पर कम। ये दोनों स्थितियां कोडरमा मेें है। क्रेशर व अबरख उद्योग में लगे मजदूरों व मालिकों को देखने-जानने से यह स्पष्ट हो जाता है। क्रशर व अबरख उद्योग के व्यवसायी जहां अमीर से अमीरत्व की ओर बढ़ रहे हैं वहीं मेहनतकश मजदूर बेबस और लाचार हैं। मजदूरों का सिर्फ किसी तरह पेट पाला जा रहा है।
ग्राम वन प्रबंधन एवं संरक्षण समिति के अध्यक्ष सूरज कुमार उजाला कहते हैं कि व न एवं प्रदूषण विभाग के सारे कायदे कानून को ताक पर रखकर जहां क्रशर संचालक क्रशर संचालित कर रहे हैं वहीं कुछ लोग जंगल जमीन का भी अतिक्रमण कर रहा है। बढ़ते क्रशर से यह इलाका आज पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। इससे उड़ने वाले ध्ूालकण यहां बीमारी की सौगात बांट रही है। पत्थर माफिया और पहुंचवाले मनमौजी तरीके से वन एवं वनसंपदा को अपने जिम्मे में हथिया लिया है। सरकार मौन हैं। वे कहते हैं कि रेंजर आर. सी. सिंह वन विभाग के सबसे भ्रष्ट अपफसरों में एक हैं। वे एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि बढ़ते क्रशर से लोगों को सिर्फ हानि ही हानि है। हालांकि इस व्यवसाय में इन दिनों काफी नए लोग जुड़ रहे हैं। इन क्रेशरों में सरकारी नियमों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंधन हो रहा है। इनमें न तो मजदूरों के हितांे को ध्यान में रखा जाता है ओर न ही समय समय पर होने वाले मेडिकल चेकअप ही कराया जाता है. न सुरक्षा हेतु मास्क दिया जाता न ही लांग पफुटवेयर। मास्क नहीं दिये जाने के कारण वहां कार्यरत मजदूरों की सांसों के जरिये ध्ूालकण उनके शरीर में प्रवेश कर जाता है। हालांकि, इससे बचने का उपाय मजदूर स्वयं ढूंढ लेते हैं और अपने मुंह को काम करते वक्त पतले गमछे से बांध लेते हैं। ज्यादातर मजदूर अपनी स्वास्थ्य की चिंता नहीं करते हैं। जो होगा, देखा जाएगा, के सिद्धांत पर काम करते हैं। चंद रुपये बचाने के खातिर क्रशर संचालक नियमानुसार माह में एक बार भी चिकित्साकों से उपचार नहीं कराते हैं तथा उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। जब कभी कार्य करने के दौरान मजदूरों को पत्थर से चोट लग जाती है तो इससे संचालक अपनी दबंगता के कारण इस मामले को वहीं दबा देते हैं। मेहनतकश मजदूर अपनी बदहाली और विवशता के कारण चुप रहना ही उचित समझते हैं। वे कहते हैं कि उद्योग लगाने के साथ साथ सरकारी मानकों का भी प्रतिपालन होना चाहिए। लेकिन, यहां वे हर गतिविधि देखकर बड़ा अचरज और अफसोस होता है। यहां संगठन नाम की कोई चीज नहीं है। हम काफी दिनोें से प्रयासरत है। पर अकेले पड़ रहे है। सहयोग करने वाला कोई नहीं है जिन्हंे हम अपना समझते हैं, सहयोगी व शुभचिंतक मानते हैं, वही धेखाधड़ी करते हंै।
वे कहते हैं कि नेरू पहाड़ी के बगल में अम्बादाहा खदान है जो झारखंड का सबसे दूसरे बड़ा खदान है। इसकी गहराई करीब 300 फीट है। देखने से डर लगता है। इस खदान का मालिक देखते-देखते अरबपति हो गया और हम 1995 से जंगल बचाते-बचाते खाखपति। इस खदान का मालिक उमाशंकर पंडित, हेेमंतराम पान, प्रवीण सुखानी आदि स्कारपियों से चल रहा है और मैं एक सिपाही की नौकरी का मोहताज हूूं।
वे कहते हैं कि अम्बादाहा जैसे दर्जनों खदानों से प्रतिदिन यहां से लगभग सौ ट्रक गे्रेनाइट, पफलस्पर, क्वाटर्स, ब्यूस्टोन आदि चुराया जाता है। ऐसे पत्थरों से लदे ट्रकों को पहने वनकर्मियों द्वारा पकड़ा जाता था, अब उन्हें कोई मतलब वही नहीं रहा। क्योंकि हर मामले का आजकल मात्र एक एंटीबाइटिक दवा है-पैसा। पैसा कमाने के लिए लोग क्या क्या नहीं करते हैं और पैसा वाले क्या क्या नहीं करवाते हैं।
खतरे में हैं चंचाल पहाड़ी पर अस्तित्व
डोमचांच से महज किसी पूरब दक्षिण दिशा में चंचाल पहाड़ी और लगभग 6 किमी पूरब (गिरिडीह रोड) में बबनी (पंचमुखी मारुति) पहाड़ी है। दोनों पहाड़ी का अस्तित्व आज खतरे में है। 10 साल पहले तक यहां जंगली जानवरों का बसेरा था। पहाड़ के चारों ओर सघन वनों से आच्छादित था। मखमली दूब और कुश पूरे पहाड़ को घेरे रहती थी। यहां दुलर्भ किस्म की वन संपदा थी। इसके अलावे पहाड़ी एवं पहाड़ी के आसपास इमारती लकड़ी मिलती थी। आज सब उजड़ गया है। पहाडी का नंगापन और कटते पहाड़ देखकर अफसोस होना स्वाभाविक है। पहाड़ी अब पहाड़ी नहीं, मानो मिट्टी धसान खुला खदान की तरह दिखता है। पहाड़ी पर डमफरों का आना-जाना लगा रहता है। तेजी से दोनों पहाड़ी कट रहा है। लिहाजा, यहां की नैसर्गिक संुदरता सौंदर्यता खत्म हो चुकी है। अगले 5 वर्षों तक चंचाल पहाड़ी का अैर 10 वर्षोंतक बबनी पहाड़ी ;कटरियाटांडद्ध का अस्तित्व का पता चलना मुश्किल है। यहां काम करने वाले एक मजदूर (काराखूट निवासी) कहते हैं कि पहाड़ी रहेगा और आदमी भूखों मरेगा तब क्या पफायदा। पहाड़ी कट रहा है तो कम से कम 25 से 50 मजदूरोें का रोजगार तो मिल रहा है। उनके इस कथन में उनकी समझदारी का कम होना स्पष्ट झलकता है। हालांकि, पहाड़ी की विशेषता तथा प्राकृतिक सुुदरता-सौ्रदर्यता का ज्ञान यहां के लोगों व मजदूरों में नहीं है। यदि है भी तो पेट चलाने की विवशता है।
