शनिवार, 7 सितंबर 2013

हिंसा का जबाव हिंसा नहीं हो सकता

भारत में पहली बार वायु सेना एक खतरनाक काम करने जा रही है. वह काम है-अपने ही देष में अपने ही लोगों पर गोलियों और बमों से आकाषीय हमला करना यानि, असमान से जमीन पर रह रहे नक्सलियों को चुन-चुनकर मारना. नक्सलियों को नेस्तानाबुद करने के लिए यह काम करा रही है हमारी सरकार. यदि यही काम सीमा पर युद्ध के दौरान होता तो हम गर्वान्वित भी होते, परंतु जंगलों व गांवों में रहने वाले मेहनतकष मजदूर, संस्कृति से लैस लोगों पर आकाषीय हमला करना बिल्कुल शर्मनाक है. शर्मनाक इसलिए भी कि यदि यही पैसा गरीबी और बेरोजगारी दूर करने में लगया जाता तो शायद एक बेहतर माहौल बनता और नक्सली अपने आप खत्म हो जाता. लेकिन, यहां गरीबी खत्म करने के बजाय गरीबों को ही खत्म करने की कोषिष की जा रही है. जमीन पर कौन है नक्सली, यह भला कैसे पता लगायेंगे आकाष में उड़नेवाले लोग. उन्हें कैसे पता चलेगा कि मध्यरात्रि तक गांव व जंगल में नाचते-गाते लोग सीधे-साधे आदिवासी व दलित समुदाय के लोग है न कि नक्सली. यदि यह पहल हुआ तो निष्चित रूप बाजार जा रहे -हजयुंड़ में लोग, षिकार खेलते आदिवासी या फिर नरेगा के तहत काम कर रहे लोग इसके षिकार होंगे. सरकार की यह कितनी बेवकुफीपन योजना है. जरा सोचिए नक्सली कौन है यहां? नक्सलवादी विचारधारा में शामिल क्यों हो रहे हैं लोग? जाहिर सी बात है कि ये वे लोग हैं जो हमारी व्यवस्था से निराष लोग है पर हैं वे सब अपने ही न कि देष का दुषमन. न तो वे किसी दूसरे देष के एजेंट हैं न ही बाहरी आक्रमणकारी या आतंकवादी, फिर सरकार ऐसे नृषंस कदम उठाने की योजना बनायी है तो इसका विरोध होगा ही. विरोध हो भी रहा है. होना भी चाहिए. क्योंकि, यह योजना कहीं से भी राष्ट्रहित में नहीं है. ऐसे भी यदि मामूली सी दिमाग लगाकर सोचा जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हमला माओवादियों पर नहीं, बल्कि ग्रमीण जनता पर है. फिर भी यदि यह काम सरकार करती है तो देष में आंतरिक युद्ध पैदा होगा. इसलिए सरकार को इसके लिए दूसरे कोई उपाय तलाष करनी चाहिए. सरकार को नक्सली पैदा होने के मूल कारणों तक जाना चाहिए. यहां अमीरों का दिन-प्रतिदिन और अमीर होना और गरीबों का और गरीब होते चले जाना नक्सलवाद के पनपने का प्रमुख कारण है. इसको नजरअंदाज करके हम नक्सली को खत्म नहीं कर सकते हैं.  
थोड़ी देर के लिए यदि मान भी लें कि इस तरीके से जंगलों में रहने वाले नक्सली मारे जायेंगे लेकिन, शहरों, महानगरों एवं राजधानियों में जो नक्सली आ बसे हैं, उसकी समाप्ति भला कैसे होगा? नक्सली आज न सिर्फ जंगलों व गांवों में हैं बल्कि कहीं ज्यादा शहरों में रहने लगें हैं. वह भी खादी, खाकी, वर्दी और काले कोटों में, बिल्कुल साफ-सुथरे चेहरों में. ऐसे में माओवादियों पर यह आपरेषन भला किस काम का?
वैसे देखा जाय तो आज -हजयारखंड, छतीसग-सजय़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेष और मध्यप्रदेष के इलाकों में खनिज संपदाओं एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है जिस पर पूंजीपतियों, मल्टीनेषनल कंपनियों एवं मंत्रियों का कडी नजर है. ठीक इसके उलट आदिवासी-मुलवासी  अपनी खनिज संपदा व प्राकृतिक धरोहरों को बचाकर रखना चाहते हैं. इसी वजह से वे नक्सली कहलाते हैं. क्योंकि वे तथाकथित विकास नीतियों का विरोध करते हैं. अपने हक के लिए आवाज उठाते हैं. विस्थापित न होकर खुद की जिंदगी को बचाना चाहते हैं, लेकिन पुलिस के हत्थे च-सजय़ जाते हैं, ऐसे में मूलवासी हथियार न उ-सजय़ाये तो आखिर क्या करे? इतना ही नहीं, संसाधनों के मामले में भले ही वे धनी हों पर हकीकत में वे सभी बदहाली, मुफलिसी और भुखमरी की जिंदगी जीते हैं. फिर वे अपने देष के तथाकथित अभिजात्य और पुंजीपतियों, नेताओं, जनप्रतिनीधियों एवं पुलिस बलों को अपना दुष्मन सम-हजयने लगते है. विकास के नाम पर आज तक सबसे ज्यादा इन्हीं लोगों को अपनी कीमत चुकानी पड़ी है. विस्थापन के खिलाफ जब कभी भी आवाज इन लोगों ने उठाया है उलटे इन्हें नक्सली या विकासविरोधी कहकर पुलिसिया जुल्म, खौफनाक दमन और शोषण के षिकार होना पड़ा है. इस परिस्थिति में वे हिंसक और नक्सली बनने को बाध्य हो जाते हैं. इसलिए बेहतर है माओवादी बनने के कारणों को
 -इन्द्रमणि

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