.....और जो,
समझना ही
नहीं चाहे
उसे कितना भी
समझा लो
सब बेकार.....!
..........................................
समेट-समेट कर
संभाल-संभाल कर
जीना चाहते हैं
आए-गए की तरह नहीं
और एक तुम हो
कि......!
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प्यासे को
चंद बूंद पानी
की थी जरुरत
पर उन्होंने तो,
उसे कुएँ में ही डुबो दिया...!
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कौंधता है
चुभता है
और झकझोरता भी
खूब है
उनकी बातें
आज भी...."
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रेत को
मुट्ठी में बंद
किये तो हैं
देखते हैं
टिकता भी है
या नहीं....!
-इन्द्रमणि साहू
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