शनिवार, 7 सितंबर 2013

नौकरषाह अभी भी नहीं चाहते हैं कि सत्ता का विकेंद्रिकरण हो

संदर्भः झारखंड में पंचायत चुनाव
पंचायत चुनाव में निर्वाचित हुए मुखिया को 32 वर्षो के बाद एक बार फिर चेक काटने का अधिकार मिल गया परंतु लोक सत्ता का सवाल आज भी एक चुनौती बना हुआ है. नौकरषाह जनप्रतिनिधियों पर हावी है. कुछेक जनप्रतिनिधि बढ़चढ़कर लोक सत्ता को सही मायने में धरातल पर उतारने का प्रयास कर रहे हैं. परंतु, नौकरषाह नहीं चाहते हैं कि लोक सत्ता बहाल हो. शायद इसलिए आए दिन अखबारों में खबरें आने लगी हैं कि फलां मुखिया या फलां मुखिया के पति या प्रमुख ने ब्लाॅक कार्यालय में आकर सरकारी काम-काज में बाधा पहुंचाया, गाली-ग्लौज किया या फिर कर्मचारियों के साथ मार-पीट किया. यही आरोप गढ़कर  मामले को थाने तक ले जाया जा रहा है. अब तक कईयों पर प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है.जनप्रतिनिधि अपना पक्ष भी रख रहे हैं परंतु उनके तमाम् सबूतों या दलीलों को दरकिनार कर दिये जा रहे हैं. इससे यही सिद्ध होता है कि नौकरषाह नहीं चाहते हैं कि सत्ता का विकेंद्रिकरण हो. इतने लंबे अंतराल तक पंचायत चुनाव का न होने का एक कारण यह भी था.

राज्यगठन के बाद -हजयारखंड में पहली बार पंचायत चुनाव हुआ है. इससे पूर्व 1978 में एकीकृत बिहार के समय पंचायत चुनाव हुआ था. तीन दषक तक पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण ग्राम सत्ता या पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी और इस बीच नौकरषाहों का जनता पर एकाधिकार सा हो गया था. वे जैसा चाहते थे जनता वैसी नाचती थी. लेकिन, अब जब जनता ने अपना जनप्रतिनिधि बहाल कर दिया है तो नौकरषाहों का अपना एकाधिकार और अधिपत्य समाप्त होता दिख रहा है. मनुष्य के अंदर यह मानवीय गुण होता है कि वे अपने नीचे अधिक से अधिक लोगों पर अधिपत्य जमाये. यह नहीं होता देख या अपना कथित अधिकार जाता देख नौकरषाह आज बौखलाये हुए हैं.
रही बात पंचायत चुनाव संपन्न होने की तो यह चुनाव भी राजनीतिक दलों के चुनाव से कम नहीं रहा. फर्क सिर्फ इतना ही रहा कि चुनाव राजनीतिक पार्टियों के बनैर तले नहीं हुआ. लेकिन, इस चुनाव की घोषणा होते ही वैसा ही सब कुछ दिखा जैसे विधान सभा या लोक सभा के चुनाव में दिखता है. तय सीमाओं को तौड़कर सभी ने खर्च किये. दारू-मुर्गा, खस्सी-हंडिया, पार्टी जो चला सो अलग. कुल मिलाकर इस चुनाव में भी जिसका नोट उसका वोट वाला राजनीतिक कोषिष हुई. लेकिन, सारे प्रतिनिधि पैसे के बदौलत ही चुनाव जीते हैं ऐसा भी नहीं है. मतलब बहुत से प्रतिनिधि अपने सामाजिक सरोकारों ओर जनसंघर्षषीलता के आधार पर भी चुनाव जीते हैं. अब जब चुनाव जीत गये तो जीते अधिकांष जनप्रतिनिधियों का रूतबा ही बदल गये. पार्टी नेताओं की तरह चमचमाती कारें, फियेट, मारूती, बोलरो या अन्य दोपहिया या चार पहिया वाहन और उस पर नेम प्लेट ऐसा कि कोई महामहिम ही हांे. कई अध्यक्षों ने तो लाल बत्ती तक लगा लिये.

कहने का मतलब मेरा गाडियों का मेंटेनेन्स का जुगाड़ करना या समाज सेवा के नाम पर स्वांग रचना मात्र नहीं है बल्कि, गांधी जी के सपनों को सकार रूप  देना है. इसके लिए जल, जंगल, जमीन की रक्षा, कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था, षिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विस्थापन, पलायन, डायन हत्या, महाजनी और सूदखोरी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों पर पहल करना भी है. और यह सब मुद्दों पर समाधान तभी संभव है जब गांवों व प्रखंड कार्यालयों में  कायम ठीकेदारी प्रथा, गुंडों-माफियाओं का कब्जा, नौकरषाहों-अफसरषाही राज व्यवस्था का खात्मा होगा. यह सब एक जनप्रतिनिधि के चाहने से नहीं होगा बल्कि, इसके लिए सभी जनप्रतिनिधियों को एक मंच पर आना होगा जैसे नौकरषाह अपने हितों के लिए एक मंच पा आ जाते हैं. आपकी संख्या भी कम नहीं है. अगर देखा जाए तो -हजयारखंड में 24 जिला, 259 प्रखंड, 34 हजार गांव और 4562 पंचायत है. जिसमें कुल पंचायत जनप्रतिनिधियों की संख्या 53,260 है. ग्राम सभाओं के प्रतिनिधियों एवं अध्यक्षों, उपाध्यक्षों, प्रमुखों को जोड़ लिया तो इसकी संख्या लाखों में पहुच जाती है. संख्या की दृष्टिकोण से पंचायत जनप्रतिनिधियों की एक बड़ी ताकत है लेकिन,  कानूनी जानकारी या षिक्षा के मामले में आप कमजोर बने हुए हैं. इसलिए अपनी कमजोरी दूर करिये और लोक सत्ता को अफषाही से मुक्त करते हुए -हजयारखंड में पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाईये.
- इन्द्रमणि

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