सच यह है कि किसी के बदनाम करने से कोई बदनाम नहीं होता.
नफरत का भाव पैदा नहीं होता. क्योंकि प्राय: यहाँ सभी के पास खुद का विवेक, सोच और
समझ है.
पहले कोई कुछ भी कहता था तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता
था, परन्तु अब फर्क पड़ता है. पहले हम वस्त्रों में लगे धूल को झाड़ने जैसा ऐसे
लोगों को धूल समझ कर झाड़ते थे. अब भी कोशिश करता हूँ, परन्तु हो नहीं पाता है. ऐसी
परिस्थिति में चुप बैठना ठीक नहीं है. फिर ऐसे लोगों के परिवारों एवं उनकी जिन्दगी
के बारे में सोचने लगता हूँ. चूँकि, शुरू से हमारी कार्यशैली और नियत ऐसी रही नहीं
कि किसी को कष्ट पहुंचाएं. किसी को दुःख देकर/देखकर खुश हो जाएँ. कुछ चीजों को मैं
समय को फैसला लेने छोड़ देता हूँ और अपने कार्य को अच्छे और इमानदारी से करने में
जुट जाता हूँ. यही कारण है कि आज तक कोई मुझे नुकसान नहीं पहुंचा पाया है. यदि
नुकसान हुआ भी तो मैंने उसमे में भी फायदा ढूँढ लिया हैं. हालाँकि, इस दिशा में प्रयास
खूब हुए हैं. नुकसान करने के प्रयासों ने हमें मशहूर और मजबूत होने का अवसर
दिया.
हम बस इतना जानते हैं कि हमसे जितने लोग खुश है, उनकी
खुशी ही हमारी ख़ुशी है. आज तक हमने औरों की ख़ुशी देखकर ही खुश होना सीखा है. रही
बात उनका जो आज तक मुझे या अपनी जिन्दगी को नहीं समझ पाया, दूसरे से प्रेरणा नहीं
ले पाया, खुद का व्यवहार नहीं बदल पाया, उन्हें आप लाख टिप्स बता दो, वे खुश नहीं होंगे
और न ही जीवन जीने के तरीके सीख पायेंगे. उलटे उन्हें खुश करने के चक्कर में आप खुद
ही डिस्टर्ब हो जायेंगे.
ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं किया. भरपूर मौका
दिया. साथ चलने और चलाने का भी प्रयास किया. परन्तु सब बेकार. अब इस मर्ज की दवा
ढूँढ रहा हूँ. हालाँकि, मुझे यह काम बहुत पहले करना चाहिए था. उसी का नतीजा है कि
आज पछताता रहा हूँ. इन्तेज़ार करता रहा कि सुधार होगा. लेकिन, उम्मीदों पर पानी फिर
गया. अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची. उनकी नियत और सोच बर्दाश्त से बाहर है.
पहले कोई कुछ भी कहता था तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता
था, परन्तु अब फर्क पड़ता है. पहले हम वस्त्रों में लगे धूल को झाड़ने जैसा ऐसे
लोगों को धूल समझ कर झाड़ते थे. अब भी कोशिश करता हूँ, परन्तु हो नहीं पाता है. ऐसी
परिस्थिति में चुप बैठना ठीक नहीं है. फिर ऐसे लोगों के परिवारों एवं उनकी जिन्दगी
के बारे में सोचने लगता हूँ. चूँकि, शुरू से हमारी कार्यशैली और नियत ऐसी रही नहीं
कि किसी को कष्ट पहुंचाएं. किसी को दुःख देकर/देखकर खुश हो जाएँ. कुछ चीजों को मैं
समय को फैसला लेने छोड़ देता हूँ और अपने कार्य को अच्छे और इमानदारी से करने में
जुट जाता हूँ. यही कारण है कि आज तक कोई मुझे नुकसान नहीं पहुंचा पाया है. यदि
नुकसान हुआ भी तो मैंने उसमे में भी फायदा ढूँढ लिया हैं. हालाँकि, इस दिशा में प्रयास
खूब हुए हैं. नुकसान करने के प्रयासों ने हमें मशहूर और मजबूत होने का अवसर
दिया.
और हाँ, लगे हाथ यह भी कह दूँ कि आज तक उन्होंने मेरे भोलेपन
और अच्छाई का खूब गलत फायदा भी उठाया. वर्षों से मेरे साथ रहकर मेरे अस्तित्व,
व्यक्तिव से न पूर्णतया परिचित हो सका, न दोस्त बन सका और न ही परिवार का हिस्सा.
