1994 में जिला बनने के बाद भी कोडरमा में अपेक्षाकृत परिवर्तन या बदलाव संभव नहीं हो पाया। बच्चों व महिलाओं की स्थिति जस की तस बरकरार रही। बल्कि पहले के अपेक्षा समस्याएं और ब-सजय़ीं। यहां के लगभग सभी गांवों, चैक-चैराहों में 0-18 आयु वर्ग के बच्चों व नैनिहालों के लिए बने केद्रीय कानूनों, अंतराष्ट्रीय कानूनों, घोषणा पत्रों तथा मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा था (है)। यहां ज्यादातर गरीब, भूमिहीन, खेतीहर मजदूर, निर्माण मजदूर, क्रषर-माईका मजदूर और किसान समुदाय के लोग हैं। इनके बच्चों के बेहतर भविष्य एवं बच्चों को अधिकारों से लैस करने के उद्देष्य से क्रेज एवं समर्पण ने पांच साल पूर्व कोडरमा के लोकाई एवं इंदरवा पंचायत के दस गांवों को चिन्हित कर जागरूकता संबंधी कार्य करना प्रारंभ किया। इसके तहत संस्था द्वारा बाल रैली, गांव एवं स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम, विभिन्न अवसरों व उत्सवों के अवसर पर सांस्कृतिक व नुक्कड़ नाटक कार्यक्रम, बाल सभा का आयोजन, बाल समागम, बाल महोत्सव, पर्चा-पोस्टर का वितरण, दिवाल लेखन, मां-बेटी सम्मेलन, किषोरी सम्मेलन, किषोरी प्रषिक्षण, बाल पत्रकार निर्माण कार्यषाला का आयोजन आदि कार्यक्रम संपादित किये जाते रहे। जिसका परिणाम अब कुछ-कुछ दिखाई देने लगा है। गांवों में आज शैक्षणिक माहौल है। गांव के सभी बच्चे आज स्कूल में हैं और उनका षिक्षा और विधालय के प्रति आकर्षण बना हुआ है। बच्चे मुखर होकर अपने हक अधिकार हासिल कर रहे हैं।
कोडरमा जिला मुख्यालय से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित है राजकीयकृत मध्य विधालय इंदरवा (देहाती)। कहने को तो यह स्कूल सरकारी है पर प-सजय़ाई व अनुषासन के मामले में यह किसी प्राईवेट विधालय से कम नहीं है। 1952 में निर्मित रा0 मध्य विधालय इंदरवा (देहाती) इन दिनों कोडरमा जिला के माॅडल विधालयों में से एक है। यहां कुल 10 षिक्षक हैं। सभी कर्तव्यनिष्ठ और बाल अधिकारप्रेमी हैं। पारा षिक्षकों के हड़ताल पर चले जाने के समय भी यहां प-सजय़ाई एक दिन भी बाधित नहीं हुआ। क्योंकि, ग्राम षिक्षा समिति, स्कूल प्रबंधन समिति एवं विधालय के प्रधानाध्यापक के संयुक्त प्रयास से वैकल्पिक षिक्षकों की बहाली शीघ्र कर लिया गया। वह भी निःषुल्क। यह काम गांवों में बैठक कर कुछ प-सजय़े-ंउचयलिखे युवा-युवतियों को षिक्षादान के तहत किया गया।
इस स्कूल ने स्वतंत्र भारत के बाद से लेकर आज तक एक लंबा सफर तय किया है। इस लंबे सफर में मात्र दो प्रधानाध्यापकों का नाम गर्व से लिया जा रहा है। एक वर्तमान प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का और दूसरा रामलखन प्रसाद का। उक्त दोनों प्रधानाध्यापकों ने अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा से इस विधालय को माॅडल स्वरूप देने में अपनी पूरी शक्ति -हजयोंक दी। यही वजह है कि आज जिला में जब कभी भी बाहर से कोई अधिकारी मूल्यांकन या विजिट में आते हैं तो इसी स्कूल को दिखाया जाता है।
कोडरमा जिला मुख्यालय से महज 5 किमी की दूरी पर स्थित है राजकीयकृत मध्य विधालय इंदरवा (देहाती)। कहने को तो यह स्कूल सरकारी है पर प-सजय़ाई व अनुषासन के मामले में यह किसी प्राईवेट विधालय से कम नहीं है। 1952 में निर्मित रा0 मध्य विधालय इंदरवा (देहाती) इन दिनों कोडरमा जिला के माॅडल विधालयों में से एक है। यहां कुल 10 षिक्षक हैं। सभी कर्तव्यनिष्ठ और बाल अधिकारप्रेमी हैं। पारा षिक्षकों के हड़ताल पर चले जाने के समय भी यहां प-सजय़ाई एक दिन भी बाधित नहीं हुआ। क्योंकि, ग्राम षिक्षा समिति, स्कूल प्रबंधन समिति एवं विधालय के प्रधानाध्यापक के संयुक्त प्रयास से वैकल्पिक षिक्षकों की बहाली शीघ्र कर लिया गया। वह भी निःषुल्क। यह काम गांवों में बैठक कर कुछ प-सजय़े-ंउचयलिखे युवा-युवतियों को षिक्षादान के तहत किया गया।
