प्रकाश में आया है परिचय पत्र के नाम पर 15 लाख रूपये वसूले जाने का मामला
-ंइन्द्रमणि
एक अप्रैल 2009 से झारखंड सहित पूरे देश में बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू हो गया है. यह बात अलग है कि अन्य महत्वाकांक्षी कानूनों की तरह यह कानून भी जमीन पर उतर नहीं पाया है. झारखंड सरकार अब तक इस कानून के आलोक में कोई नियमावली नहीं बना पायी है. जो नियम बने भी हैं वह किसी भी तरीके से यानी झारखंडी संस्कृति एवं झारखंडी पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता है. ऐसे में, संबंधित विभाग मनमाने तरीके से विधालय संचालित कर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं. इस कानून को लेकर कोडरमा सहित पूरे राज्य में अधिकारी व अन्य पदाधिकारी उहापोह की स्थिति में है.
इस कानून को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट आदेश या नियमावली नहीं होने के कारण अधिकारी अपने मनमुताबिक कार्य संपादन कर रहे हैं. या फिर यूं कहें कि कमाने-ंखाने के वे सारे तरकीब अपनाये जा रहे हैं जो कानून के विपरीत है. ऐसा ही एक मामला अभी हाल ही में कोडरमा में देखने को मिला है.
मामला यह है कि सरकारी विधालयों के बच्चों से परिचय पत्र बनवाने के नाम पर बड़ी चलाकी से लगभग 15 लाख रूपये अधिकारियों द्वारा उगाही किये जा रहे हैं. ज्ञात हो कि जिला शिक्षा अधीक्षक, कोडरमा के पत्रांक 370 दिनांक 05 अप्रैल 2011 के आलोक में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, कोडरमा ने सभी प्राथमिक व मध्य विधालयों के प्रधानाध्यापकों को एक पत्र (संख्या-85 दिनांक 21 अप्रैल 2011) निर्गत किया है और निर्देश जारी किया है कि बच्चों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बनाने के उद्देष्य से बच्चों का परिचय पत्र बनवाना अनिवार्य है. इसके लिए अग्रेनोमी वेलफेयर सेंटर को नामित किया गया है. यह संस्था सभी छात्र-छात्राओं को फोटोयुक्त परिचय पत्र (लेमिनेशन के साथ) दिये जायेंगे. इसके लिए प्रत्येक छात्र-छात्राओं को 10 रूपये जमा करने का स्पष्ट आदेश जारी किया गया है. वहीं, विकलांग छात्र-छात्राओं से पैसे नहीं लेने का स्पष्ट निर्देश है.
यह कार्यक्रम चाहे जैसा भी हो पर यह गैर कानूनी व अपराधपूर्ण भी है. क्योंकि, इस देश में निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 लागू है. जिसमें बच्चों से किसी भी तरह का शुल्क नहीं लेने का प्रावधान है. सवाल 10 रूपये का नहीं है बल्कि, सवाल व्यवस्था और कानून का है. वैसे, देखा जाय तो 10 रूपये बहुत छोटा रकम लगता है परंतु गणितीय सुत्र के हिसाब से जोड़ा जाये तो यह 10 रूपया 15 लाख रूपये तक पहुंच जाता है. क्योंकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग एक लाख 50 हजार बच्चे नामांकित है और परिचय पत्र के नाम पर उनसे 10 रूपये वसूले जा रहे हैं. इस हिसाब से कुल 15 लाख रूपये होता है. यह रूपैया किस कोष में जायेगा यह बताने वाला कोई नहीं है. इस परिस्थिति में यहां कई तरह के उहाफोह की स्थिति बनी हुई है. जितनी मुंह उतनी बातें हो रही है.
कुल मिलाकर, झारखंड में नियमावली नहीं बनने के कारण सरकारी विधालयों में कानून का बुरा हाल है. किसी-किसी जिला में अखबारों में विज्ञापन निकलवाने के बाद भी जिले में अवस्थित निजी स्कूल सरकार को छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की संख्या, फीस, वर्ग कक्ष व अन्य सुविधाओं की जानकारी नहीं दे रहे हैं. प्राइवेट विधालयों के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार की ओर से हमलोगों को कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है. आज कोडरमा सहित अधिकांश जिलों में ग्राम शिक्षा समिति और स्कूल प्रबंधन समिति ये दोनों कमिटियां कार्य कर रही है और इन दोनों कमिटियों के चक्कर में स्कूल के प्रधानाध्यापक बेमौत मारे जा रहे हैं. कानून के तहत जितने सारे प्रावधान किये गये हैं उस पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है. आखिर इस कानून का क्या होगा?