शायद यही कारण है कि वे आज अपना फर्ज निभाना भूल गए. माना, मैं कहीं किसी विन्दु
पर गलत भी हूँ तो उन्हें क्या चाहिए. गलती को दिखाए, ढके या फिर सुधार कर दे या उलटे
नमक-मिर्च मिलाकर खामखाँ सबके माइंड में गलत या नफरत का भाव पैदा करे? ‘दुश्मन
जैसे दोस्त’ या साथ छोड़ने वाले साथी यदि यह काम करे तो बात समझ में आती है.
दुर्भावनावश, तुच्छ मानसिकता की वजह से वे कुछ भी करेंगे-कहेंगे. वहां हम यह सोचकर
बात पचा लेते हैं कि हम तरक्की के दिशा में अग्रसर हैं, तभी तो लोग मेरी बुराई कर
रहे हैं या मुझसे जल रहे हैं.
मैं भलीभांति जानता हूँ कि हमारी कोई गलती नहीं है फिर
भी तुम हमें बदनाम करने की भरसक कोशिश कर रहे हो. तुम्हें जलन है किसी खाश टेलेंट
से, किशी खाश चहरे से. परन्तु यह तुम्हारा प्रॉब्लम है. इस व्यवहार से मुझे लगता
है इससे तुम्हारा छवि का ही मखौल उड रहा है. मेरी नजरों से कौन गिर रहा है, दूर
कौन हो रहा है, लोग नीचा किसे देख रहा है. घाटा किसे हो रहा है. कभी फुर्सत में
सोचना. बता देना चाहता हूँ कि गलतफमिया और अहम का बर्फ इतना मत जमने दो कि फिर उसे
पिघला न सको. शंका, संदेह, संशय, शक और अनुमान के आधार पर किसी भी
शख्स का मुल्यांकन मत करो. इससे न सिर्फ भावनाएं टूटती है, बल्कि अटूट, अविरल और अंतहीन
रूप से बहने वाली प्रेमधारा, आत्मा से उठने वाली लयबद्ध संगीत, अपनेपन की खुशबू और अंतस दिव्य अनुभूति का भी खात्मा
हो जाता है.
तुम्हारा यह प्रयास शायद इसलिए भी हो रहा है कि तुम
हमें अपना प्यार मानते हो. करीबी और नजदीकी महसूस किये हो, तुम नहीं चाहते हो कि
यह सब किसी कारणवश छीन जाए. इसीलिए तुम्हे कोई नहीं भाता खाशकर अच्छे चहरे या
टेलेंट....ऐसे लोगों का साथ देखकर तुम्हारा दर्द और बैचैनी बढ़ जाती है और मन में जो भी दुर्भावनावश बातें आती है, बक देते हो. तब तुम्हारा ध्यान नहीं रहता है कि मेरा या तुम्हारा खुद का स्वाभिमान एवं इज्जत का क्या होगा? कई बार अपने को
उनसे बेहतर सिद्ध करने के चक्कर में भी यह हरकत हो जाती है. आलोचना या निंदा करना
अच्छी बात नहीं है. अच्छा होता यदि तुम अपना व्यवहार सुधार लेते. शायद कोई तुम्हारा
अपना बन जाता. तुम भी हँसते-गाते औरों की तरह. यदि ऐसा नहीं कर पा रहे हो तो यकीन मानिए यह तुम्हारा दुर्भाग्य हैं.
हमारा क्या है, हम
ऐसे आलोचनाओं को एक अवसर मानकार अंदर झांकते हैं और खुद को संवारते हुए गहराई में
उतर जाते हैं. जो गलत दीखता है उसे हम सहजता से स्वीकार भी करते हैं. शायद यही कारण
है हमारा व्यक्तित्व निखरता जा रहा है और तुम अपने को खोते जा रहे हो.
मुझे मालूम है आजकल तुम बेहद परेशान हो. जिंदगी
की उलझनों को सुलझाने में उलझे हुए हो. तुम्हें हर पल यही लगता है कि अच्छे लोग
क्यों यहाँ आ रहे हैं. ऐसे अच्छे लोग तुम्हें साधारण तरीके से कुछ पूछ भी ले तो तुम्हें
लगता है कि उन्होंने तुम्हारे सम्मान और भावनाओं को ठेस पहुँचाया है.
मैं यह भी जानता हूँ कि इस
दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार लोग हैं. इसलिए यह मानकर चल
रहा हूँ कि जीवन जीने के लिए ऐसे हर तरह के लोगों से सामना करना पड़ेगा. कबीर का दोहा भी याद है कि निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय..
इन्द्रमणि
साहू
22 जून, 2020

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