लॉकडाउन की वजह से क्षेत्र में खासकर माईका-माइंस व कोल माइंस क्षेत्र
के गांवों में इन दिनों बड़ी त्रासदी जैसी परिस्थिति उत्पन्न हो गयी हैं. लोगों के
पास खाने-पीने के लिए संसाधनों का घोर अभाव हो गया है. राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय
बाल अधिकार विशेषज्ञों ने बच्चों की
तस्करी की घटनाओं में कथित रूप से इजाफा होने, मौजूदा दौर में आर्थिक परेशानियों
को झलने में अक्षम परिवार बच्चों को फिर गर्त में धकेल देने, बच्चों की तस्करी
करने वाले सक्रीय होने के के संकेत दिए हैं. और यह संकेत अब कोडरमा और
गिरिडीह में सच होता दिख रहा है. कोडरमा एवं गिरिडीह के विभिन्न गांवों में आज बाल
तस्कर घूम रहे हैं. पहले यह धंधा रांची, खूंटी, सिमडेगा, गुमला, लोहरदग्गा आदि
जिलों में खूब था और अब गैर आदिवासी जिलों में भी दलाल गरीबों को लालज दे रहे हैं,
सब्जबाग दिखा रहे हैं. गरीब उनके झांसे में आकर अपनी बेटियों को महानगरों में
भेजने को मजबूर हो रहे हैं. मरता क्या नहीं करता, न चाहते हुए थोड़ी सी रकम और पेट
की आग के लिए मजबूरन यह सब करना पड़ता है. अभी हाल ही में कोडरमा रेलवे स्टेशन से
एक बाल तस्कर के द्वारा 4 नाबालिक बच्चियों को दिल्ली ले जाये जा रहे थे,
तभी चाइल्डलाइन की टीम ने जीआरपी एवं आरपीएफ के सहयोग से सभी चार बच्चियों को
रेस्क्यू करने में सफल रही. ये सभी बच्चियां गिरिडीह जिले के माइका-माइंस क्षेत्र
अर्थात तिसरी थाना क्षेत्र के गांवों के हैं और सभी का उम्र 14 से 17 वर्ष तक के बीच
है। पहले भी इस स्टेशन पर कोडरमा, नवादा, गिरिडीह, चतरा, हजारीबाग आदि जिलों के बाल
श्रमिकों को रेस्क्यू किया गया है. या यूँ कहें कि यह स्टेशन बाल तस्करों व बाल
श्रमिकों के लिए हब बन गया है.
वैसे, झारखण्ड पहले से बाल
तस्करी के मामले में बदनाम रही है. यहाँ की बेटियां दिल्ली सहित अन्य महानगरों में
बाल तस्करों के द्वारा ले जाया जाता रहा है. हालाँकि, इसकी रोकथाम एवं उचित
कार्यवाही के लिए स्थानीय सिविल सोसाइटी के लोगों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है,
फिर भी यह धंधा यहाँ खूब फलफूल रहा है.
कोविड-19 के इस महामारी के दौर में परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है. यह
महामारी सिर्फ स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा संकट नहीं है बल्कि यह बच्चों
के भविष्य का भी संकट है. बाल तस्करी का मामला हो या फिर बाल श्रम, इसके लिए यहाँ कानून
तो है लेकिन शायद छोटे और गरीबों के लिए....बड़े और अधिकारियों के लिए नहीं, अगर
देखा जाय तो ज्यादातर ऐसे लोगों के घरों में ही ये बच्चे या बच्चियां आया का काम
करती है. अभी हाल ही में कोडरमा के बांझेडीह पावर प्लांट में कार्यरत सीएसआर
अधिकारी के घर में सिमडेगा की एक 15 वर्षीय बालिका पिछले एक साल से कार्य करते
पायी गयी, रेस्क्यू भी हुआ लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से आज तक उनके खिलाफ कोई
कार्यवाई नहीं हुई. वहीँ, दूसरी ओर सदर अस्पताल कोडरमा के सामने चाय-समोसे वाली एक
ढाबे में कार्यरत 15 वर्षीय 2 बालकों के रेस्क्यू होने पर ढाबे के मालिक के खिलाफ
एफआईआर दर्ज हो गया. कोर्ट में मामला चल भी रहा है.
कुल मिलकर देखा जाय तो ये मानव तस्कर, आपराधिक गुट या गरीब माता-पिता
सभी छोटे बच्चों व मासूमों को बाल श्रम में धकेल रहे हैं. यही कारण है कि आज महानगरों
के आलावे छोटे शहरों, ईंट भट्टों, निर्माण कार्यों, माइका माइंस के
खादानों, कोयला खादानों, चाय की छोटी दुकानों, गैरेजों आदि स्थानों पर काम करते बच्चे
अक्सर मिल जाते हैं. जहाँ बच्चे 9 से 15 घंटे तक कार्य करते हैं.
झारखण्ड में भी सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं की ओर से बाल श्रम के खिलाफ
जागरुकता फैलाने का काम हो रहा है, बाबजूद आजतक इस पर अंकुश नहीं लग पाया है. एक
आकलन के अनुसार इस लॉकडाउन की वजह से इस राज्य में बाल मजदूरी की समस्या और ज्यादा
गंभीर होने वाली है. क्योंकि, अधिकांश लोगों के पास खाने के लिए भरपेट अनाज नहीं है.
कोल माइंस हो या माइका माइंस का क्षेत्र, आज यहाँ भुखमरी से लोग बेहाल है. सरकार
की ओर से संचालित मनरेगा योजना या अन्य सुविधा इस एरिया में नाम मात्र की पहुँच
रही है. ऐसे में इस प्रथा पर कैसे अंकुश लगेगा, यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है.
इन्द्रमणि साहू
22 जून, 2020


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