चंचाल पहाड़ी के लगभग खत्म होने के कारण डोमचांच, काराखूट, बिरजामू, डुमरडीहा, तैतरियाडीह, गैरीबाद, पारडीह आदि गांवों का जलस्तर नीचे जा रहा है। पहाड़ी का लगभग तीन भाग ऊंचाई समाप्त हो चकी है। पहाड़ी एवं पहाड़ी के आसपास लगभग 25-50 फीट तक गहराई कर पत्थर तोड़ने का काम प्रतिदिन चलता है। लोग कहते हैं कि 10 साल पहले तब यहां जड़ी-बूटी, महुआ, सखुआ एवं अनेक झाड़ीदार पेड़-पौधे मौजूद था। इसके अलावा बंदर, हनुमान, शाहिल आदि पशु-पक्षी पहाड़ी पर निवास करते थे। ब्लास्ंिटग एवं अक्सर डम्फरों की आवाजाही व मजदूरों की मौजूदगी के कारण उक्त दोनों पहाडि़यों के जीव-जंतु एवं पक्षियों का पलायन हो गया है। खेत बंजर होता जा रहा है। कहा जाता है कि चंचाल पहाड़ी की ऊंचाई लगभग 100 फीट था। अब इसकी ऊंचाई मात्रा 25 फीट रह गई है। इसकी सबसे ऊंची चोटी का नाम ‘कलहा’ था।
कुल मिलाकर दोनों पहाड़ी पिछले एक दशक से रो-रोकर अपना दर्द ब्यां कर रहा है। चूंकि, सदियों से पहाड़ी, जंगल, पानी हवा और रौशनी हमारे जीवन का आधार रहा है। पहाड़ी की समृद्धि जीवन की समृद्धि है। लेकिन, आज चंचाल पहाड़ी बबनी, पहाड़ी सहित कोडरमा के दर्जनों छोटी-बड़ी पहाडि़यां आज औद्योगिक दुनिया के चंगुल में आ चुका है।
बबनी पहाड़ी के ठीक ऊपर पंचमुखी बंजरंगबली का मंदिर है। पहाड़ी के आस-पास दर्जनों क्रशर और खदाने हैं। यहां के पत्थरों का उत्खनन वैधानिक तरीके से हो रहा है या अवैध, इस बारे में किसी को पता नहीं है। चाहे जो भी हो, पर पत्थर या पहाड़ी माफिया मालामाल हो रहे हैं। क्रशर उद्योग वैसे अवैध उत्खनन के पत्थरों पर ही आश्रित है। इस पहाड़ी पर हमला अभी इसलिए रुका हुआ है क्यांेकि पहाड़ी के ऊपर हनुमान मंदिर है। लेकिन, आने वाले एक दशक के अंदर मंदिर, पहाड़ी और आस-पास की बची-खुची नैसर्गिक सुंदरता और अन्य प्राकृतिक धरोहर आदि पूरी तरह ‘तरक्की’ और ‘विकास’ के भेंट चढ़ जाएंगे। ऐसा प्रतीत होता है।
चंचाल पहाड़ी से एक नाला निकली हुई है। जो आगे चलकर जेरूवादह में मिल जाता है। यह नाला भी लगातार सूखता जा रहा है।
पहाडि़यों के साथ लगातार क्रूरतम व्यवहार के खिलाफ जनता गोलबंद नहीं हो पाई है। फिलहाल, ‘छोटानागपुर पत्थर उद्योग संघ’ नामक संगठन बना हुआ है। इस उद्योग के खिलाफ किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप के खिलाफ उक्त संगठन कार्य कर रही है।
कुल मिलाकर वन विभाग की निष्क्रियता व लापरवाही के कारण पहाड़ी भू-भाग लगातार समतल भूमि में तब्दील होता जा रहा है।
क्रशर के साथ ही पनप रही है अवैध शराब की भट्ठियां भी
डोमचांच, पहाड़पुर, कटरियाटांड, मारुति चैक, नवलशाही, शिवसागर मोड, इंदरवा, लोकाई, महेशपुर, नावाडीह, फुलवरिया, रायडीह, खेसमी, नवादा इत्यादि इलाकों में स्थापित सैकड़ांे क्रशरों में लगभग 5 हजार मजदूर काम कर रहे हंै। जिसमें बच्चे व महिला भी शामिल हैं। इन क्रशरों मंे ज्यादातर मजदूर रजौली, नवादा, कौवाकोल, गया, गंझड़ी, गुरपा, मानपुर इत्यादि इलाकों में है जो स्थाई रूप से क्रशर के पास बने खोली में रहकर दिन-रात काम करते हैं।
एक क्रशर में लगभग 15 व्यक्ति काम करते हैं। जिसमें 10-12 व्यक्ति बाहरी होते हैं और 3-4 व्यक्ति लोकल। स्थानीय मजदूर ‘थर्ड ग्रेड’ का काम करते हैं। ‘थर्ड ग्रेड’ का मतलब गाड़ी में चिप्स लादने या उतारने का काम। जबकि बाहरी मजदूर क्रशर में पत्थर डालने, तोड़ने या पत्थर पीसने का काम करते हैं। यह काम पूर्णतः ठीका पद्धति से होता है. ठीका का फिलहाल रेट है 80 रुपया प्रति गाड़ी। यह काम अमूमन 3-4 मजदूर मिलकर प्रतिदिन 5-7 गाड़ी माल (पत्थर) तोड़ लेते हैं।
बाहरी मजदूरों द्वारा कार्य कराने के पीछे का मकसद यह है कि वे मन लगातर ज्यादा माल उत्पादन करते हैं। दिन-रात पूरे परिवार के साथ करते हैं तो जाहिर सी बात है कि उत्पादन ज्यादा तो होगा ही। इससे क्रशर संचालक को ज्यादा मुनाफा होता है।
