ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर की मर्जी से ही स्त्री और पुरुष शादी के बंधन में बंधते हैं। बड़े-बुजुर्ग भी कहते हैं कि शादियां ईश्वर के यहां तय होती है. हर सुख-दुख में पति-पत्नी एक दूसरे का सहयोगी और साथी बन कर साथ निभाते हैं. लेकिन, आज छोटी-छोटी बात पर या फिर तल्ख़ मिजाजी की वजह से परिवारों के बिखरने की सूचना मिल रही है. कई बार पति-पत्नी के बीच मायके वालों की बेजां दखलंदाजी भी बड़ा कारण बनकर सामने आ रहा है. ऐसे कई मामले आये दिन सामने आ रहे हैं. थानों के अलावे अब संस्थाओं के द्वारा संचालित स्वाधार गृहों एवं उज्जवला होम में भी ऐसे मामले आने लगे हैं. मोबाइल का युग है. यहाँ आज की तारीख में हर बेटी, बहु या पत्नी को सेल फोन चाहिए. और हो भी क्यों नहीं. परन्तु यह सेल फोन जब घर तबाह करने लगे तो फिर यह सेल फोन के बगैर की जिन्दगी ही ठीक है. आज पति पत्नी के बीच मामूली नोकझोंक हुई नहीं कि पल-पल की हर खबर मायके तक पहुँच जाती है. उधर, मायके वाले हैं कि अपनी बेटी की थोड़ी भी दर्द देखना पसंद नहीं करते हैं. यही वजह है ये छोटी-मोटी मामूली नोंकझोंक कभी-कभी कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाते हैं . जिसका बुरा असर बच्चों, परिवार और समाज पर भी पड़ता है.
आये दिन मामूली विवाद की वजह से घर छोड़ने जैसी कई मामले
सामने आये हैं. पिछले एक साल में स्वाधार गृह हजारीबाग में सिर्फ 46 ऐसे मामले आये
हैं. जहाँ स्वाधार गृह की कर्मियों की पहल पर उसे सुलझाया जा सका. स्वाधार गृह के
परियोजना निदेशक इन्द्रमणि साहू कहते हैं कि संयुक्त परिवार की परंपरा अब लगभग टूट
चुकी है. अब स्त्रियां भी घर से निकल कामकाज कर रही हैं. समाज में व्यक्तित्व का
बढ़ता प्रभाव, आर्थिक उन्नति और तथाकथित प्रगति कई बार पति-पत्नी
के अहं के टकराव का कारण बन रहा है. भावनात्मक रिक्तता की भरपाई कहीं से हो नहीं
है. वे कहते हैं कि यदि पति पत्नी शुरुआती विवाद को घर पर ही सुलझा लिया जाय या
बड़े बुजुर्गों की मदद से निपटारा कर लिया जाय तो काफी हद तक मामला वहीं खत्म हो जाता
है. इससे परिवार टूटने से बच जाता है. इसके लिए आपसी तालमेल होना एवं एक दूसरे पर विश्वास-भरोसा
होना जरुरी होता है.
इन दिनों हजारीबाग, कोडरमा एवं अन्य जिलों के जो
मामले स्वाधार गृह में आ रहे हैं उसमें से ज्यादातर कुछ इसी टाइप के हैं. जहाँ
स्वाधार गृह एवं समर्पण संस्था के लोग ऐसे परिवारों के बीच सेतु बनकर उन्हें
जोड़ने का काम कर रहा है. कई महिलाएं ऐसी हैं जो सिर्फ अपनी भौतिक संसाधनों और ईगो
की वजह से अपना बसा-बसाया घर बिगाड़ देती हैं. कभी यह भी देखा गया है कि पति पत्नी
दोनों जब काम करने जाते हैं तब घर का काम कौन करेंगे, परिवार कौन संभालेंगे इस बात
को लेकर विवाद हो जाता है. पहले विवाद होता था तो घर
में कोई न कोई समझाने वाला होता था चूँकि संयुक्त परिवार होता था. अब संयुक्त
परिवार रहा नहीं सो झगड़ा होने पर कोई
समझाने वाला नहीं रहता है. फिर पति पत्नी में बहुत दिनों तक बातचीत बंद हो जाती
है. जो धीरे-धीरे आक्रामक रूप ले तेता है. जो सही नहीं है.

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