मालूम है
बिछड़े नहीं है फ़िलहाल
रोज बातें हो रही है
फिर भी सन्नाटा सा पसरा हुआ
है...
सांझ तक नहीं हुई है हमारे
रिश्तों में
मगर फिर भी रात का सुन्नापन
का एहसास हो रहा है...
कल तक साथ थे हम दोनों
फिर भी आज लग रहा है
मुद्दते हो गयी मिले हुए...
अभी-अभी मरहम लगाये हैं
जख्मों पर
फिर भी लग रहा है
सितम हज़ार ढायें हैं
एक दूजे पर....”
-इन्द्रमणि साहू
27/07/2020
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