किसी प्रकार की कोई घटना होने पर क्रशर संचालक बड़ी चलाकी से मामले को रफा-दफा करने में सफल होते हैं। स्थानीय स्तर पर मजदूरों का अभाव भी है, ऐसा कहा जाता है। पर हकीकत यह है कि घटना के भय से क्रशर संचालक बाहरी मजदूर से काम लेते हैं। बाहरी मजदूरों को रात्रि विश्राम हेतु संचालकों द्वारा खोली (घर) बना दिया गया है।
दारू, मांस, मछली और भात मजदूरों का प्रिय भोजन है। ज्यों-त्यों क्रशरों की संख्या बढ़ती गई त्यों-त्यों मादक द्रव्यों, के रूप में जहरीले पदार्थों का लत मजदूरों, युवाओ और बच्चों के बीच लोकप्रियता की बुलंदियां छूती गयी. क्रशरों के आस-पास दारू भट्ठी भी इन दिनों धड़ल्ले से खुल रहा है। जब यह भट्ठी नहीं था तब मजदूर कहीं से ढूंढकर पीते थे या उन्हें क्रशर मुंशी या संचालक स्वयं दारू उपलब्ध कराता था। अब जो भी दारू की दुकानें क्रशरों के आस-पास या चैक-चैराहें पर हैं वे सभी स्थानीय लोगों का ही है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक जिले में 1000 क्रशर और शराब की दुकानें 2000 से भी ज्यादा हैं। एक व्यक्ति अपने भट्ठी पर लगभग 200 से 250 लीटर दारू चलाता या रखता है। प्रत्येक दुकान से रोज की इतनी खपत भी है।
कहा जाता है कि खाटी करोड़पति से लेकर मजदूर ग्रेड तक के सभी व्यक्ति महुआ का दारू पीते हैं। अंग्रेजी शराब की दुकानों में जहां 8-9 बजे रात तक भीड़ रहती है वहीं महुआ शराब की दुकानों में सुबह से लेकर 2 बजे रात तक भीड़ जमी रहती है। यह नजारा यहां प्रतिदिन देखने को मिलता है। शराब की बढ़ती खपत के साथ-साथ अंडा, मांस, मंछली की खपत में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इन दिनों इसकी भी दुकान धड़ल्ले से हर चैक-चैराहे पर खुल रही है। लिहाजा, युवाओं में अपराध की प्रवृति बढ़ रही है। तमाम क्षेत्रों से सामाजिक विचारधारा मरती जा रही है।
क्रशर जहां पर्यावरण को असंतुलित बना रहा है, वहीं शराब सामाजिक परिवेश को बिगाड़ने का काम कर रहा है।
बिरहोर की बस्ती उजाड़ दी गई
डोमचांच से महज 3 किमी की दूरी पर नीरू पहाड़ी है। आज से 25 साल पहले इस पहाड़ी के चारों ओर बना जंगल था। बड़े-बड़े महुआ का गाछ हुआ करता था. इस जंगल की यही विशेषता थी। इस पहाड़ी के पास से ही डोमचांच से कोडरमा जाने वाली पक्की सड़क गई हुई है। 20 साल पहले यहां एक भी क्रशर नहीं था। तब यहां आदिम जनजाति (बिरहोर) का लगभग 15 परिवारों की एक बस्ती थी। सभी ‘ढोको’ में रहते थे और वनप्राणियों का शिकार कर अपना गुजारा किया करते थे। उनके रहने-जीने की अपनी अलग संस्कृति थी।
जिस तरह पूरे झारखंड के आदिवासियों एवं उनकी संस्कृति पर आज चैतरपफा हमला जारी है, ठीक उसी तरह यहां रहने वाले आदिम जनजातियों पर भी हमला हुआ। क्रशर की पफैक्ट्रियां यहां स्थापित हुईं। गाडि़यों की आवाजाही और क्रशर चिप्स ढ़ोने वाले डमपफर गाडि़यों की तेज आवाज, क्रशर डस्ट व प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव से उनके शांत स्वभाव और शांत माहौल पर प्रभाव पड़ने लगा। कहा जाता है कि डमफर चालक व क्रशर संचालक बिरहारों को इंसान नहीं समझा और न ही उनके रहने-जीने का ख्याल किया। ऐसे लोग उन्हें वनमानुष समझते थे। शायद इसलिए जब पूरे समूह शिकार करने निकले थे तब डंफर चालक उनके झोपडि़यों पर गाड़ी चढ़ा दी। ‘ढोको’ में तब दो बच्चे सो रहे थे जिनकी जान भी चली गई। कहा जाता है कि चालक ने जान-बूझकर बिरहोर पर गाड़ी चढ़ा दी।
मूलतः क्रशर संचालक को उनलोगों को वहां से हटाया था। अंततः बिरहोर पूरे समूह के साथ भागकर चीतपुर (इंदरवा पंचायत अंतर्गत) के जंगल में जा बसा। आज भी लगभग 20 परिवार वहां किसी तरह जी-खा रहे हैं। हालांकि शेष परिवार कहीं दूसरे जगह जाकर बस गए। चीतरपुर में फिलहाल 11 परिवार रह रहे हैं, शेष परिवार कहीं भाग गए हैं, फिर वे सभी कभी आ जाएंगे।
सरकार उनलोगों के लिए काॅलोनी और सौर उर्जा (लाइट) की व्यवस्था कर दिया है। हालांकि, इस जिले से बड़ी तेजी से यह जाति विलुप्त होती जा रही है।
ऐसे जाति के लोग पूरी तरह जंगल पर आश्रित हैं। रोटी की तलाश में वे दिनभर भटकते रहते हैं। प्रचंड गर्मी का मौसम हो या शरद भरी ठंड का मौसम। वे अपने पांवों को जंगल जाने से रोक नहीं पाते हैं। चूंकि उनके समक्ष भूखे पेट का सवाल है। सुबह पांच बजते ही अपने परंपरागत हथियार तीर-धनुष, कुल्हाड़ी लेकर वे जंगलों की ओर निकल जाते हैं। महिलाएं ढि़बरा चुनने जाती हैं तो पुरुष खरहा पकड़ने और बच्चे दातुन पत्ता तोड़ने जिसे वे बाजार में बेचकर अपना गुजारा करते हैं।
झुमरीतिलैया, कोडरमा एवं डोमचांच चैक-चैराहों पर विलुप्त हो रही आदिवासी बिरहोर जनजाति के बच्चे दातून बेचते अक्सर दर्शन हो जाता है।
