मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
प्लीज़
हाँ तुझे भी ताजुब्ब होगा यह जानकर की इतना सब कुछ होने के बाद भी मैं अपने-आपको कोस नहीं रहा हूँ हाँ , हंस रहा हूँ अपनी हालात पर प्लीज़ , तुम न हँसना मेरी इस कमजोरी पर। -इन्द्रमणि
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