मन की बगिया में बहार हर समय नहीं आती है. जब आती है तब फिर बहुत कुछ कहने का मन करता है. बाछें खिल उठता है. मन प्रफुल्लित हो जाता है. कभी-कभी इस बगिया से बसी-बसाई चिरैयां उड़ भी जाती है. जब उड़ती है तब न सिर्फ आह निकलती है बल्कि जीने की चाहत भी ख़त्म सी हो जाती है. इन दोनों परिस्थितियों की प्रतिलिपि एवं प्रतिबिम्ब के रूप में है यह मंच. आपकी मौलिक रचना का भी हम स्वागत करते हैं. कृपया इस ईमेल पर भेजे: indramanijharkhand@gmail.com
शनिवार, 25 अप्रैल 2009
मेरी manjil
भटक रहा हूँ वर्षो से अब दूर चला गया हूँ भटकते- भटकते लौट पाना मुश्कल है इतने दूर चला आया हूँ लौटने की कौशिश में भटकता ही जा रहा हूँ अब भटकन ही मेरा आनंद है और आनंद ही मेरी manjil। -Indramani
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