चीतरपुर, झरनाकुुंड व लोकाई के बिरहोर बच्चे सुबह पांच बचते ही जंगलों में दातून को लेकर सुबह के 9-10 बजते ही उक्त चैक-चैराहे पर पहुंच जाते हैं। घूम-घूमकर दातून बेचना इनका रोक का काम हो गया है। दातून बेचने के बाद जो पैसे मिलते हैं, उसे वे अपने परिजनों को देते हैं, जिससे उनकी रोज की रोटी का जुगाड़ हो पाता है।
कई बार ऐसा होता है कि वे दिनभर जंगल में भटकने के बाद भी उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है। सरकारी की ओर ओर से बिरहोर जनजाति के लिए उपलब्ध संसाधन बिचैलियांें के भेंट चढ़ी जा रही है।
पत्थर खदान यानि मौत को आमंत्रण
झारखंड का सबसे दूसरा बड़ा खादन अम्बादाहा (कोडरमा) है। (झारख्ंाड का सबसे बड़ा पत्थर खदान -पाकुड़ है) इसके अलावे गोलको, नवादा, चंचाल, शिवसागर, फूटलहिया, पहाड़पुर, गोलवाढ़ाब, काराखूट, पंचमुखी, मारुति चैक, कटरियाटांड, धरगांव आदि दर्जनों खदान हैं। जहां से प्रतिदिन लगभग 5000 टन पत्थर की निकासी होती है।
एक खदान से एक शक्तिमान ट्रक एक दिन में 4-5 ड्रीप लगाता है। जबकि एक खदान से 5-6 शक्तिमान ट्रक निकलता है। एक ट्रीप में 8 टन पत्थर का कारोबार होता है। इस हिसाब से एक खदान से प्रतिदिन 200 टन पत्थर का कारोबार हो रहा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक एक शक्तिमान 8 टन पत्थर तोड़ने की मजदूरी एक ठेकेदार (पत्थर माफिया) 250 रु0 से 350 रु0 रुपये लेते हैं। ऐसे ठेकेदारों के पास कम से कम 2-3 मजदूर होते हैं, जो मिट्टी साफ करते हैं। एक खदान (माइंस) में ऐसे 2 से 10 ठेकेदार होते हैं और 30-40 मजदूर। ठेकेदार एक मुंशी नियुक्त करता है जो दिनभर का हिसाब-किताब रखता है। मुंशी का मजदूरी दर 65 से 70 रुपये निर्धारित है।
खदानों से पत्थर तोड़ने व निकालने तथा क्रशरों तक पहुंचाने का कार्य बड़ा जोखिम भरा है। यहां की जमीन में परत-दर-परत काले पत्थरों का जखीरा है। जिसे सी. बी. या पोपलोन से मिट्टी हटाया जाता है। फिर कम्प्रेशर मशीन द्वारा पत्थरों को छेद किया जाता है। इस छेद में डायनामाइट सक्सप्लोसिट बारूद डालकर ब्लास्ट किया जाता है। जिससे पत्थर टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। इसे ट्रक में लादकर क्रशरों तक पहुुंचाया जाता है। एक कम्प्रेशर के पीछे 5 से 7 व्यक्ति होते हैं।
कुल मिलाकर यह काम बड़ा ही जोखिम भरा होता है। अर्थात, पत्थर माइंस चाहे जिस रूप में हो, सीधे मौत को आमंत्रण देती है। आए दिन माइंस में कई किस्म की घटनाएं होती रहती हैं। परंतु घटना होने पर हल्ला होने के पूर्व ही खदान संचालक मामले को सलटा लेते हैं। कहा जाता है कि क्रशर और खदानों में काम करने वालों की जिंदगी अक्सर मौत से खेलती रहती है। कभी कभी कई कारणों से जिंदगी हार जाती है। इन करणों में ब्लास्टिंग, गाड़ी का स्ट्रिंग फेल हो जाना, गाड़ी का ब्रेक फेल हो जाना, क्रशर फट जाना आदि शामिल है। अभी हाल ही में यानी 3 दिसंबर 2005 को नवलशाही क्षेत्र के अंतर्गत एक पत्थर खदान में शाम करीब 4 बजे एक शक्तिमान ट्रक अनियंत्रित होकर खदान में घुस गया जिसमें कपिल तुरिया नामक एक व्यक्ति बुरी तरह जख्मी हो गया। उसकी मौत कब और कैसे हुई इसका अता-पता किसी को लगने नहीं दिया गया। दुर्घटना की जानकारी सिर्फं इसलिए हो पाई कि कपिल तुरिया को पार्वती नर्सिंग होम में दाखिल कराया गया था। बहुत बार ऐसा होता है कि हल्ला हो जाने के भय से घायल व्यक्ति को भी मार कर फेंक दिया जाता है। ऐसी लाश को लावारिश लाश बताकर मामले को दबा दिया जाता है। अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में एक लावारिश लाश डोमचांच के एक खदान के करीब पाया गया। कुछ लोगों ने इस लाश को खदान में हुई दुर्घटना से मौत बताया। हालांकि, पोस्टमार्टम के बाद मामला दब गया।
ऐसे मामले अक्सर दब ही जाते हैं या दबा दिए जाते हैं। बाहरी मजदूर होने के कारण मामले को दबाने में संचालकों को काफी सुविधा होती है। अन्य सहकर्मियों को कुछ रुपये देकर चुप करा दिए जाते हैं। परिवार वालों को इस बात की जानकारी ही नहीं होती कि वे कहां या किस फैक्ट्री या खदान में काम कर रहे थे। हाजिरी मेन्टेन आदि कुछ होता ही नहीं है।
क्रशर में लगा पूंजी घाटे का सौदा नहीं
कोडरमा का डोमचांच और नवलशाही का पूरा का पूरा इलाका प्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफी धनी है। पर यहां के लोग आज भी गरीब हैं। गरीबी के प्रमुख कारणों में यह है कि संसाधनों पर कब्जा गरीबों या ग्रामीणों का नहीं बल्कि किसी खास वर्ग के पास है। ये खास वर्ग हैं-राजनेता, ठेकेदार, पत्थर माफिया और अपराधी। ऐसे लोगों के पास 2 से 5 खदान और क्रेशर हैं।