एक अप्रैल 2009 से झारखंड सहित पूरे देश में बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून लागू हो गया है. यह बात अलग है कि अन्य महत्वाकांक्षी कानूनों की तरह यह कानून भी जमीन पर उतर नहीं पाया है. झारखंड सरकार अब तक इस कानून के आलोक में कोई नियमावली नहीं बना पायी है. जो नियम बने भी हैं वह किसी भी तरीके से यानी झारखंडी संस्कृति एवं झारखंडी पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता है. ऐसे में, संबंधित विभाग मनमाने तरीके से विधालय संचालित कर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं. इस कानून को लेकर कोडरमा सहित पूरे राज्य में अधिकारी व अन्य पदाधिकारी उहापोह की स्थिति में है.
इस कानून को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट आदेश या नियमावली नहीं होने के कारण अधिकारी अपने मनमुताबिक कार्य संपादन कर रहे हैं. या फिर यूं कहें कि कमाने-ंखाने के वे सारे तरकीब अपनाये जा रहे हैं जो कानून के विपरीत है. ऐसा ही एक मामला अभी हाल ही में कोडरमा में देखने को मिला है.
मामला यह है कि सरकारी विधालयों के बच्चों से परिचय पत्र बनवाने के नाम पर बड़ी चलाकी से लगभग 15 लाख रूपये अधिकारियों द्वारा उगाही किये जा रहे हैं. ज्ञात हो कि जिला शिक्षा अधीक्षक, कोडरमा के पत्रांक 370 दिनांक 05 अप्रैल 2011 के आलोक में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी, कोडरमा ने सभी प्राथमिक व मध्य विधालयों के प्रधानाध्यापकों को एक पत्र (संख्या-85 दिनांक 21 अप्रैल 2011) निर्गत किया है और निर्देश जारी किया है कि बच्चों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बनाने के उद्देष्य से बच्चों का परिचय पत्र बनवाना अनिवार्य है. इसके लिए अग्रेनोमी वेलफेयर सेंटर को नामित किया गया है. यह संस्था सभी छात्र-छात्राओं को फोटोयुक्त परिचय पत्र (लेमिनेशन के साथ) दिये जायेंगे. इसके लिए प्रत्येक छात्र-छात्राओं को 10 रूपये जमा करने का स्पष्ट आदेश जारी किया गया है. वहीं, विकलांग छात्र-छात्राओं से पैसे नहीं लेने का स्पष्ट निर्देश है.
यह कार्यक्रम चाहे जैसा भी हो पर यह गैर कानूनी व अपराधपूर्ण भी है. क्योंकि, इस देश में निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 लागू है. जिसमें बच्चों से किसी भी तरह का शुल्क नहीं लेने का प्रावधान है. सवाल 10 रूपये का नहीं है बल्कि, सवाल व्यवस्था और कानून का है. वैसे, देखा जाय तो 10 रूपये बहुत छोटा रकम लगता है परंतु गणितीय सुत्र के हिसाब से जोड़ा जाये तो यह 10 रूपया 15 लाख रूपये तक पहुंच जाता है. क्योंकि, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग एक लाख 50 हजार बच्चे नामांकित है और परिचय पत्र के नाम पर उनसे 10 रूपये वसूले जा रहे हैं. इस हिसाब से कुल 15 लाख रूपये होता है. यह रूपैया किस कोष में जायेगा यह बताने वाला कोई नहीं है. इस परिस्थिति में यहां कई तरह के उहाफोह की स्थिति बनी हुई है. जितनी मुंह उतनी बातें हो रही है.
कुल मिलाकर, झारखंड में नियमावली नहीं बनने के कारण सरकारी विधालयों में कानून का बुरा हाल है. किसी-किसी जिला में अखबारों में विज्ञापन निकलवाने के बाद भी जिले में अवस्थित निजी स्कूल सरकार को छात्र-छात्राओं व शिक्षकों की संख्या, फीस, वर्ग कक्ष व अन्य सुविधाओं की जानकारी नहीं दे रहे हैं. प्राइवेट विधालयों के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार की ओर से हमलोगों को कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है. आज कोडरमा सहित अधिकांश जिलों में ग्राम शिक्षा समिति और स्कूल प्रबंधन समिति ये दोनों कमिटियां कार्य कर रही है और इन दोनों कमिटियों के चक्कर में स्कूल के प्रधानाध्यापक बेमौत मारे जा रहे हैं. कानून के तहत जितने सारे प्रावधान किये गये हैं उस पर अमलीजामा नहीं पहनाया जा रहा है. आखिर इस कानून का क्या होगा?
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