धुकधुकी सी
क्यों है छाती के अन्दर
क्यों लगता है
कि
छीन जा रहा है
कोई कीमती चीज मुझसे...
फिंजा ख़राब और
माहौल भी डर का है
मालूम है विकल्प नहीं है
पर संभावनाओं की भी कमी नहीं है...
मालूम है
कैद हो जायेगा
एक न एक दिन बंद पिंजरें में
तब अरमानों के परिंदों के शोर के साथजीने की
कोशिशें नाकाम हो जायेंगे...
और एक बार फिर लम्बी ख़ामोशी
जीवन का हिस्सा होगा...
समझाते बहुत हैं
खुद को
कि अधूरा कभी पूरा नहीं होता ...
फिर अन्दर से आवाज आती है
अच्छा है एक बार फिर
बेच लेना
एक एक शब्द सरे आम
बिलख-बिलखकर
हकर-हकर कर रोकर
कविताओं के रूप में ....
इन्द्रमणि साहू
22.04.2021
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