डोमचांच निवासी वरिष्ठ समाजसेवी देवेंद्र मेहता और कृषक राम किसुन संुडी कहते हैं कि यहां के सभी पैसे वाले और धनी होना चाह रहे हैं, पर पैसे वालों की मंशा व कामना जल्दी पूरी हो जाती है। चूंकि वे पंूजी लगाने में समर्थ होते हैं में ही विश्वास करते हैं। वास्तव में, इस बिजनेस में अच्छा खासा मुनाफा है। अब तो ‘चलो एक क्रेशर ही लगा लेते हैं। सिद्धांत को कुछ लोग पाटर्नरशीप के जरिये सिद्ध करने में जुटे हैं। आपसी द्वेष और प्रतिस्पद्र्धा के सवाल को लेकर भी यहां क्रेशर ही लगा लेते हैं. यहां क्रेशर के क्षेत्र में पैसा (पूंजी) फंसाना कहीं से भी क्षति, हानि या जोखिम का सौदा नहीं समझते हैं। चंूकि, यहां खदान और पत्थर सर्वसुलभ है। लोग कहते भी हैं कि सारा पैसा क्रेशर में ही है। इसी सोच, मंशा और भावना ने क्रशर लगाने को बाध्य करता है। वैसे, पत्थर चिप्स की बढ़ती मांग, बाजार और यातायात के साधन यहां सर्वसुलभ है।
मजदूर भी सस्ते दर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में कोई पैसे वाले क्यों नहीं क्रशर में पूंजी फंसाना (भिड़ाना) चाहेंगे।
तकनीकी विकास के कारण हो रहा भूख से मौत और पलायन
औद्योगिक और तकनीकी विकास ने इंसान को पंगु बना दिया है। कोडरमा के क्रशर फैक्ट्रियों पर भी इसका व्यापक असर पड़ा है। परिणामस्वरूप भूख, बीमारी, बेरोजगारी, पलायन, लूट, अपहरण आदि में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए क्योंकि 8-10 साल पहले एक क्रशर में जहां 25 से 40 व्यक्ति काम करते थे, वहीं तकनीकी विकास ने ऐसी मशीन तैयार किया कि अब 5 से 15 मजदूर ही पर्याप्त होता है। इस तरह 20 से 25 मजदूर बेकार हो गए। नए डिजायन के क्रेशर में मजदूर काम पर उत्पादन ज्यादा होता है। इस कारण बेकार हुए मजदूर पलायन कर गए तो कुछ अपराध का सहारा लिया।
क्रेशर की बढ़ती संख्या से जहां आम आदमी व यात्री त्रस्त हैं, वहीं मजदूरों और किसानों के लिए भी एक गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। बिडंबना इस बात की है कि इस मामले को लेकर न कभी कोई आंदोलन हुआ न ही मजदूर-किसान गोलबंद हुए हैं। सबसे बड़ी बिडंबना इस बात की भी है कि इस मामले को लेकर चर्चा तक भी नहीं करना चाहते हैं। लोगो में काफी भय समाया हुआ है। भू-स्वामियों, पत्थर माफियाओं, उद्योगपतियों और राजनेताओं का दबदबा सर्वत्र कायम है। या यूं कहें कि सामंती व्यवस्था कायम है। इसलिए यह इलाका अपराधियों व कुछ मु्ट्ठी भर दबंगों का चारागाह बना हुआ है। जबकि, डोमचांच स्वतंत्रता संग्राम (सेनानियों) की भूमि रही है।
सन 1947 के पहले यहां शोषण-जुल्म के खिलाफ व्यापक संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में 5 व्यक्ति शहीद भी हुए थे। डोमचांच का शहीद चैक आज भी उस संघर्ष की याद को ताजा कर देता है। लेकिन आश्चर्य इस बात की है कि आज इसी संधर्ष की धरती पर शोषण, जुल्म, लूट, अपहरण, अत्याचार, सूदखोरी, शराब, भूख, कुपोषण, पलायन इत्यादि जैसे संकट छाए हुए हैं। इसके खिलाफ कहीं से कोई ‘बू’ नहीं आ रही है। शहीदों व स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की खून मानो पानी हो गया हो। क्रशरों व खदानों में कार्यरत मजदूर संगठित नहीं रहने के कारण भी ये शोषण के शिकार हो रहे हैं। अशिक्षित मजदूर इसका विरोध भी नहीं कर पाते हैं। एक तो, ऐसे मजदूरों को कानून की जानकारी नहीं रहती है। यदि रहती भी है तो पेट भरने की विवशता भी रहती है। उधर क्रशर व खदान मालिक ‘बाबू साहेबों’ के पक्के मकानों से ‘पीं. पीं. के आवाज के साथ कारें निकलती हैं। उनके सजीले, चमकदार कपड़े और बढि़या खान-पान इत्यादि सभी जीने के नए अंदाज में होते हैं। वहीं दूसरी तरफ उनको ‘नए अंदाज’ देने वाले मेहनतकश मजदूर जिसमें ज्यादातर हरिजन, आदिवासी होते हैं, वहीं पुराने चिथड़ों में लिपटे रहते हैं और जर्जर मकान ही उनके नसीब होता है।
इन कामों में पांच वर्ष के बच्चों से लेकर परिवार के सभी सदस्य लगे रहते हैं। इन्हें आज तक न सरकारी सुविधा मिली है न ही जनप्रतिनिध्यिों का सहयोग। सभी दलित, आदिवासी मजदूर अपनी दुर्दशा का रोना रोते हैं और अपनी दुर्दशा खत्म होने का दुआ भी मांगते हैं। मगर, उनकी आस उन्हें पूरा होने नजर नहीं आता है। कुल मिलाकर संगठन के अभाव में सभी मजदूर-अपमान, अन्याय, शोषण व जुल्म के साथ जीने को बाध्य हैं।