इस स्कूल ने स्वतंत्र भारत के बाद से लेकर आज तक एक लंबा सफर तय किया है। इस लंबे सफर में मात्र दो प्रधानाध्यापकों का नाम गर्व से लिया जा रहा है। एक वर्तमान प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का और दूसरा रामलखन प्रसाद का। उक्त दोनों प्रधानाध्यापकों ने अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा से इस विधालय को माॅडल स्वरूप देने में अपनी पूरी शक्ति -हजयोंक दी। यही वजह है कि आज जिला में जब कभी भी बाहर से कोई अधिकारी मूल्यांकन या विजिट में आते हैं तो इसी स्कूल को दिखाया जाता है।
आरटीई 2009 के लगभग मानदंड़ों को पूरा करता है यह स्कूल
आज अधिकांष प्रधानाध्यापक मध्यान भोजन एवं स्कूल भवन निर्माण कार्य में कितना आमद-खर्च हो रहा है या होने वाला है के चक्कर में उल-हजये रहते हैं। वहीं इस विधालय के प्रधानाध्यापक सहित अन्य सहयोगी षिक्षक सिर्फ बच्चों को उचित षिक्षा मिले, नामांकन व ठहराव 100 प्रतिषत बरकरार रहे इसके लिए ज्यादा चितिंत रहते हैं। यह स्कूल निःषुल्क और अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के लगभग सभी मापदंडों को पूरा कर रहा है। यहां षिक्षकों की नियमित उपस्थिति, छात्र के अनुपात में षिक्षकों की उपलब्धता, समय-ंउचयसारणी के अनुसार प-सजय़ाई, योग्य एवं विषयवार षिक्षक की उपलब्धता, शैक्षणिक वार्षिक कैंलेंडर का अनुपालन, टीएलएम का उपयोग, खेल एवं मनोरंजन सामग्री की उपलब्धता एवं सभी बच्चों को समय पर पुस्तकें हासिल हैं। स्कूल व्यवस्था में किसी प्रकार की कोई कमी होती है तो बाल संसद सक्रिय हो उठते हैं। विधालय में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय है। शुद्ध पेयजल के लिए स्कूल परिसर में चापानल है। स्कूल प्रबंधन समिति की नियमित बैठक हो रही है। समिति द्वारा विधालय विकास योजना का निर्माण किया जा रहा है। यहां मिनू के अनुसार बच्चों के बीच नियमित एवं गुणवतापूर्ण मध्यान भोजन परोसा जा रहा है। वह भी साफ-सफाई एवं अनुकूल वातावरण में। विधालय प्रागंण में एक पीपल का वृक्ष है, जिसकी छांव में बैठकर बच्चे प्रतिदिन भोजन करते हैं। गरीब बच्चों को नियमित छात्रवृति का भुगतान किया जा रहा है। बच्चों का नियमित मूल्यांकन एवं अनुश्रवण होता है जिसमें पाये गये कमजोर बच्चों की प-सजय़ाई के लिए अलग से व्यवस्था है। बच्चों की सहभागिता से विधालय में अक्सर बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जैसे-सुलेख, निबंध, खेल-कूद आदि।
आज अधिकांष प्रधानाध्यापक मध्यान भोजन एवं स्कूल भवन निर्माण कार्य में कितना आमद-खर्च हो रहा है या होने वाला है के चक्कर में उल-हजये रहते हैं। वहीं इस विधालय के प्रधानाध्यापक सहित अन्य सहयोगी षिक्षक सिर्फ बच्चों को उचित षिक्षा मिले, नामांकन व ठहराव 100 प्रतिषत बरकरार रहे इसके लिए ज्यादा चितिंत रहते हैं। यह स्कूल निःषुल्क और अनिवार्य षिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 के लगभग सभी मापदंडों को पूरा कर रहा है। यहां षिक्षकों की नियमित उपस्थिति, छात्र के अनुपात में षिक्षकों की उपलब्धता, समय-ंउचयसारणी