रविवार, 19 मई 2024

चंद बूंद पानी

 .....और जो, 

समझना ही 

नहीं चाहे 

उसे कितना भी 

समझा लो 

सब बेकार.....!

..........................................

समेट-समेट कर 

संभाल-संभाल कर 

जीना चाहते हैं 

आए-गए की तरह नहीं

और एक तुम हो 

कि......!

..................................

प्यासे को 

चंद बूंद पानी 

की थी जरुरत 

पर  उन्होंने तो,

उसे कुएँ में ही डुबो दिया...!

.........................................

कौंधता है 

चुभता है 

और झकझोरता भी 

खूब है 

उनकी बातें 

आज भी...."

................................

रेत को 

मुट्ठी में बंद 

किये तो हैं 

देखते हैं 

टिकता भी है 

या नहीं....!

-इन्द्रमणि साहू 

 

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