नीति, नियम और सिद्धांत को ताक पर रखकर संचालित हो रही है क्रेशर व पत्थर माइंस
सभी क्रशर मजदूर 10 से 14 घंटे तक काम करते हैं, तब जाकर उनकी प्रतिदिन की हाजिरी 40 से 80 रुपये तक बन पाती हैं। चूंकि, काम ठेका पद्धति पर आधारित है जो कि नियम के विरुद्ध है। दूसरी बात यह कि मजदूरों को प्रतिदिन 100 ग्राम गुड़, चूड़ा, चना, साबुन, सर्फ, तेल आदि देने का प्रावधान हैं साथ ही, गांव से लगभग 2 किमी0 दूर पर लगभग एक एकड़ जमीन पर एक क्रेशर लगाना चाहिए। बाउंड्री बाल, दीवाल के अंदर-बाहर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण आदि शर्त पूरा करने का प्रावधान है। पर, वास्तव में यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। लोगों में सिर्फ किसी तरह से भी पैसा कमाने और इस होड़ में सबसे आगे निकलने का भूत सवार है। पर्यावरण सुरक्षा का ख्याल आज किसी को नहीं है चाहे वह वेतनभोगी हो या राजनेता। ब्लास्टिंग नहीं करना, मजदूरों को उचित मजदूरी और सुविधा देना, हिसाब-किताब रखना, दवा रखना, फुहारयुक्त पानी देना, परमिट व चलान निर्गत करना, राजस्व चुकाना आदि प्रावधनों की यहां खुलकर धज्जियां उड़ रही है। राजस्व की चोरी के साथ-साथ बड़े पैमाने पर बिजली कर की भी चोरी हो रही है।
बेशकीमती पारदर्शी (नीला) पत्थर का अकूत भंडार है कोडरमा
कोडरमा सदर प्रखंड के लोकाई और इंदरवा क्षेत्र में बेशकीमती व पारदर्शी पत्थरों का अकूत भंडार पाया गया है। या यूं कहें कि अबरख की चमक भले ही कोडरमा से गायब हो गया है परंतु कोडरमा की रत्नगर्भा धरती में छिपी ‘हीरे’ से पूरा झारखंड क्या पूरा विश्व चमक उठेगा। पर, हां ऐसा तब होगा जब इस प्राकृतिक संसाधन पर पूरा का पूरा हक व अधिकार ग्राम सभा को होगा।
इस रत्नगर्भा धरती में छिपी ऐसे बेशकीमती पत्थरों में ब्लू स्टोन, टरमुलीन, टोपाज समेत कई अन्य पत्थर शामिल हैं जिसका उपयोग फैंसी जेवरात, अंगूठी, हार, मुर्तियों और अन्य सजावटी वस्तुओं के निर्माण में ज्यादा किया जाता है।
जिला मुख्यालय से महज 5 किमी0 की दूरी पर स्थित लोकाई, इंदरवा, नावाडीह के विशाल भूमि पर इन पत्थरों का जखीरा है। जहां प्रतिदिन सैकड़ों मजदूर (लगभग 200) चोरी-छिपे इन पत्थरों को निकालकर पत्थर माफियाओं के हवाले कर पेट पाल रहे हैं। बताया जाता है कि जयपुर में रत्न भंडार के क्षेत्र में इसकी काफी मांग है। विदेशों में खासकर जापान में ऐसे पत्थरों से बनी वस्तुओं के प्रयोग का प्रचलन काफी है। इससे बनी सजावटी हार वहां की महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय है। इसके अलावे इन पत्थरों की मांग दिल्ली, अहमदाबाद, मुंबई इत्यादि स्थानों में भी है। ब्लू स्टोन अनवरत ब्लू रंग की किरणें बिखेरती रहती है। पत्थर माफिया मजदूरों से ऐसे पत्थर खरीदकर उक्त बड़े शहरों को भेजते हैं। बड़े शहर के व्यापारी इन पत्थरों को कुशल कारीगरों द्वारा तराशते हैं। जापान मेें भी ऐसे पत्थरों की खूब खपत है।
कहा जाता है कि इस खदान का उपयोग सरकार विधिवत करे तो न सिर्फ यहां के बेरोजगारों के लिए रोजगार के नए अवसर खुलंेंगे, बल्कि राज्य सरकार को बड़ी मात्रा में राजस्व भी मिलेगा। वहीं ज्यादातर लोग बिना लाग-लपेट के कहते हैं कि सरकार चोर है। ऐसा चोर जो अपने ही घर में चोरी करती है और करवाती है। यदि इन पत्थरों का वैधानिक लीज का आबंटन कर उत्खनन कार्य प्रारंभ कराया गया तो राजस्व की चोरी के साथ साथ कमाने-खाने वाले सैकड़ों मजदूर बेमौत मरने लगेंगे। ज्यादातर राजस्व की चोरी ठीक उसी तरह होने लगेगा जैसे आप खदान व क्रेशर में होता है।
हालांकि, आज पत्थर माफिया को फायदा हो रहा है। लीज होने और न होने से भी मजदूरों की स्थिति मेें कोई विशेष बदलाव नहीं होने वाला है। कुल मिलाकर यह खदान भी आज आर्थिक सामंतीकरण का एक हिस्सा बनकर रह गया है। इस ‘हीरे’ की खदान में प्रतिवर्ष 2-4 जानें जाती है, परंतु घटना-दुर्घटना होने पर मामले को उजागर होने नहीं दिया जाता है। हां, सभी मजदूर और ठेकेदार मिलकर पीडि़त परिवार वालों को कुछ मदद सहानुभूमिपूर्वक जरूर कर दिया जाता है। जो भी हो हीरे पर कब्जा यदि ग्राम सभा की होती है तो पूरा झारखंड क्या विश्व चमक उठेगा।
हाल बेहाल है पत्थर तोड़ने वाले मेहनतकशों का
