"सोचकर मुझको होती है हैरानी बहुत है,
हम दो कदम और वो आठ कदम पर क्यों है?हर दिन मिलना, हर दिन बिछड़ना होता है,
फिर भी इन्हीं को हर कोई परखता क्यों है?
दे गया है ग़म ज़माने भर का, लेकिन
हर कोई इन्हीं को अजमाता क्यों है?
चाहता है ये मुझे दिल से,
फिर चंद खुशियों के लिए तड़पाता क्यों है?
दोस्ती का शिला मुझको इन्हीं से मिला है,
बोला है, बाँटकर खाएंगे, मगर खाया अकेले क्यों है?
नफरत वाली आग बुझाना सिखा है मैंने इन्हीं से,
फिर भी हमारी ज़िंदगी में फूल से ज्यादा काँटे क्यों हैं?
दिल का पत्ता फेंक कर ज़िंदगी खरीद लेते हैं ये जनाब,
मगर इतने बड़े जुआरी से मुझको जलन क्यों है?
टूटी हैं उम्मीदें, टूटे हैं अरमान इनसे,
सोचता हूँ फिर भी दोस्ती इन्हीं से क्यों है?"
-इन्द्रमणि साहू
21.08.2020

very nice.
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