बुधवार, 22 अप्रैल 2009

मैं और मेरी लाश

मैं और मेरी लाश
एक अजीम चौराहे पर
मिलकर घंटों बातें की
घर की, कैरिअर की ,
प्रेम की, समाज की, स्वर्ग की......

तब उन्होंने कहा
बस इतना ही करो बातें
क्यूंकि, सड़ रही हूँ मैं
आने लगी है बू मुझसे
दफना दो मुझे कहीं

मैंने कहा-
बू सिर्फ़ तुमसे नहीं
यहाँ के हर गलिओं,
हर चौराहों, हर चौबारों,
हर घरों से भी
बू आ रही है
शराब की, पेशाब की,
उल्तियौं की, हत्याओं की,
वफ़ाऔं की , बिचारों की
भावनाओं की.....

तो मैं कितने को दफनौऊ
और कहाँ- कहाँ
वह भी अकेले
उन्होंने कहा
अकेले कहाँ हो तुम
तुम्हारे जैसे कई इन्सान है यहाँ

मैंने कहा- शायद आपने
गौर से देखा नहीं हैं
यहाँ के बाज़ारों को
जहाँ सारे इन्सान
बिक रहे हैं
मांस के भाव मैं
खूंटों पर टंगे-टंगे

उन्हें मेरी baatoun पर
यकीं आ गया
तब कहा- कोई बात नहीं
चलो हम दोनों मिलकर
पहले यह काम कर लेते हैं
फ़िर तुम दफना देना
यहीं कहीं, यहीं कहीं!
-इन्द्रमणि

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