इंदरवा पंचायत के सलैडीह, इंदरवा, नावाडीह गेंदवाडीह आदि गांवों में लगभग 1500 मजदूर हैं, जो क्रशर फैक्ट्री में कुछ पत्थर खदान में तो कुछ ब्लू स्टोन खदान में काम करते हैं। सभी मजदूर दिनभर कमरतोड़ मेहनत करते हैं। बावजूद इन मजदूरों को ठीक से दो जून की रोटी नसीब नहीं हो पाती है। जबकि इन कामों मे उनके परिवार के 5 साल से लेकर परिवार के सभी सदस्य लगे रहते हैं। इन मजदूरों को सरकार द्वारा चलाए जा रहे कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी नहीं है। इस पेशे में लगे सभी परिवार के सभी सदस्य मिलकर दिन-रात मेहनत करने पर बड़ी मुश्किल से 50 हजार रुपये से 150 रुपये तक कमा पाते है। इन गांवों के अधिकांश बच्चे अपने माता-पिता के कामों मे हाथ बंटाते हैं। एक छात्रा सुरंेद्र कुमार (14 वर्ष) को पूछने पर कहते हैं कि घर की हालत ठीक रहे तो पढ़ने में भी मन लगता है। इसलिए विद्यालय छोड़कर अपने माता-पिता का हाथ बंटाते हैं। सलैयडीह गांव के हरिजन टोलावासी कहते हैं कि ‘बच्चों को पढ़ाने का शौक किसे नहीं रहता है, परंतु पेट चले तब तो।
गेंदवाडीह में ज्यादातर घटवार जाति के लोग हैं। गांव वाले कहते हैं कि गांव में आज तक कोई सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या विधायक नहीं आए हैं। पक्की सड़क से गांव तक कच्ची सड़क जरूर है लेकिन जगह-जगह गढ्ढे बन गए हैं। बरसात के मौसम में इन पर चलना दुभर हो जाता है। यहां गरीबी रेखा के नीचे काफी संख्या में लोग हैं, पर हरा-लाल कार्ड कुछ ही लोगों को दिया गया है। गांव के सामने नेरू पहाड़ी है, जो नैसर्गिक सुंदरता में चार चांद लगाता है। यहां जिले के कमांडो प्रत्येक वर्ष फायरिंग करने (सीखने) आते हैं। पहाड़ी के चारों ओर क्रशर फैक्ट्रियां हैं। उक्त गांवों के गर्भ में कई बहूमूल्य खनिज संपदा है। इसका फायदा पत्थर माफिया और ठेकेदार उठा रहे हैं। यहां तीन भाग पर क्रशर और एक भाग जमीन पर खेती-बारी होती है। लेकिन, सिंचाई सुविधाओं का घोर अभाव है। क्रेशरों के डस्ट एवं जंगल उजड़ने के कारण पास का हरहरो नाला (नदी) भी इन दिनों सूख गया है और लगभग भरता जा रहा है।
पत्थर खनिज की प्रचुरता के बावजूद इंदरवा, नावाडीह, गेंदवाडीह, सैलडीह आदि गांव के लोग आज गरीब हैं। लोगों की स्थिति काफी दयनीय है। लगभग सभी गांवों में गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, भूख, लूट और शोषण की काली छाया व्याप्त है। जंगल तो उजड़ ही गया अब बचा-खुचा पारंपरिक जीविकाओं के आधार भी खत्म होता जा रहा है। खेती-बारी, कुटीर उद्योग आदि खत्म हो जाने के कारण लोग अब केवल नौकरी या देहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हो गया है। इस क्षेत्र में बाहर सेे मजदूर आकर खटते हैं और इस क्षेत्र के मजदूर बाहर जाकर। कुल मिलाकर असंगिठत मजदूर पत्थर माफियाओं और क्रशर संचालक को फायदा पहुंचा रहे हैं। या यूं कहें कि आज के इस दौर में असंगठित मजदूर ही आर्थिक विकास के नायक बने हुए हैं पर उनकी हालत आज बेहद खराब है। नवपूंजीवाद जैसे-तैसे अपनी पंाव बढ़ा रही हैं वैसे वैसे असंगठित मजदूरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं, क्रेशर और नवपूंजीवाद ने पशुपालन जैसी अद्भुत परंपरा भी गांव से गायब कर दिया, जबकि यह जीविका का प्रमुख साधनों में से एक था। लोग कहते हैं कि क्रशर की वजह से खदान खुला। खदान से पैमाने पर जंगल उजड़ा। जिससे पानी का स्तर नीचे चला गया। चारागाह, जंगल और बंजर भूमि जहां अक्सर पशु चरते थे, वह भी नहीं रहे। खदानों में ब्लास्टिंग होते रहने से भी वातावरण में गड़बडि़यां पैदा हो गई है। प्रदूषण (डस्ट) के कारण बचा-खुचा पेड़-पौधे फल देना बंद कर दिया है। जमीन से उपज कम हुआ ही है। जंगल से जो मुफ्त में खाद्य सामग्री (खोखड़ी आदि) मिलता था, वह भी अब नहीं मिलता है। जंगल से जानवर और पक्षी बिल्कुल भाग गए हैं। समय पर बारिश नहीं होना, जलावन की लकड़ी का न मिलना, घर बनाने के लिए लकड़ी का अभाव, बेर-पियार, जड़ी-बूटी के लिए तरसना इत्यादि सभी बढ़ते क्रशर और नवपूंजीवाद के परिणामों में से हैं।
एक तरफ वहां लोग टी0वी0, कम्यूटर, जहाज टेªन आदि अत्याधुनिक खोज का आनंद उठा रहे हैं वहीं इस गांव के लोग अपना वो समान ढूंढ रहे हैं जिसमें लोगों का रहन-सहन, खान-पान, बातचीत, पहनावा-ओढ़ावा, पर्व-त्योहार इत्यादि बड़े कायदे से होता था। बड़े-बजुर्ग, बूढ़े-बुढ्ढी अपना महत्व, पूछ ढूंढ रहे हैं। बढ़ते हिंसा, शराब और मनमर्जी की वजह से सभी सामाजिक मर्यादाएं, सिद्धांत और लोकनीति समाप्त हो चुकी है। सभी अपनी मर्जी के मालिक बने हुए हैं। युवा पीढ़ी 50-60 साल के अनुभवी व्यक्तियों को महत्व नहीं देते हैं। यह यहां की त्रासदी है। नशों में 24 घंटे सारोबोर रहते हैं। कुछ कहो तो, डंडे सर पर चाहे मां-बाप हो या पत्नी।