के अनुसार प-सजय़ाई, योग्य एवं विषयवार षिक्षक की उपलब्धता, शैक्षणिक वार्षिक कैंलेंडर का अनुपालन, टीएलएम का उपयोग, खेल एवं मनोरंजन सामग्री की उपलब्धता एवं सभी बच्चों को समय पर पुस्तकें हासिल हैं। स्कूल व्यवस्था में किसी प्रकार की कोई कमी होती है तो बाल संसद सक्रिय हो उठते हैं। विधालय में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय है। शुद्ध पेयजल के लिए स्कूल परिसर में चापानल है। स्कूल प्रबंधन समिति की नियमित बैठक हो रही है। समिति द्वारा विधालय विकास योजना का निर्माण किया जा रहा है। यहां मिनू के अनुसार बच्चों के बीच नियमित एवं गुणवतापूर्ण मध्यान भोजन परोसा जा रहा है। वह भी साफ-सफाई एवं अनुकूल वातावरण में। विधालय प्रागंण में एक पीपल का वृक्ष है, जिसकी छांव में बैठकर बच्चे प्रतिदिन भोजन करते हैं। गरीब बच्चों को नियमित छात्रवृति का भुगतान किया जा रहा है। बच्चों का नियमित मूल्यांकन एवं अनुश्रवण होता है जिसमें पाये गये कमजोर बच्चों की प-सजय़ाई के लिए अलग से व्यवस्था है। बच्चों की सहभागिता से विधालय में अक्सर बौद्धिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जैसे-सुलेख, निबंध, खेल-कूद आदि।
विधालय में अभी भी है आधारभूत संरचनाओं की कमी
हलांकि, इस स्कूल में कई आधारभूत संरचरनाओं की कमी है, जैसे रसौईघर, पुस्कालय व प्रयोगषाला। इसके अलावे पर्याप्त टेबल, कुर्सी, बंेच, दरी आदि का भी काफी कमी है। जिसकी मांग अक्सर संबंधित विभाग से की जा रही है। विधालय में अध्ययनरत कुल 460 बच्चों में मात्र 373 बच्चों को ही पोषाक मिल सका। शेष बच्चों को अभी तक पोषाक नहीं मिल पायी है। क्योंकि, जिला प्रषासन की ओर से उतनी राषि उपलब्ध ही नहीं करायी गयी जितना का लिस्ट समर्पित किया गया था। अक्षम/विकलांग बच्चों के लिए अनुकूल साधन एवं क्षेत्रीय भाषा पर आधारित पाठ्यक्रम में कमी है।
प्रधानाध्यापक की रायः
प्रधानाध्यापक सुभाषचंद्र का कहना है कि आज शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव किये जा रहे हैं। नित्य नये कानून बन रहे हैं। षिक्षकों को नये-नये तरीकों के प्रषिक्षण दिये जा रहे हैं। लोक भागीदारी कायम करने के लिए स्कूल प्रबंधन समिति एवं पंचायत जनप्रतिनिधियों को भी प्रषिक्षण एवं अधिकारों से लैस किये जा रहे हैं। लेकिन, बदलाव कहीं नजर नहीं आ रही है। आखिर बदलाव आये भी तो कैसे? उपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट हो चुके हैं। इस क्षेत्र को भी लूट और भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया गया है। गैर शैक्षणिक कार्याे में लगाकर हम षिक्षकों को बच्चों के अधिकारों से विमुख कर दिया है। बेचारे मास्टर क्या करे। आज हमलोग दोहरी मार के षिकार भी हैं। समुदाय-अभिभावक व षिक्षक के बीच के मधुर रिष्ते भी खत्म हो गये हैं। इसमें हम षिक्षक भी कम दोषी नहीं हैं। स्कूल की व्यवस्था को लेकर उन्होंने कहा कि हम जी-जान से लगे हुए हैं। प्रधान षिक्षक होने के साथ-साथ एक सामाजिक दायित्व के तहत भी हम चाहते हैं कि सभी बच्चों को अच्छी व गुणवतापूर्ण षिक्षा मिले। इस दिषा में हमें स्वयंसेवी संस्था समर्पण, क्रेज, स्थानीय पंचायत जनप्रतिनिधियों एवं अन्य षिक्षाप्रेमियों का भी काफी सहयोग प्राप्त है। इसलिए आज हम इस स्कूल को एक पहचान दिलाने में सफल हैं।
खींचड़ी खिलाने वाला केंद्र मात्र नहीं है सरकारी विधालय