कुल मिलाकर गेंदवाडीह, सलैयडीह, इंदरवा की तरह कमोबेश सभी गांवों में टूटन का माहौल है। मजदूरों व किसानों की हितों की हिफाजत करने वाले मसीहा की तलाश आज हर गांवों में है। लोगों ने विज्ञान और पूंजीवाद की आड़ में गांव खोया, अपनी संस्कृति की शहादत दी, अपनी स्वतंत्रता, आजीविका के स्रोत आदि से वंचित हुए। मगर लाभ के नाम पर इन्हें कुछ नहीं मिला।
क्रशर व पत्थर माइंस पनपने के साथ-साथ पनपी अनेकानेक समस्याएं
1 क्रशर में काम कर रहे या आस-पास रहने वाले लोगांे की उम्र का 10 से 25 साल का घट जाना।
2 खदान मे होने वाले ब्लास्टिंग से घरों व सड़कों मेें दरारें व घरों का हिलना।
3 ध्वनि प्रदूषण
4 डस्ट का अंधाधुंध फैलाव
5 पानी का स्तर का नीचे जाना
6 हृदय व फेफड़ा संबंधी गंभीर बीमारी
7 घटना-दुघर्टना होने पर मजदूरों को क्षतिपूर्ति या उचित मुवाअजा का न मिलना।
8 जंगलों का सफाया व अवैद्य कटाई।
9 नदी-नाला का प्रदूषित होना व सूखना।
10 जमीन का बंजरीकरण
11 फसलों की बर्बादी या उपज में कमी।
12 पारंपरिक संस्कृति व सामाजिक समरसता का खात्मा
13 कृषि व्यवस्था का खात्मा
14 भ्रष्टाचार
15 शराब का प्रचलन में बढ़ोत्तरी
16 वेश्यावृत्ति
17 बिचैलियों व माफियाओं की भरमार
18 प्रदूषण
19 पहाड़ का टूटना व हत्या मेें वृद्धि
20 सुखाड़ व अकाल का आगमन
21 तकनीकी विकास से मजदूरों की छटनी व पलायन
22 आजीविका के स्रोतों का ह्रास
23 इज्जत व सृजनशीलता का विनाश
24 शोषण का नया स्वरूप पनपना
25 महाजनी-सूदखोरी में वृद्धि
26 खदान में जमे पानी की बर्बादी (खदान की गहराई 200 से 500 फीट तक)
27 महिला मजदूरों को कम मजदूरी देना
28 कर्मचारी, मुंशी, मालिक, मजदूर (सहकर्मियों) द्वारा महिलाओं का मानसिक व दैहिक शोषण।
1 नवलशाही
2 खरखार
3 पुरनाडीह
4 फुलवारिया
5 महेशपुर
6 इंदरवा
7 मरकच्चो
8 चमारो
9 काराखूट
10 नावाडीह
11 गुहदरिया
12 बेलाबहुदर (बरियारडीह)
13 नेरोपहाड़ी
14 पहाड़पुर
15 नवादा
16 पंचगांवां मोड़
17 डुमरगढ़हा
18 बरियारडीह
19 कटरियाटांड
20 बहादुरपुर
21 पुरनानगर
22 मंझलोखोट
23 चंचाल
पिछले पांच सालों में क्रषरों एवं खदानांे से हुए मौतों व बिमारियों विवरण
पांच गांवों का सैम्पल सर्वे
वर्ष 2000 से 2005 तक
क्र गांव मौतों की संख्या अक्टूबर 05 में गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों की संख्या रोग के नाम
1 चीतरपुर
15 12 आंख, नाक और कान संबंधी बीमारी, आंख से पानी आना, स्वास लेने में परेषानी, खांसी, टीबी, सिलोकोसिस, खुजली, चर्म रोग, मलेरिया, एनिमिया आदि
2 गेंदवाडीह 09 05 आंख, नाक और कान संबंधी बीमारी, आंख से पानी आना, स्वास लेने में परेषानी, खांसी, टीबी, सिलोकोसिस, खुजली, चर्म रोग, मलेरिया, एनिमिया आदि
3 सलैयडीह 12 14 आंख, नाक और कान संबंधी बीमारी, आंख से पानी आना, स्वास लेने में परेषानी, खांसी, टीबी, सिलोकोसिस, खुजली, चर्म रोग, मलेरिया, एनिमिया आदि
4. नावाडीह पहरी 11 13 आंख, नाक और कान संबंधी बीमारी, आंख से पानी आना, स्वास लेने में परेषानी, खांसी, टीबी, सिलोकोसिस, खुजली, चर्म रोग, मलेरिया, एनिमिया आदि
5. इंदरवा 10 10 आंख, नाक और कान संबंधी बीमारी, आंख से पानी आना, स्वास लेने में परेषानी, खांसी, टीबी, सिलोकोसिस, खुजली, चर्म रोग, मलेरिया, एनिमिया आदि
कुछ प्रमुख खदान स्थल
क्र. खदान व क्रषर स्थल का नाम
1. अम्बादाहा
2. शिवसागर
3. गोलको
4. नवादा
5. चमारो
6. गुहदरिया
7. शिवसागर कैम्प
8. ढ़ेबुआडीह
9. इंदरवा
10. चंचाल
11. नावाडीह
12. बहादुरपुर
13. जोगनीपहरी
14. सिजुआ
15. गैठीबाद
16. पुतोढ़ाब
17. दाबसिंह
18. बरियारडीह
19. मंझलोखोट
20. कटरियाटांड
21. पुरनानगर
22. बहादुरपुर
23. लोकाई
24. इंदरवा
खनन विभाग, कोडरमा से प्राप्त जानकारी
क्र. विवरण संख्या
1. कुल क्रशरों की संख्या 245
2. कार्यरत मजदूरों की संख्या अनुपलब्ध
3. कुल खदानों की संख्या 165
4. रजिस्टर्ड ठेकेदारों की संख्या 165
5. घटना-दुघर्टना संबंधी जानकारी अनुपलब्ध
खनन विभाग की उपलब्धि
वर्ष लक्ष्य (लाख में) समाहरण (लाख मे)
2004 140.27 137.04
कोडरमा की वास्तविक वस्तुस्थिति (वर्ष 2005)
(अध्ययन के मुताबिक)
क्र. विवरण संख्या (लगभगं)
1. कुल क्रशरों की संख्या 1300
2. कार्यरत मजदूरों की संख्या 20,000
3. कुल खदानों की संख्या 400
4. ठेकेदारों की संख्या 3000
5. घटना-दुघर्टना संबंधी जानकारी प्रतिमाह 10
इन्द्रमणि
(स्वतं़त्र पत्रकार सह सामाजिक कार्यकर्ता)
समर्पण,
सुन्दरनगर, कोडरमा
9934148413

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