यह सही है कि आज षिक्षा व्यवस्था परिवर्तन का औजार नहीं, बल्कि, खरीद-बिक्री की चीज हो गयी है। आज जिनके पास जितना पैसा है वे उतनी ही मंहगी षिक्षा खरीद रहे हैं। आज भी इस देष में केंद्रीय विधालय, नवोदय विधालय, अंग्रेजी-हिन्दी माध्यम के प्राईवेट विधालयों को ही रोल माॅडल माना जा रहा है। वहीं सरकारी विधालय की गिनती गरीबों के बच्चों के लिए बना विधालय या खींचड़ी खिलाने वाला केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। जबकि, सरकारी विधालयों में प-सजय़ने वालों की संख्या 80 फीसदी हैं। षिक्षक यदि चाह लें तो एक हद तक प्राईवेट विधालयों को मात दे सकता है। इसके लिए षिक्षकों को बच्चों के प्रति समर्पित होना पड़ेगा। चुंकि, प्राईवेट विधालयों से ज्यादा वेतन सरकारी विधालयों में प-सजय़ाने वाले षिक्षकों का होता है। क्वालिफिकष्ेान एवं प्रषिक्षण भी कमोवेष ज्यादा होता है। जरूरत है समर्पित भाव से बच्चों को -हजयारखंडी अवधारणा के अनुरूप यहां के मूल्यों, ऐतिहासिक धरोहरों, गोरवमयी संस्कृति एवं भाषा के स्तर पर परिपक्व बनाना। इसी को ध्यान में रखते हुए 28 नवंबर 2001 को भारतीय संसद ने षिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। बाद में, अप्रैल 2010 से निःषुल्क एवं अनिवार्य बाल षिक्षा अधिकार अधिनियम लागू कर षिक्षा के क्षेत्र में दोहरी नीति की प्रणाली को खत्म करने का प्रयास किया गया है। लेकिन, कानून या नीति बना देने मात्र से स्थितियों में बदलाव नहीं आने वाला है। बदलाव के लिए जरूरी होता है इच्छा शक्ति। इंदरवा स्कूल को आज एक उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
विधालय व्यवस्था सुधार में क्रेज एवं स्वयंसेवी संस्था समर्पण का अहम् योगदान
आज इस गांव में एक भी बच्चे कामकाजी नहीं हैं और न ही बाल मजदूर हैं। यदि हैं भी तो वे घर का काम-काज करते हुए प्रतिदिन स्कूल भी जा रहे हैं। हां, किषोरियों में यह संख्या आज भी कुछ है। लेकिन, हाई स्कूल के अभाव में। हाई स्कूल की प-सजय़ाई प्रांरभ होते ही यह भी समस्या समाप्त हो जायेगी। उक्त विधालय को एक पहचान दिलाने एवं हाई स्कूल की मांग को निरंतर जारी रखने में क्रेज एवं स्वयंसेवी संस्था समर्पण का काफी योगदान रहा है।
इंदरवा एक बड़ी और मिश्रित जातियों की बस्ती है। एक मुहल्ला दलितों की है। जहां न आंगनबाड़ी था और न ही वहां के बच्चे स्कूल आते थे। दलितों की स्थिति काफी दयनीय और उपेक्षित जैसा था। अब उस मुहल्ले के बच्चे स्कूल आ रहे हैं। महिला मंडल एवं समाजकर्मियों के मांग पर यहां आंगनबाड़ी भी खुला। संस्था समर्पण के मेरियन सोरेन ने बताया कि गांव में शैक्षणिक माहौल बनाने में गांव में गठित नवयुवक समिति, समाज के मानिन्द व्यक्ति व समाजसेवीगण, बाल कल्चरल टीम, षिक्षकगण, पंचायत जन प्रतिनिधिगण एवं मिडिया आदि का विषेष सहयोग प्राप्त हुआ है। संस्था के सार्थक प्रयास से आज इस गांव में कामकाजी बच्चें या बाल मजदूरों की संख्या नगण्य है। और तो और, छीजन की दर में भी काफी कमी हो गयी है। बाल विवाह की संख्या में काफी कमी आयी है। आज इस गांव से कई लड़कियां हाईस्कूल और काॅलेज की षिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। बच्चे नषापान एवं अन्य बुराईयों से मुक्त हुए हैं। वर्ष 2008 में डोर टू डोर सर्वेक्षण से प्राप्त आंकडों के अनुसार इस गांव में कुल 65 बच्चे कामकाजी एवं 17 बच्चे बाल मजदूर एवं 78 बच्चे छीजित थे। जिन्हें स्कूल से जोड़ने के लिए संस्था को काफी मसक्कत करनी पड़ी। (Indramani Sahu)


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